Tag Archive for: science and tech

मंगल क्रेटर का नामकरण भारतीय नामों पर करने की मंजूरी

अंतर्राष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने मंगल ग्रह की सात भूवैज्ञानिक विशेषताओं (geological features) का नामकरण सात भारतीय नामों पर करने की मंजूरी दी है. यह भारत की अंतरिक्ष विज्ञान और भूविज्ञान में बढ़ती वैश्विक पहचान को दर्शाता है.

मंगल पर शामिल किए गए नए भारतीय नाम

क्रेटर/विशेषता का नामविशेषता का प्रकारनामकरण का आधार
कृष्‍णन (Krishnan)विशाल क्रेटरप्रसिद्ध भारतीय भूविज्ञानी एम. एस. कृष्णन
पेरियार वलिस (Periyar Vallis)घाटीकेरल की सबसे लंबी नदी, पेरियार
वर्कला (Varkala)छोटा क्रेटरवर्कला में मौजूद भूवैज्ञानिक रूप से अनोखी चट्टान
थुम्बा (Thumba)छोटा क्रेटरथुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन
वलियामाला (Valiamala)छोटा क्रेटरभारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान (IIST)
बेकल (Bekal)छोटा क्रेटरकासरगोड में स्थित ऐतिहासिक बेकल किला
कृष्‍णन पालस (Krishnan Palus)मैदानकृष्‍णन क्रेटर के भीतर स्थित मैदान.

पिछली स्वीकृतियाँ (जून 2024)

इससे पहले, IAU ने मंगल के थारसिस ज्वालामुखी क्षेत्र में खोजे गए तीन क्रेटरों के नाम भी भारतीय संदर्भों पर रखे थे:

  1. लाल क्रेटर: प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक प्रोफेसर देवेंद्र लाल के नाम पर.
  2. मुरसान क्रेटर: उत्तर प्रदेश के मुरसान शहर (पीआरएल निदेशक डॉ. अनिल भारद्वाज का जन्मस्थान) के नाम पर.
  3. हिलसा क्रेटर: बिहार के हिलसा शहर (खोजकर्ताओं में से एक, डॉ. राजीव रंजन भारती का जन्मस्थान) के नाम पर.

यह कदम वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में भारत के बढ़ते योगदान का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है.

सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट के विनिर्माण की एक बड़ी योजना को मंजूरी

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 26 नवंबर को सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (Sintered Rare Earth Permanent Magnets – REPM) के विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ी योजना को मंजूरी दी है.

यह निर्णय भारत के लिए दुर्लभ पृथ्वी चुम्बकों के निर्माण में चीन के एकाधिकार को चुनौती देने और अपनी औद्योगिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

REPM विनिर्माण योजना: मुख्य बिन्दु

  • इस योजना का कुल वित्तीय परिव्यय ₹7,280 करोड़ और अवधि 7 वर्ष (इसमें 2 वर्ष संयंत्र स्थापित करने के लिए और 5 वर्ष प्रोत्साहन वितरण के लिए) है.
  • यह भारत की पहली एकीकृत REPM विनिर्माण सुविधा होगी. इस योजना का मुख्य उद्देश्य, भारत में 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष की एकीकृत REPM विनिर्माण क्षमता स्थापित करना है.
  • इस योजना के लिए वैश्विक प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के माध्यम से अधिकतम पाँच लाभार्थियों का चयन किया जाएगा, जिनमें से प्रत्येक को 1,200 MTPA तक की क्षमता आवंटित की जाएगी.

REPM योजना क्यों महत्वपूर्ण है?

  • वर्तमान में, भारत इन महत्वपूर्ण चुम्बकों के लिए लगभग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है, जिसका अधिकांश हिस्सा चीन से आता है. हाल ही में चीन ने रेयर अर्थ तत्वों के निर्यात पर नियंत्रण कड़ा कर दिया है.
  • REPM इलेक्ट्रिक वाहन (EV), पवन टर्बाइन, रक्षा (Defense) अनुप्रयोगों, एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक्स और चिकित्सा उपकरणों जैसे महत्वपूर्ण और भविष्य की प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक हैं.
  • इस योजना का लक्ष्य भारत को वैश्विक REPM बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित करना है. इस कदम से 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण के अनुरूप तकनीकी रूप से आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता हासिल करने में मदद मिलेगी.

चीनी वैज्ञानिकों ने दो अभूतपूर्व सबसे तेज़ AI चिप्स बनाई

चीनी वैज्ञानिकों ने दो अभूतपूर्व सबसे तेज़ AI चिप्स विकसित की हैं, जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की दुनिया को बदल सकती हैं.

1. एनालॉग AI चिप (RRAM-आधारित)

  • पेकिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एक नई एनालॉग AI चिप विकसित की है. दावा किया गया है कि यह Nvidia H100 से लगभग 1,000 गुना तेज़ है.
  • यह चिप RRAM (Resistive Random-Access Memory) तकनीक का उपयोग करती है. एनालॉग कंप्यूटिंग में, चिप सर्किट के माध्यम से सीधे गणना करती है, जबकि डिजिटल चिप्स ‘0’ और ‘1’ पर काम करती हैं.
  • पारंपरिक डिजिटल प्रोसेसर (जैसे Nvidia GPU) की तुलना में 1,000 गुना तक तेज गणना करने का दावा किया गया है.
  • यह चिप डेटा को स्टोर और प्रोसेस, दोनों एक साथ करती है, जिससे ऊर्जा की खपत काफी कम हो जाती है.
  • यह चिप AI मॉडल्स को प्रशिक्षित करने और चलाने में क्रांति ला सकती है, जो वर्तमान में बिजली और समय की बड़ी खपत करते हैं.

2. लाइट-आधारित (ऑप्टिकल) AI चिप – ACCEL

  • इस चिप को सिंघुआ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है. इस चिप का नाम ACCEL (All-Analogue Chip Combining Electronics and Light) है.
  • यह चिप डेटा प्रोसेसिंग के लिए बिजली के बजाय प्रकाश (फोटॉन) का उपयोग करती है. यह एक फोटोनिक चिप है.
  • प्रयोगशाला परीक्षण में, इस चिप ने कुछ चुनिंदा AI कार्यों (जैसे इमेज रिकग्निशन) में Nvidia A100 चिप से 3,000 गुना अधिक तेज़ प्रदर्शन किया.
  • प्रकाश-आधारित होने के कारण, यह चिप पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक चिप्स की तुलना में बहुत अधिक तेज और 40 लाख गुना तक कम ऊर्जा की खपत करती है.

देश में चार नई सेमीकंडक्‍टर परियोजनाओं को स्‍वीकृति दी गई

  • केंद्र सरकार ने ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ (ISM) के तहत देश में चार नई सेमीकंडक्‍टर परियोजनाओं को स्वीकृति दी है. यह स्वीकृति 12 अगस्त को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में दी गई.
  • इन परियोजनाओं पर करीब 4.6 हजार करोड खर्च किए जाएंगे. ये परियोजनाएं ओडिसा, पंजाब और आंध्र प्रदेश में शुरू होंगे. नई स्वीकृत परियोजनाओं में ओडिसा में दो और पंजाब और आंध्र प्रदेश में एक-एक परियोजनाएं शुरू होंगे.
  • इसके साथ, भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के तहत मंजूर परियोजनाओं की कुल संख्या 10 हो गई है, जिनमें कुल 1.60 लाख करोड़ रुपये का निवेश छह राज्यों में हो रहा है.

ISM के तहत नई 4 परियोजनाएं

ओडिशा

1. ओडिशा में भुवनेश्वर के इंफो वैली में SiCSem प्राइवेट लिमिटेड, यूके की Clas-SiC Wafer Fab Ltd. के साथ मिलकर देश का पहला व्यावसायिक कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करेगा, जो सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) आधारित डिवाइस बनाएगा. इसका इस्तेमाल मिसाइल, रक्षा उपकरण, इलेक्ट्रिक वाहन, रेलवे, फास्ट चार्जर, डेटा सेंटर, घरेलू उपकरण और सोलर इन्वर्टर में होगा.

2. भुवनेश्वर के इंफो वैली में 3D Glass Solutions Inc. एक उन्नत पैकेजिंग और एम्बेडेड ग्लास सब्सट्रेट यूनिट स्थापित करेगी, जो दुनिया की सबसे उन्नत पैकेजिंग तकनीक भारत में लाएगी. इनका उपयोग रक्षा, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऑटोमोटिव, फोटोनिक्स और को-पैकेज्ड ऑप्टिक्स में होगा.

आंध्र प्रदेश

3. आंध्र प्रदेश में एडवांस सिस्टम इन पैकेज टेक्नोलॉजी (ASIP) दक्षिण कोरिया की APACT Co. Ltd. के साथ मिलकर एक सेमीकंडक्टर यूनिट स्थापित करेगी. इसका उत्पादन मोबाइल फोन, सेट-टॉप बॉक्स, ऑटोमोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में किया जाएगा.

पंजाब

4. पंजाब के मोहाली में Continental Device India Ltd. (CDIL) अपने मौजूदा संयंत्र का विस्तार करेगा, जहां उच्च-शक्ति वाले डिस्क्रीट सेमीकंडक्टर डिवाइस जैसे MOSFETs, IGBTs, Schottky Bypass Diodes और ट्रांजिस्टर बनाए जाएंगे. इसका इस्तेमाल ऑटोमोबाइल इलेक्ट्रॉनिक्स, ईवी चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर, रिन्यूएबल एनर्जी, पावर कन्वर्जन, औद्योगिक उपयोग और संचार ढांचे में होगा.

ISM के तहत पहले स्वीकृत की गई 6 सेमीकंडक्टर इकाइयां

  1. अमेरिकी कंपनी माइक्रोन अहमदाबाद के पास साणंद में एक सेमीकंडक्टर असेंबली और परीक्षण सुविधा स्थापित कर रही है. जनवरी 2026 में इसका संचालन शुरू होने की उम्मीद है.
  2. ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्प के साथ साझेदारी में, टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स प्राइवेट लिमिटेड गुजरात के धोलेरा में एक सेमीकंडक्टर फैब इकाई स्थापित कर रही है.
  3. एक अन्य टाटा कंपनी, टाटा सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट प्राइवेट लिमिटेड, असम के मोरीगांव में एक सेमीकंडक्टर इकाई स्थापित कर रही है.
  4. सीजी पावर, जापान की रेनेसास इलेक्ट्रॉनिक्स कॉरपोरेशन और थाईलैंड की स्टार्स माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स के साथ साझेदारी में, गुजरात के साणंद में एक सेमीकंडक्टर इकाई स्थापित कर रही है.
  5. भारतीय कंपनी केनेस सेमीकॉन प्राइवेट लिमिटेड गुजरात के साणंद में एक सेमीकंडक्टर इकाई स्थापित कर रही है.
  6. केंद्र सरकार ने 14 मई 2025 को उत्तर प्रदेश के जेवर में सेमीकंडक्टर प्लांट को मंजूरी दी. यह प्लांट एचसीएल और फॉक्सकॉन की साझेदारी में लगाया जाएगा. इसमें मोबाइल, लैपटॉप और गाड़ियों के लिए डिस्प्ले ड्राइवर चिप्स बनाए जाएंगे.

भारत का सेमीकंडक्टर मिशन (ISM)

  • भारत का सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) को वर्ष 2021 में इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के तत्त्वावधान में कुल 76,000 करोड़ रुपए के वित्तीय परिव्यय के साथ लॉन्च किया गया था.
  • ISM का मुख्य उद्देश्य घरेलू और विदेशी कंपनियों को भारत में चिप विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना है.

सेमीकंडक्टर क्या हैं?

  • सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) वे पदार्थ हैं जिसमें संवाहक (चालक) और विसंवाहक (गैर-चालक) दोनों के गुण होते हैं. सेमीकंडक्टर आमतौर पर सिलिकॉन या जर्मेनियम से बने होते हैं.
  • सेमीकंडक्टर चिप (इंटीग्रेटेड सर्किट), सेमीकंडक्टर के एक छोटे से सपाट टुकड़े पर इलेक्ट्रॉनिक सर्किट का एक सेट है. इनका उपयोग कंप्यूटर और स्मार्टफोन सहित कई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में किया जाता है.

ड्रोन और AI तकनीक से देश में पहली बार कृत्रिम बारिश का परीक्षण असफल रहा

  • देश में ड्रोन के जरिए सीमित जगह पर कृत्रिम बारिश (आर्टिफिशियल रेन) कराने का परीक्षण असफल हो गया. यह परीक्षण राजस्थान की राजधानी जयपुर के पास रामगढ़ डैम में 13 अगस्त को होना था जो कि ड्रोन के सही तरीके से काम नहीं करने के कारण असफल रहा.
  • यह परीक्षण राजस्थान कृषि विभाग ने अमेरिका व बेंगलुरु स्थित GenX AI कंपनी के साथ साझेदारी में किया था.
  • भारत में यह पहला ड्रोन आधारित कृत्रिम वर्षा का परीक्षण था. इसमें पारंपरिक हवाई जहाज आधारित क्लाउड सीडिंग तकनीक की जगह ड्रोन (मानवरहित हवाई यानों) का इस्तेमाल किया गया था.

कृत्रिम बारिश या क्लाउड सीडिंग क्या है?

  • ‘क्लाउड सीडिंग’ एक ऐसी तकनीक है, जिसके तहत रसायनों का उपयोग कर वर्षा कराई जाती है. इसे कृत्रिम वर्षा भी कहा जाता है.
  • इसमें बादलों में सिल्वर आयोडाइड (Agl), कैल्शियम क्लोराइड (CaCl2), पोटेशियम आयोडाइड (KI), या सोडियम क्लोराइड (NaCl) जैसे पदार्थ कृत्रिम नाभिक के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं.
  • ये पदार्थ बादलों में मौजूद जल वाष्प को संघनित होने में मदद करते हैं, जिससे पानी की बूंदें या हिम के टुकड़े बनते हैं. विश्व में सिल्वर आयोडाइड सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली कृत्रिम नाभिक है.
  • क्लाउड सीडिंग का उपयोग वर्षा में वृद्धि करने, ओलावृष्टि को कम करने, कोहरे को हटाने और वायु प्रदूषण को कम करने के लिए किया जाता है.

भारत में पहली बार जीन-संपादित भेड़ विकसित की गई

  • भारत में पहली बार जीन-संपादित भेड़ विकसित की गई है. यह उपलब्धि जम्मू-कश्मीर स्थित शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST) के वैज्ञानिकों ने CRISPR-Cas9 तकनीक का उपयोग करके प्राप्त की है.
  • इस परियोजना का उद्देश्य एक सामान्य भेड़ की तुलना में अधिक मांसपेशियों वाली प्राकृतिक रूप से जन्मी भेड़ प्राप्त करना था.
  • वैज्ञानिकों ने इसमें मायोस्टैटिन नामक जीन को बदला, जिससे मांसपेशियां 30 प्रतिशत तक बढ़ गया. इस भेड़ में कोई विदेशी DNA नहीं है, इसलिए यह भारत के मौसम के अनुकूल है.
  • इस परियोजना का नेतृत्व डॉ. रियाज शाह ने किया. SKUAST-कश्मीर पहले भी ‘नूरी’ नाम की पहली क्लोन पश्मीना बकरी बना चुका है.
  • क्या है जीन-संपादन
  • जीन-संपादन (Gene Editing) एक आधुनिक जैव प्रौद्योगिकी तकनीक है जिसकी सहायता से वैज्ञानिक किसी जीव के DNA (डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) में बदलाव कर सकते हैं.
  • CRISPR-Cas9 इस क्षेत्र में सबसे उन्नत तकनीक है जो आनुवंशिक सामग्री को जोड़ने, हटाने या बदलने में सक्षम है. भेंड को विकसित करने में इसी तकनीक का प्रयोग किया गया है.

टाइप 5 डायबिटीज़ को आधिकारिक तौर पर मान्यता मिली

  • टाइप 5 मधुमेह (डायबिटीज़) को रोग के एक अलग रूप के रूप में आधिकारिक तौर पर मान्यता दी गई है.
  • इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन (IDF) की वर्ल्ड कांग्रेस ऑफ डायबिटीज 2025 में टाइप 5 मधुमेह को पहली बयर नामित किया गया. यह सम्मेलन थाईलैंड के बैंकॉक में 7 से 10 अप्रैल 2025 तक आयोजित किया गया था.
  • कुपोषण से जुड़े मधुमेह को ‘टाइप-5 डायबिटीज’ के तौर पर नामित किया गया है. एक अनुमान के अनुसार कि दुनिया भर में 20-25 मिलियन लोग ‘टाइप-5 डायबिटीज’ से पीड़ित हैं. अधिकतर पीड़ित एशिया और अफ्रीका में हैं.
  • टाइप-5 डायबिटीज से पीड़ित लोग आमतौर पर कम वजन वाले होते हैं, उनके परिवार में डायबिटीज की कोई हिस्ट्री नहीं होती है और ऐसे लक्षण दिखते हैं जो टाइप-1 या टाइप-2 डायबिटीज से मेल नहीं खाते हैं.
  • ‘टाइप-5 डायबिटीज’ का का पहला मामला 1955 में जमैका में सामने आया था. उस समय, कुपोषण से संबंधित डायबिटीज को जे-टाइप डायबिटीज के रूप में परिभाषित किया गया था.
  • 1985 में, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने इसे अपने क्लासिफिकेशन में शामिल किया था, लेकिन सहायक साक्ष्य की कमी के कारण 1999 में इसे हटा दिया.
  • यह बीमारी टाइप-2 और टाइप-1 डायबिटीज से बिल्कुल अलग है. इस प्रकार की डायबिटीजवाले लोगों में इंसुलिन स्रावित करने की क्षमता में गहरा दोष होता है, जिसे पहले पहचाना नहीं गया था.

टाइप 1 और टाइप 2 डायबिटीज

  • टाइप 1 डायबिटीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर इंसुलिन नामक हार्मोन का उत्पादन करना बंद कर देता है. इंसुलिन रक्त में ग्लूकोज (चीनी) के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करता है. जब शरीर इंसुलिन का उत्पादन नहीं करता है, तो रक्त में ग्लूकोज का स्तर बहुत अधिक हो जाता है, जिससे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं.
  • टाइप 2 डायबिटीज एक ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर या तो पर्याप्त इंसुलिन नहीं बनाता है या इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं करता है, जिसके परिणामस्वरूप रक्त में शर्करा (ग्लूकोज) का स्तर बढ़ जाता है.

इसरो के SpaDeX मिशन ने ऐतिहासिक डॉकिंग सफलता हासिल की

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SpaDeX) मिशन ने 16 जनवरी 2025 को ऐतिहासिक डॉकिंग सफलता हासिल की. डॉकिंग के बाद एक ही अंतरिक्षयान के रूप में दो उपग्रहों का नियंत्रण सफल रहा.

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 30 दिसंबर 2024 को स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SpaDeX) मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च किया था.
  • SpaDeX मिशन को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लांच किया गया. इसे PSLV-C60 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया किया गया था.
  • इस मिशन के तहत PSLV-C60 के जरिए दो छोटे अंतरिक्ष यान ‘चेजर’ (SDX01) और ‘टारगेट’ (SDX02) भेजे गए थे. इनमें से प्रत्येक का वजन 220 किलोग्राम है.
  • प्रक्षेपण के कुछ ही मिनटों बाद दोनों अंतरिक्ष यान, रॉकेट से सफलतापूर्वक अलग होकर करीब 470 किलोमीटर की निचली कक्षा में स्थापित हुए थे.
  • इसरो ने 16 जनवरी 2025 को पहली बार अंतरिक्ष में दोनों उपग्रह ‘चेजर’ और ‘टारगेट’  की सफल डॉकिंग कराकर ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की. इसरो आने वाले दिनों में अनडॉकिंग और पावर ट्रांसफर की जांच करेगा.
  • लगातार तीन वर्ष से इसरो एक के बाद एक इतिहास रच रहा है. भारत ने 2023 में चंद्रयान मिशन में कामयाबी के साथ ही चंद्रमा की सतह पर अपने लैंडर उतारने वाला अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा देश बना. 2024 में आदित्य एल1 मिशन में सफलता हासिल की थी.

SpaDeX (स्पैडेक्स) डाकिंग क्या है?

  • SpaDeX का अर्थ होता है ‘स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट’ यानी अंतरिक्ष में यानों को ‘डॉक’ और ‘अनडॉक’ करना.
  • बिना किसी बाहरी सहायता के एक अंतरिक्षयान से दूसरे अंतरिक्षयान के जुड़ने को डाकिंग, जबकि अंतरिक्ष में एक दूसरे से जुड़े दो अंतरिक्ष यानों के अलग होने को अनडाकिंग कहते हैं.
  • अंतरिक्ष में देश के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए डॉकिंग क्षमता बेहद जरूरी है. इन लक्ष्यों में चंद्रमा से नमूने लाना, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएसएस) का निर्माण शामिल है.

‘इन-स्पेस डॉकिंग’ तकनीक के उपयोग

  • ‘इन-स्पेस डॉकिंग’ तकनीक की जरूरत उस समय होती है, जब एक कॉमन मिशन को अंजाम देने के लिए कई अंतरिक्षयानों को लॉन्च करने की जरूरत पड़ती है.
  • यह चंद्रयान-4 जैसे मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए भी अहम साबित होगा. साथ ही वहां से सैंपल लाने के साथ-साथ 2035 तक भारत के अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने जैसी योजनाओं के लिए बेहद अहम साबित होगा.

भारत दुनिया का चौथा देश बना

  • इस सफलता के साथ ही भारत दुनिया का चौथा देश बन गया जिसके पास अपनी स्पेस डॉकिंग जटिल तकनीक है. इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन ही ऐसा करने में सफल रहे हैं.
  • 1966 में जेमिनी आठ अंतरिक्षयान और एजेना टार्गेट व्हीकल की डॉकिंग प्रक्रिया पूरी कर अमेरिका डॉकिंग क्षमता को प्रदर्शित करने वाला दुनिया का पहला देश बना था.
  • तत्कालीन सोवियत संघ ने 1967 में कोसमोस 186 और कोसमोस 188 अंतरिक्ष यान को डॉक कर स्वचालित डॉकिंग का प्रदर्शन किया था.
  • चीन ने पहली बार 2011 में डॉकिेग क्षमता का प्रदर्शन किया, जब मानव रहित शेनझोउ-8 अंतरिक्षयान तियांगोंग-1 अंतरिक्ष लैब के साथ डाक किया गया था.

सबसे घातक प्रजातियों में से एक सिडनी फ़नल-वेब स्पाइडर की एक और प्रजाति की खोज

  • ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने दुनिया की सबसे घातक प्रजातियों में से एक सिडनी फ़नल-वेब स्पाइडर (Sydney funnel-web spider) की एक और प्रजाति की खोज की है.
  • नई फ़नल-वेब प्रजाति को ‘बिग बॉय’ उपनाम दिया गया है. यह पहले से अधिक बड़ी और अधिक जहरीली प्रजाति है.
  • 9 सेंटीमीटर लंबी इस प्रजाति को पहली बार 2000 के दशक की शुरुआत में सिडनी के पास ऑस्ट्रेलियाई सरीसृप पार्क में खोजा गया था.
  •  वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति को खोजने वाले वैज्ञानिक क्रिस्टेंसन के नाम पर इस प्रजाति का नाम एट्रैक्स क्रिस्टेंसनी (Atrax christenseni) रखा है.

नाड़ी तरंगिनी- CDSCO से मंजूरी प्राप्त करने वाला भारत का पहला आयुर्वेदिक चिकित्सा उपकरण

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में नाड़ी तरंगिनी उपकरण का उल्लेख किया था और इसकी प्रशंसा की थी. इसके बाद यह उपकरण चर्चा में आ गया था.
  • ‘नाड़ी तरंगिणी’ आयुर्वेदिक पल्स डायग्नोस्टिक उपकरण है जिसे पुणे के हिंजेवाड़ी की आत्रेय इनोवेशन्स कंपनी ने बनाया है.
  • यह उपकरण भारत का पहला आयुर्वेदिक चिकित्सा उपकरण है जिसे CDSCO (सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन) से मंजूरी मिली है. CDSCO देश में सौंदर्य प्रसाधन, दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के लिए राष्ट्रीय नियामक है.
  • नाड़ी तरंगिणी को डॉ. अनिरुद्ध जोशी ने IIT बॉम्बे में छह साल से अधिक समय तक शोध के बाद विकसित किया है.
  • नाड़ी तरंगिणी से नाड़ी की जांच करने पर 22 आयुर्वेदिक मानकों वाली 10 पेज की रिपोर्ट मिलती है. नाड़ी तरंगिणी की एक्‍यूरेसी लगभग 85 फीसदी है.

चर्चा में: ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस (hMPV)

  • चीन के बाद भारत में ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस (hMPV) के कुछ मामलों की पुष्टि के बाद यह  हाल के दिनों में चर्चा में रहा है.
  • स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार HMPV कोई नया वायरस नहीं है. इसे पहली बार 2001 में पहचाना गया था और यह कई वर्षों से पूरी दुनिया में फैल रहा है.
  • अमेरिकन लंग एसोसिएशन के अनुसार, ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस (hMPV) एक सामान्य श्वसन वायरस (common respiratory virus) है जो ऊपरी श्वसन संक्रमण (जैसे सर्दी) का कारण बनता है.
  • यह एक मौसमी बीमारी है जो आमतौर पर सर्दियों और शुरुआती वसंत में होती है, जो RSV और फ्लू के समान है. इस बीमारी की पहचान 2001 में नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने की थी.
  • hPMV संक्रमित व्यक्ति के साथ निकट संपर्क या वायरस से संक्रमित क्षेत्र के संपर्क में आने से यह बीमारी फैलती है. hMPV के लक्षण सामान्य सर्दी जैसे हैं.

भारत ने पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक दवा ‘नेफिथ्रोमाइसिन’ तैयार की

  • भारत ने पहली स्वदेशी एंटीबायोटिक दवा ‘नेफिथ्रोमाइसिन’ (Nafithromycin) तैयार की है. यह दवा समुदाय-अधिग्रहित बैक्टीरियल निमोनिया (CABP) नामक संक्रमण का तोड़ है.
  • एंटीबायोटिक नैफिथ्रोमाइसिन को बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंस काउंसिल (BIRAC) के सहयोग से विकसित किया गया है. इसे मिक्नाफ नाम से बाजार में उतारा गया है.
  • यह देश का पहला स्वदेशी रूप से विकसित एंटीबायोटिक है जिसका उद्देश्य एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध से निपटना है. यह एजिथ्रोमाइसिन की तुलना में दस गुना अधिक प्रभावी है.
  • यह दवा CABP रोगियों के लिए दिन में एक बार, तीन दिन तक दी जाएगी. यह पहला उपचार है, जिसमें मल्टी-ड्रग प्रतिरोधी (MDR) संक्रमण वाले मरीज भी शामिल हैं.
  • इस दवा पर 15 वर्षों में कई नैदानिक परीक्षण किए गए हैं. इनमें अमेरिका और यूरोप में हुए पहले व दूसरे चरण के परीक्षण भी शामिल हैं. भारत में इस दवा ने हाल ही में तीसरा चरण पूरा किया था.
  • यह दवा इसलिए भी काफी अहम है क्योंकि CABP के कारण हर साल लाखों की संख्या में बुजुर्ग मरीजों की मौत हो रही है.
  • वैश्विक स्तर पर CABP से सालाना मरने वालों में 23 फीसदी हिस्सा भारत का है. इसकी मृत्यु दर 14 से 30% के बीच है.
  • एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरियल संक्रमणों के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं. ये बैक्टीरिया को मारती हैं या उनके प्रजनन को रोकती हैं.