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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 को मंजूरी दी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 6 अप्रैल को भारतीय अंतरिक्ष नीति (Indian Space Policy) 2023 को मंजूरी दी. नीति का उद्देश्य अंतरिक्ष विभाग की भूमिका को बढ़ाकर और अनुसंधान, शिक्षा, स्टार्टअप और उद्योग से भागीदारी को प्रोत्साहित करके अंतरिक्ष क्षेत्र में विकास को बढ़ावा देना है.

मुख्य बिन्दु

  • यह नीति भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो), न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) और निजी क्षेत्र के संस्थाओं की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों को निर्धारित करती है.
  • इसरो के मिशनों के परिचालन भाग को न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) में स्थानांतरित कर दिया जाएगा. NSIL अंतरिक्ष विभाग के तहत एक सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम है.
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पहल पर निजी भागीदारी के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र को खोले जाने की शुरुआत के तीन वर्षों के भीतर इसरो में स्टार्टअप्स की संख्या 150 तक पहुंच गई है.
  • इसरो (ISRO): एक दृष्टि
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) भारत की अंतरिक्ष एजेंसी है. इसका गठन 15 अगस्त 1969 को किया गया था.
  • इसरो का मुख्य उद्देश्य विभिन्न राष्ट्रीय आवश्यकताओं के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का विकास और अनुप्रयोग है.
  • इसरो का मुख्यालय बेंगलूरु में स्थित है तथा इसकी गतिविधियाँ विभिन्न केंद्रों और इकाइयों में फैली हुई हैं.

नासा ने चांद की परिक्रमा करने वाले चार अंतरिक्ष यात्रियों की टीम की घोषणा की

अमरीका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने चंद्रमा की परिक्रमा करने वाली चार अंतरिक्ष यात्रियों की टीम की घोषणा की है. इनमें अमरीकी नौसेना के पूर्व फाइटर पायलट रीड वाइसमैन, अनुभवी अंतरिक्ष यात्री विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और कनाडाई अंतरिक्ष यात्री जेरेमी हैनसेन शामिल होंगे.

मुख्य बिन्दु

  • क्रिस्टीना कोच चांद की परिक्रमा करने वाली पहली महिला यात्री और विक्टर ग्लोवर पहले अश्वेत अंतरिक्ष यात्री होंगे. कनाडाई अंतरिक्ष यात्री जेरेमी हैनसेन चंद्रमा पर जाने वाले पहले गैर-अमरीकी होंगे.
  • नासा इसके लिए 2024 के अंत में आर्टेमिस-2 मिशन रवाना करेगा. नासा का 2022 में आर्टेमिस-1 मिशन सफल रहा था. यह मानव रहित चंद्रमा मिशन था. नासा करीब 50 साल बाद चंद्र मिशन के लिए यात्री भेज रहा है. यह 8 दिवसीय मिशन होगा.
  • आर्टेमिस-1 मिशन से नासा इससे तय करना चाहता था कि वह इंसान को चांद तक भेज सकता है और उन्हें वापस सुरक्षित धरती पर ला सकता है. इस मिशन की सफलता के बाद से ही आर्टेमिस-2 मिशन की तैयारी शुरू हो गई थी.

मानव ने 1969 में पहली बार चांद पर कदम रखे थे

सबसे पहले चांद पर 1969 में मानव ने कदम रखा था. अमरीकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रॉन्ग चांद पर उतरने वाले पहले इंसान थे. उसके बाद 11 और लोग चांद की मिट्टी छूने में सफल रहे है. अपोलो-11 के बाद अपोलो-12, अपोलो-14, अपोलो-15, अपोलो-16, अपोलो-17 के जरिए नासा चांद की धरती तक पहुंचता रहा. अपोलो मिशन के करीब 50 साल बाद नासा फिर से लोगों को चांद पर भेजने की कोशिश कर रहा है.

देश की प्रथम क्लोन गिर गाय ‘गंगा’ का जन्म, NDRI करनाल के प्रयासों से मिली सफलता

भारतीय वैज्ञानिकों ने पहली बार स्वदेशी गिर गाय के क्लोन के बछड़े को पैदा करने में सफलता हासिल की है. इस बछिया का जन्म 16 मार्च को हुआ था लेकिन 10 दिनों तक उसके स्वास्थ्य को जांचने के बाद 26 मार्च को इसके बारे में जानकारी सार्वजनिक की गई थी.

मुख्य बिन्दु

  • यह सफलता राष्ट्रीय डेयरी अनुसंधान संस्थान (NDRI) करनाल के प्रयासों से मिली है. इसे जलवायु परिवर्तन के बीच पशु और दुग्ध उत्पादन में क्रांति माना जा रहा है.
  • NDRI के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने इस क्लोन बछिया का नाम ‘गंगा’ रखा गया है. इसका वजन 32 किलोग्राम है और वह बिल्कुल स्वस्थ है.
  • NDRI करनाल ने 2009 में भैंस की क्लोन ‘गरिमा’ तैयार की थी. जलवायु परिवर्तन के बीच ऐसी प्रजातियों की जरूरत महसूस हुई जो गर्मी और ठंड को सहन करे और दुग्ध उत्पादन में सहायक हो.
  • NDRI की इस क्लोनिंग तकनीक से उच्च गुणवत्ता वाली नस्लों पैदा करने में सफलता मिलेगी. दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा, खासकर बुल (साड़ों) की कमी दूर होगी.
  • 2021 में उत्तराखंड लाइवस्टॉक डेवलपमेंट बोर्ड देहरादून के सहयोग से NDRI करनाल के पूर्व निदेशक डॉ. एमएस चौहान के नेतृत्व में गिर, साहीवाल और रेड-सिंधी गायों की क्लोनिंग का काम शुरू किया गया था.
  • स्वदेशी गिर गाय की नस्ल मूलतः गुजरात में है. गिर गाय अधिक सहनशील होती है, जो अधिक तापमान और ठंड सहन कर लेती है. यह विभिन्न ऊष्ण कटिबंध के प्रति भी रोग प्रतिरोधक है.

क्लोनिंग तकनीक

  • गिर किस्म की क्लोनिंग में साहीवाल किस्म की गाय से अंडा लिया गया, गिर किस्म का सेल (डीएनए) लिया और परखनली में भ्रूण तैयार करके फिर संकर प्रजाति की गाय में रोपित किया गया.
  • आठ दिन के इन विट्रो-कल्चर के बाद विकसित भ्रूण (ब्लास्टोसिस्ट) को किसी भी गाय में स्थानांतरित किया गया. इसके नौ महीने बाद क्लोन बछड़ी (या बछड़ा) होता है.

भारत ने LVM3-M3 रॉकेट द्वारा वन वेब इंडिया-टू मिशन के 36 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 26 मार्च को एक साथ 36 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया था. यह प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्रीहरिकोटा से LVM3-M3 रॉकेट (प्रक्षेपण यान) से किया गया था.

मुख्य बिन्दु

  • LVM3-M3, इसरो द्वारा विकसित एक अत्याधुनिक रॉकेट है. 43.5 मीटर लंबा LVM3 इसरो का सबसे भारी भरकम प्रक्षेपण यान है जो अब तक पांच सफल उड़ानें पूरी कर चुका है जिसमें चंद्रयान-2 मिशन भी शामिल है.
  • इस रॉकेट के माध्यम से ब्रिटेन की एक कंपनी के 36 उपग्रहों का प्रक्षेपण किया गया. जिन उपग्रहों को लेकर LVM3 ने उड़ान भरी उनका कुल वजन 5 हजार 805 टन है. इस मिशन को LVM3-M3/वनवेब इंडिया-2 नाम दिया गया था.
  • दरअसल ब्रिटेन की वनवेब ग्रुप कंपनी ने इसरो की वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड से 72 उपग्रह लॉन्च करने का करार किया था. इसमें अक्टूबर 2022 में 23 उपग्रह इसरो पहले ही ल़ॉन्च कर चुका है.
  • वनवेब उपग्रहों का उद्देश्य दुनियाभर में ब्रॉडबैंड सम्‍पर्क प्रदान करना है. ये प्रक्षेपण अगर कामयाब रहती है तो वनवेब इंडिया-2 स्पेस में 600 से ज्यादा लोअर अर्थ ऑर्बिट सेटेलाइट्स के कान्स्टलेशन को पूरा कर लेगी. साथ ही इससे दुनिया के हर हिस्से में स्पेस आधार ब्रॉडबैंड इंटरनेट योजना में मदद मिलेगी.

चंद्रयान-3 का विद्युत चुंबकीय व्‍यवधान और योग्‍यता संबंधी सफल परीक्षण

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने हाल ही में चंद्रयान-3 का विद्युत चुंबकीय व्यवधान और योग्यता (Electro – Magnetic Interference/ Electro – Magnetic Compatibility) संबंधी सफल परीक्षण किया था. यह परीक्षण बैंगलुरू के यू आर रॉव उपग्रह केन्‍द्र में किया गया था. उपग्रहों को तैयार करने में यह एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है.

मुख्य बिन्दु

  • इस परीक्षण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि अंतरिक्ष के वातावरण में उपग्रह की प्रणालियां संभावित विद्युत चुंबकीय स्तरों के साथ मिलकर समुचित तरीके से काम करें.
  • इस परीक्षण के दौरान चंद्रयान के लैंडिंग मिशन के बाद के चरण से संबंधित कई मामलों की पडताल की गई. इनमें प्रक्षेपण योग्यता, सभी रेडियो फ्रिक्‍वेंसी प्रणालियों के लिए एंटीना के ध्रुवीकरण और लैंडर तथा रोवर की अनुकूलता सहित कई परीक्षण शामिल हैं. इस दौरान सभी प्रणालियों का प्रदर्शन संतोषजनक रहा.
  • चंद्रयान-3 मिशन में तीन प्रमुख मॉडयूल हैं- प्रोपल्‍शन, लैंडर और रोवर. इस अभियान की जटिलता का संबंध इन मॉडयूल के बीच रेडियो फ्रिक्‍वेंसी संचार संपर्क स्थापित करने से है.

भारत में निर्मित मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम ‘भारओएस’ का सफल परीक्षण

भारत में निर्मित मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम ‘भारओएस’ (BharOS) का सफल परीक्षण 25 जनवरी को किया गया था. शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के साथ ‘भारओएस’ का सफल परीक्षण किया गया था.

भारत में बना मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्‍टम आईआईटी-मद्रास द्वारा विकसित किया गया है. श्री प्रधान ने कहा कि देश के गरीब लोग एक मजबूत, स्वदेशी, भरोसेमंद और आत्मनिर्भर डिजिटल बुनियादी ढांचे के मुख्य लाभार्थी होंगे.

‘भारओएस’ ऑपरेटिंग सिस्‍टम का विकास डेटा की गोपनीयता के लिए किया गया है.

इंडिया मोबाइल कांग्रेस का आयोजन, भारत में 5जी मोबाइल सेवाओं की शुरूआत

भारत में 1 अक्तूबर 2022 को 5जी मोबाइल सेवाओं की शुरूआत हुई थी. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली में आयोजित छठे इंडिया मोबाइल कांग्रेस (IMC) में इसकी शुरुआत की थी.

छठे IMC का आयोजन 1 से 4 अक्तूबर तक प्रगति मैदान में किया गया था. एशिया की इस सबसे बड़ी तकनीकी प्रदर्शनी का आयोजन दूरसंचार विभाग और सेल्‍यूलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (COAI) संयुक्त रूप से किया था.

5G तकनीक: एक दृष्टि

  • 5G का पूरा नाम 5th generation है. यह 5वीं पीढ़ी का मोबाइल नेटवर्क है जो 4G नेटवर्क की तुलना में 10 गुना तेज इंटरनेट स्पीड प्रदान करता है. यह अधिकतम स्पीड 20 Gbps है.
  • 5G से अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि समेत अधिकतर क्षेत्रों पर इसका काफी व्यापक प्रभाव पड़ेगा. एक अनुमान के मुताबिक 5जी सेवा भारतीय अर्थव्यवस्था में अगले 15 वर्षों में 450 बिलियन डॉलर का योगदान करेगी.
  • 5जी की शुरूआत से भारत फिन्टेक में एक अग्रणी देश बनकर सामने आएगा. UPI और रुपे जैसी तकनीकों का तेजी से देश और दुनिया में फैलाव संभव हो सकेगा.
  • सरकार ने देशभर में 5जी प्रौद्योगिकी के लिए सौ प्रयोगशालाएं स्थापित करने की योजना बनाई है. इनमें कम से कम 12 प्रयोगशालाओं में विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया जाएगा.

नासा ने मंगल ग्रह पर जीवन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण नमूनों को एकत्रित किया

हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) के पर्सवेरेंस रोवर (Perseverance Rover) ने मंगल ग्रह (Mars) पर जीवन के संकेतों से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण नमूनों को एकत्रित किया है.

मुख्य बिन्दु

  • रिपोर्ट से पता चला है कि ग्रह पर कार्बनिक पदार्थों की उपस्थिति है. माइक्रोबियल जीवन के नमूने खोजे जाने से पता चला है कि 3.5 अरब साल पहले यहां झील और उसमें एक डेल्टा भी था.
  • नासा के रोवर ने चार नमूने एकत्र किए हैं जिनमें एक प्राचीन नदी डेल्टा के संभावित सबूत हैं, जो एक जैविक समृद्ध नमूने हैं.
  • एक वर्ष के दौरान, रोवर ने ज्वालामुखी विस्फोट वाली झील से एक जैकपॉट की खोज की थी. रोवर ने एक अरब साल पुरानी चट्टान को ड्रिल किया, जिसमें रोवर ने कार्बनिक अणुओं की खोज की.
  • नासा का यह रोवर जुलाई 2020 में केप कैनावेरल, फ्लोरिडा से लॉन्च होने के बाद फरवरी 2021 में मंगल ग्रह पर सफलतापूर्वक उतरा था.

वैज्ञानिकों ने की चांद की मिट्टी में पहली बार पौधे उगने में सफलता पाई

वैज्ञानिकों ने की चांद से लायी गयी मिट्टी में पहली बार पौधे उगने में सफलता पाई है. चांद से मिट्टी के ये नमूने 1969 और 1972 में नासा के मिशनों के दौरान इकट्ठे किए गए थे, जिन पर वैज्ञानिकों ने पौधे उगाए हैं.

मुख्य बिंदु

  • धरती के पौधों का दूसरी दुनिया की मिट्टी में उग पाना मानवता के लिए बहुत बड़ी सफलता है. इससे संभावना पैदा होती है कि धरती पर पनपने वाले पौधों को दूसरे ग्रहों पर भी उगाया जा सकता है.
  • नासा ने इस प्रयोग के लिए केवल 12 ग्राम मिट्टी ही दी थी जो कि Apollo 11, Apollo 12 और Apollo 17 मिशन के दौरान इकट्ठा की गई थी.
  • वैज्ञानिकों ने 12 छोटे कंटेनरों में इस मिट्टी में अरबिडोप्सिस थालियाना (Arabidopsis thaliana)  नाम के एक कम फूल वाले खरपतवार के बीज डाले. कुछ दिनों बाद पौधे उग आए.
  • यह मिट्टी नुकीले कणों और ऑर्गेनिक मैटिरियल की कमी के चलते धरती की मिट्टी से बहुत अलग है, इसलिए वैज्ञानिकों को शंका थी कि शायद पौधे न उगें.

अटल इनोवेशन मिशन को मार्च 2023 तक विस्तारित किया गया

केंद्र सरकार ने अटल इनोवेशन मिशन (AIM) को मार्च 2023 तक विस्तारित करने का निर्णय लिया है. यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 9 अप्रैल को लिया गया था.

मुख्य बिंदु

  • AIM देश में नवाचार संस्कृति (Innovation culture) और उद्यमशीलता पारिस्थितिकी तंत्र (Entrepreneurial Ecosystem) बनाने के अपने लक्ष्य पर काम करेगा. यह AIM द्वारा अपने विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से किया जाएगा.
  • AIM द्वारा हासिल किए जाने वाले लक्ष्यों में 10,000 अटल टिंकरिंग लैब्स, 101 अटल इनक्यूबेशन सेंटर तथा 50 अटल कम्युनिटी इनोवेशन सेंटर की स्थापना करना और अटल न्यू इंडिया चैलेंजेस के माध्यम से 200 स्टार्टअप्स का समर्थन करना शामिल है.
  • इसके लिए 2000 करोड़ रुपये से अधिक का कुल बजट निर्धारित किया गया है.

अटल इनोवेशन मिशन (AIM) क्या है?

अटल इनोवेशन मिशन को 2015 में नीति आयोग के तहत स्थापित किया गया था. इसका उद्देश्य स्कूल, विश्वविद्यालय, अनुसंधान संस्थानों, MSME और उद्योग स्तरों पर देश भर में नवाचार और उद्यमिता का एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है. AIM ने बुनियादी ढांचे के निर्माण और संस्था निर्माण दोनों पर ध्यान केंद्रित किया है.

IIT रूड़की में स्वदेश निर्मित पेटास्‍केल सुपर कंप्‍यूटर ‘परम गंगा’ को इंस्‍टॉल किया गया

IIT रूड़की में स्वदेश निर्मित पेटास्‍केल सुपर कंप्‍यूटर ‘परम गंगा’ (PARAM Ganga) को स्थापित (इंस्‍टॉल) किया गया है. इसकी सुपरकंप्‍यूटिंग कैपिसिटी 1.66 PFLOPS (पेटा फ्लोट‍िंग-पॉइंट ऑपरेशंस प्रति सेकंड) है.

मुख्य बिंदु

  • इससे पहले इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस (IISc) ने सुपर कंप्यूटर ‘परम प्रवेग’ (Param Pravega) को इंस्‍टॉल किया था. यह देश का सबसे पावरफुल सुपर कंप्‍यूटर है, जिसमें 3.3 पेटाफ्लॉप्स की सुपर कंप्यूटिंग कैपेसिटी है.
  • ‘परम गंगा’ को नेशनल सुपर कंप्‍यूटिंग मिशन (NSM) के तहत तैयार किया गया है. इसे सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ एडवांस्‍ड कंप्‍यूटिंग (CDAC) ने तैयार किया है. IIT रुड़की ने इसके लिए CDAC के साथ एक MoU साइन किए थे.
  • इस सुपर कंप्‍यूटर का मकसद IIT रूड़की और इसके आसपास के एजुकेशन इंस्टीट्यूट की यूजर कम्‍युनिटी को कंप्‍यूटनेशनल पावर देना है.
  • इसका उपयोग जीनोमिक्स और ड्रग डिस्कवरी, मौसम विज्ञान, जल विज्ञान, बाढ़ आने की चेतावनी और भविष्यवाणी, गैस ढूढ़ने में और भूकंपीय इमेजिंग में किया जायेगा.

NMC ने डॉक्टरों को हिपोक्रेटिक शपथ की जगह ‘चरक शपथ’ दिलाये जाने का सुझाव दिया

भारत के शीर्ष चिकित्सा शिक्षा नियामक, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने डॉक्टरों को हिपोक्रेटिक शपथ की जगह ‘चरक शपथ’ दिलाये जाने का सुझाव दिया है. डॉक्टरों को यह शपथ पढ़ाई पूरी करने के बाद स्नातक समारोह के दौरान दिया जाता है.

चरक शपथ, आयुर्वेद विशारद महर्षि चरक की चिकित्सा को लेकर किताब ‘चरक संहिता’ पर आधारित होगी. यह शपथ दिलाये जाने का उद्देश्य भारतीय संस्कृति को बढ़ावा देना है.

अब तक की परंपरा के अनुसार मेडिकल में स्नातक की पढ़ाई पूरी कर लेने के बाद छात्रों को हिपोक्रेटिक शपथ दिलाई जाती रही है. इसमें भावी डॉक्टरों से मरीजों की सेवाभाव और उनकी जान बचाने की प्राथमिकता जैसे कई वादे लिए जाते थे.

हिपोक्रेटिक शपथ और चरक शपथ

  • अभी तक डॉक्टरों को प्राचीन यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट के सिद्धांतों की शपथ दिलाई जाती थी. NMC के अनुसार देश की चिकित्सा का समृद्ध इतिहास रहा है, यहां आचार्य चरक जैसे महान विशेषज्ञ रहे हैं तो फिर विदेशी सिद्धांतों को मानने की क्या आवश्यकता है.
  • हिपोक्रेटिक शपथ में अब तक भावी डॉक्टर्स से वादा लिया जाता रहा है कि वह बिना अपने पद का दुरुपयोग किए, मरीजों की सेवा करने को अपना धर्म मानेंगे. अपने साथी डॉक्टर्स का सम्मान करेंगे और हर मुश्किल में उनका साथ देंगे. शपथ की यह प्रक्रिया डॉक्टरों को उनके कर्तव्य और जिम्मेदारी के प्रति बाध्य करती है.
  • चरक-शपथ के मुताबिक- ”ना अपने लिए और ना ही दुनिया में मौजूद किसी वस्तु या फायदे को पाने के लिए, बल्कि सिर्फ इंसानियत की पीड़ा को खत्म करने के लिए मैं अपने मरीजों का इलाज करूंगा.”