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भारत ने SFDR तकनीक का सफल परीक्षण किया

भारत ने हाल ही में SFDR (Solid Fuel Ducted Ramjet) तकनीक का सफल परीक्षण है. यह तकनीक भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करती है जिनके पास हवा-से-हवा में मार करने वाली लंबी दूरी की मिसाइलें बनाने की क्षमता है.

SFDR तकनीक क्या है?

  • मिसाइलें अपने साथ ईंधन और उसे जलाने के लिए ऑक्सीडाइजर (Oxidizer) दोनों ले जाती हैं, जिससे मिसाइल भारी हो जाती है.
  • SFDR एक ‘एयर-ब्रीदिंग’ (Air-breathing) इंजन तकनीक है. यह मिसाइल उड़ान के दौरान वायुमंडल से ही ऑक्सीजन लेती है.
  • इसे अपने साथ भारी ऑक्सीडाइजर नहीं ले जाना पड़ता, इसलिए इसमें अधिक ईंधन भरा जा सकता है. इससे मिसाइल की रेंज (दूरी) और स्पीड दोनों बहुत बढ़ जाती हैं.
  • यह तकनीक मिसाइल को बहुत तेज गति (ध्वनि की गति से कई गुना ज्यादा) से उड़ने में मदद करती है.
  • इस तकनीक को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की प्रयोगशालाओं द्वारा विकसित किया गया है.

भारत का पहला स्वदेशी प्रदूषण नियंत्रण पोत भारतीय तटरक्षक बल में शामिल

भारतीय तटरक्षक बल ने पहला स्वदेशी प्रदूषण नियंत्रण पोत (Pollution Control Vessel) ‘ICGS समुद्र प्रताप’ को अपने बेडे में शामिल किया. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 5 जनवरी 26 को गोवा में इस पोत का शुभारंभ किया.

ICGS समुद्र प्रताप: एक दृष्टि

  • समुद्र प्रताप भारत की पहली स्‍वदेशी रूप से डिजाइन की गई प्रदूषण नियंत्रण पोत है. इसका निर्माण गोवा शिपयार्ड लिमिटेड (GSL) द्वारा किया गया है.
  • इसमें समुद्र में फैले तेल को साफ करने के लिए अत्याधुनिक ‘बूम’ (Booms) और ‘स्किमर्स’ (Skimmers) लगे हैं. जहाज में तेल के नमूनों का विश्लेषण करने के लिए एक आधुनिक प्रयोगशाला भी मौजूद है.
  • यह भारतीय तटरक्षक (कोस्‍टगार्ड) ट्रीट की अबतक की सबसे बड़ी यह पोत है. यह जहाज लगभग 2,500 टन विस्थापन क्षमता वाला है और उन्नत रडार और संचार प्रणालियों से लैस है.
  • यह पोत समुद्री प्रदूषण नियंत्रण तथा तलाश और बचाव कार्यों में मदद करेगा और देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र की रक्षा सुनिश्चित करेगा.
  • प्रदूषण नियंत्रण के मामले में भारतीय तटरक्षक बल (ICG) भारत की ‘केंद्रीय समन्वय प्राधिकरण’  है. इसका मतलब है कि भारत के समुद्री क्षेत्रों में तेल रिसाव जैसी किसी भी बड़ी घटना से निपटने की मुख्य जिम्मेदारी ICG की ही होती है.

सामरिक महत्व

  • भारत के पास 7,500 किमी से अधिक लंबी तटरेखा है. तेल रिसाव जैसी आपदाओं के समय यह जहाज समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine Ecosystem) को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
  • यह विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) में प्रदूषण की निगरानी और नियंत्रण के लिए तटरक्षक बल की क्षमता को कई गुना बढ़ा देगा.
  • इस पर एक चेतक या ध्रुव हेलीकॉप्टर के संचालन के लिए एक हैंगर और हेलीपैड की सुविधा है, जिससे हवाई निगरानी आसान हो जाती है.

सूर्यास्त्र: भारत का पहला स्वदेशी यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर

भारतीय सेना ने सूर्यास्त्र (Suryastra) रॉकेट सिस्टम के खरीद के लिए  निजी रक्षा निर्माता ‘NIBE Limited’ के साथ ₹293 करोड़ का अनुबंध किया है. यह भारत का पहला स्वदेशी यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर रॉकेट लॉन्चर है, जिसकी मारक क्षमता 150 से 300 किमी तक है.

सूर्यास्त्र की मुख्य विशेषताएं: एक दृष्टि

  • सूर्यास्त्र भारत का पहला स्वदेशी यूनिवर्सल मल्टी-कैलिबर (Universal Multi-Calibre) लंबी दूरी का रॉकेट लॉन्चर सिस्टम है.
  • यह 300 किमी की दूरी तक सटीक हमला करने में सक्षम है. यह पहली बार है जब भारत में 300 किमी रेंज वाला रॉकेट लॉन्चर स्वदेशी रूप से बनाया जा रहा है.
  • इसका CEP (Circular Error Probable) 5 मीटर से भी कम है. इसका मतलब है कि यह अपने लक्ष्य को अचूक सटीकता के साथ नष्ट कर सकता है.
  • यह एक ‘यूनिवर्सल’ लॉन्चर है, यानी यह 122mm, 160mm और 306mm जैसे विभिन्न कैलिबर के रॉकेट दाग सकता है.
  • यह प्रणाली 100 किमी तक की रेंज में ‘कामिकेज़ ड्रोन’ या लोइटरिंग म्यूनिशन (जैसे SkyStriker) भी लॉन्च कर सकती है, जो हवा में रहकर लक्ष्य की पहचान करते हैं और फिर उसे तबाह कर देते हैं.
  • इसे BEML के 6×6 हाई-मोबिलिटी ट्रक पर लगाया गया है, जिससे यह ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर तेजी से चल सकता है और ‘शूट एंड स्कूट’ (फायर करने के तुरंत बाद जगह बदलना) तकनीक का उपयोग कर दुश्मन के जवाबी हमले से बच सकता है.
  • इसे पुणे स्थित निजी रक्षा कंपनी NIBE Limited ने विकसित किया है. इसके लिए इजराइल की प्रसिद्ध रक्षा कंपनी Elbit Systems के साथ तकनीकी सहयोग किया गया है.
  • यह इजराइल के PULS (Precise & Universal Launching System) तकनीक पर आधारित है.
  • हालांकि भारत के पास ‘पिनका’ रॉकेट सिस्टम है, लेकिन सूर्यास्त्र की 300 किमी की रेंज और मल्टी-कैलिबर क्षमता इसे और अधिक घातक बनाती है.

भारत ने पिनाका गाइडेड रॉकेट का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया

भारत ने 29 दिसम्बर को लंबी दूरी के पिनाका गाइडेड रॉकेट (Pinaka Guided Rocket System) का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया. परीक्षण के दौरान रॉकेट ने अपने निर्धारित लक्ष्य को बहुत ही सटीकता के साथ भेदा.

परीक्षण के मुख्य बिन्दु

  • यह परीक्षण रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने चांदीपुर के एकीकृत परीक्षण स्थल से किया. रॉकेट का 120 किमी की अधिकतम दूरी के लिए परीक्षण किया गया.
  • इस परीक्षण का मुख्य उद्देश्य रॉकेट की सटीकता (Accuracy), रेंज और नेविगेशन कंट्रोल सिस्टम की जांच करना था.

पिनाका गाइडेड रॉकेट की विशेषताएं

  • पिनाका रॉकेट सिस्टम पहले से ही भारतीय सेना का हिस्सा है, लेकिन इसका ‘गाइडेड’ वर्जन इसे और अधिक घातक बनाता है.
  • इसमें नेविगेशन, कंट्रोल और गाइडेंस सिस्टम लगा है, जो इसे हवा में ही अपना रास्ता सुधारने की अनुमति देता है.
  • इसकी मारक क्षमता 70 से 90 किलोमीटर तक है (जो पुराने अनगाइडेड वर्जन की तुलना में लगभग दोगुनी है).
  • ‘गाइडेड’ होने के कारण यह दुश्मन के ठिकानों को पिन-पॉइंट सटीकता के साथ नष्ट कर सकता है.
  • पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर (MBRL) मात्र 44 सेकंड में 12 रॉकेट दागने में सक्षम है.
  • यह पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक पर आधारित है. इसे DRDO की प्रयोगशालाओं—ARDE (Armament Research and Development Establishment) और HEMRL (High Energy Materials Research Laboratory) द्वारा विकसित किया गया है.

अगली पीढ़ी की आकाश मिसाइल ‘आकाश–एनजी’ प्रणाली का परीक्षण

भारत ने 25 दिसंबर 2025 को अगली पीढ़ी की आकाश मिसाइल ‘आकाश-एनजी’ (Akash New Generation) मिसाइल प्रणाली का एक और सफल परीक्षण किया. यह परीक्षण भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने ओडिशा के चांदीपुर स्थित एकीकृत परीक्षण रेंज (ITR) से किया.

यह परीक्षण विशेष रूप से अत्यधिक ऊंचाई पर तेजी से आते हुए दुश्मन के लक्ष्यों को नष्ट करने की क्षमता जांचने के लिए किया गया था.

आकाश-एनजी की विशेषताएं

  • यह मिसाइल पुरानी ‘आकाश’ मिसाइल का पूरी तरह से नया और आधुनिक संस्करण है.
  • यह 70 से 80 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य को भेद सकती है (पुरानी आकाश की रेंज 25-30 किमी थी).
  • यह मैक 2.5 से 3 (ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना तेज) की रफ्तार से उड़ती है.
  • इसमें पुरानी आकाश के ‘राजेंद्र’ रडार की अपेक्षा आधुनिक ‘मल्टी-फंक्शन रडार’ लगे हैं.
  • यह पुरानी मिसाइल की तुलना में बहुत हल्की और छोटी है, जिससे इसे किसी भी ट्रक या मोबाइल लॉन्चर से कहीं भी ले जाना आसान है.
  • इसमें डुअल-पल्स सॉलिड रॉकेट मोटर का उपयोग किया गया है, जो इसे उड़ान के अंतिम क्षणों में भी जबरदस्त रफ्तार देता है.
  • यह प्रणाली एक साथ कई दिशाओं से आने वाले दुश्मन के विमानों, ड्रोनों या क्रूज मिसाइलों को ट्रैक कर सकती है और उन पर हमला कर सकती है.
  • भारत पहले ही ‘आकाश’ मिसाइल का निर्यात आर्मेनिया जैसे देशों को कर रहा है. ‘आकाश-एनजी’ की सफलता के बाद कई अन्य देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है.

भारत के पहले स्वदेश निर्मित हाइड्रोजन फ्यूल सेल वेसल का उद्घाटन

भारत के पहले स्वदेश निर्मित ‘हाइड्रोजन फ्यूल सेल वेसल’ (Indigenous Hydrogen Fuel Cell Vessel) का उद्घाटन 11 दिसंबर 2025 को केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने किया था.

यह उद्घाटन समारोह वाराणसी के नमो घाट पर हुआ, जहां से इस जहाज के वाणिज्यिक संचालन की शुरुआत की गई. यह हरित ऊर्जा की दिशा में एक बड़ा कदम है.

मुख्य बिन्दु

  • यह हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक पर आधारित एक जहाज है. इसमें ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग किया जाता है, जो रासायनिक प्रतिक्रिया के माध्यम से बिजली उत्पन्न करता है.
  • इसका मुख्य उद्देश्य जल परिवहन में कार्बन उत्सर्जन को शून्य करना और ‘हरित नौका’ (Green Vessel) पहल को बढ़ावा देना है.
  • डीजल इंजन की तुलना में यह जहाज लगभग बिना किसी शोर और कंपन (Vibration) के चलता है. इस जहाज से कोई धुआं या हानिकारक गैस नहीं निकलती. इसमें केवल पानी (H₂O) ही उप-उत्पाद (by-product) के रूप में निकलता है.
  • यह पूरी तरह से वातानुकूलित (Air-conditioned) यात्री नौका है. इसमें लगभग 50 यात्रियों के बैठने की क्षमता है.
  • यह ‘मेक इन इंडिया’ के तहत एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि इसे स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है. इसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) ने किया है.

पनडुब्बी रोधी युद्ध पोत माहे को नौसेना में शामिल किया गया

भारतीय नौसेना ने 24 नवंबर को मुंबई की नौसेना गोदी में पहले पनडुब्बी रोधी युद्ध पोत (Anti-Submarine Warfare) माहे (INS Mahe) का जलावतरण किया. इस समारोह की अध्यक्षता सेनाध्यक्ष जनरल उपेंद्र द्विवेदी की.

आईएनएस माहे: मुख्य बिन्दु

  • यह ‘माहे’ श्रेणी के आठ पनडुब्बी रोधी उथले जलयान (ASW-SWC) में से पहला पोत है. इसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (CSL) ने किया है.
  • आईएनएस माहे में 80% से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है, जो भारत की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल और पोत डिजाइन तथा निर्माण में बढ़ती विशेषज्ञता को दर्शाता है.
  • इसे मुख्य रूप से तटीय जल (Shallow Waters) में पनडुब्बियों का पता लगाने (Hunt), निगरानी करने और उन्हें बेअसर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
  • इसका नाम मालाबार तट पर स्थित ऐतिहासिक तटीय शहर माहे के नाम पर रखा गया है. इसके क्रेस्ट (प्रतीक चिन्ह) पर उरुमी (केरल की लचीली तलवार) बनी है, जो इसकी चपलता (Agility), सटीकता और घातक क्षमता का प्रतीक है. पोत का आदर्श वाक्य ‘साइलेंट हंटर्स’ है.
  • अपनी मारक क्षमता, स्टील्थ तकनीक (Stealth Technology) और गतिशीलता के मिश्रण के साथ, आईएनएस माहे पश्चिमी समुद्री तट पर भारत की तटीय रक्षा को मजबूत करने और समुद्री हितों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.

भारतीय सेना ने स्वदेश निर्मित SDRs खरीदने के लिए अनुबंध किया

भारतीय सेना ने पहली बार स्वदेशी डिजाइन और निर्मित ‘सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो’ (SDRs) का पहला बैच खरीदने के लिए अनुबंध किया है.

यह कदम भारतीय सेना की संचार क्षमताओं को मजबूत करने और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

अनुबंध के मुख्य बिन्दु

  • यह भारतीय सेना द्वारा खरीदा गया पहला स्वदेशी डिज़ाइन और निर्मित सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (SDR) है.
  • SDR का डिजाइन रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने जबकि इसका निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL) ने किया है.

सॉफ्टवेयर डिफाइंड रेडियो (SDR)

  • SDR एक ऐसा वायरलेस संचार उपकरण है जहाँ रेडियो सिस्टम के घटकों (जैसे मॉड्यूलेशन, डीमॉड्यूलेशन, फ़िल्टरिंग आदि) को आमतौर पर सॉफ्टवेयर के माध्यम से बदला जा सकता है. पहले यह काम हार्डवेयर (जैसे एनालॉग सर्किट) के माध्यम से किया जाता रहा.

SDR का उपयोग

  • सैन्य और सुरक्षा: विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मानकों का समर्थन करने वाले संचार उपकरणों के लिए.
  • दूरसंचार: 5G जैसे नए वायरलेस नेटवर्क के बेस स्टेशनों में.
  • शोध एवं विकास: नए वायरलेस प्रोटोकॉल और संचार तकनीकों के परीक्षण के लिए.
  • शौकिया रेडियो (Ham Radio): शौकिया रेडियो ऑपरेटरों द्वारा प्रयोगों और लचीले संचार के लिए.

पनडुब्बी रोधी युद्धपोत ‘आईएनएस माहे’ को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया

स्वदेश निर्मित पनडुब्बी रोधी युद्धपोत ‘आईएनएस माहे’ (INS Mahe) को 25 अक्टूबर 2025 को भारतीय नौसेना में शामिल किया गया है. यह भारतीय नौसेना की पनडुब्बी रोधी क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण वृद्धि है.

आईएनएस माहे

  • आईएनएस माहे, पनडुब्बी रोधी युद्धपोत शैलो वॉटर क्राफ्ट (ASW SWC – Anti-Submarine Warfare Shallow Water Craft) है.
  • यह स्वदेशी रूप से विकसित ASW SWC श्रृंखला का पहला जहाज है, जिसे भारतीय नौसेना में शामिल किया गया है.
  • इसका निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड (Cochin Shipyard Limited – CSL) द्वारा किया गया है. यह उन्नत टॉरपीडो, रॉकेट और सोनार सिस्टम से लैस है.
  • यह लगभग 80% स्वदेशी उपकरणों से लैस है, जो भारत के आत्मनिर्भर भारत (Aatmanirbhar Bharat) मिशन की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है.
  • इस युद्धपोत को मुख्य रूप से तटीय क्षेत्रों (Shallow Water) में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उनसे निपटने की नौसेना की क्षमता को मजबूत करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
  • इस युद्धपोत का नाम पुडुचेरी केंद्र शासित प्रदेश के ऐतिहासिक माहे बंदरगाह शहर के नाम पर रखा गया है, जो भारत की समृद्ध समुद्री विरासत का प्रतीक है.

तेजस LCA MK-1A लडा़कू जेट विमान का अनावरण

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के नासिक प्लांट में निर्मित पहले तेजस LCA MK-1A लड़ाकू विमान ने 17 अक्टूबर 2025 को अपनी पहली उड़ान भरी.

  • इस अवसर पर भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मौजूद थे. इस दौरान रक्षा मंत्री ने HAL के नासिक प्लांट में LCA के लिए तीसरी प्रोडक्शन लाइन और HTT-40 ट्रेनर विमान के लिए दूसरी प्रोडक्शन लाइन का भी उद्घाटन किया.
  • LCA MK-1A, भारतीय वायुसेना से हाल ही में हटाए गए MiG-21 विमानों की जगह लेगा.

तेजस LCA MK-1A

  • तेजस LCA MK-1A (लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट मार्क-1A) भारत का एक उन्नत और स्वदेशी रूप से विकसित बहु-भूमिका वाला लड़ाकू विमान है. यह तेजस LCA MK-1 का उन्नत संस्करण है.
  • यह 4.5वीं पीढ़ी का उन्नत मल्टी-रोल फाइटर जेट है जिसकी गति मैक 1.8 तक (लगभग 2,222 किमी प्रति घंटा) है.
  • यह हवा से हवा में ईंधन भरने (Air-to-Air Refueling – IFR) की क्षमता से सुसज्जित है.

लखनऊ में निर्मित ब्रह्मोस मिसाइलों की पहली खेप रवाना

लखनऊ में निर्मित ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों की पहली खेप को 18 अक्टूबर 2025 (शनिवार) को रवाना किया गया.

  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संयुक्त रूप से मिसाइलों की पहली खेप को रवाना किया.
  • यह खेप ‘मेक इन इंडिया, मेक फॉर द वर्ल्ड’ पहल के तहत भारत की बढ़ती स्वदेशी रक्षा क्षमताओं का प्रतीक है.
  • इस अत्याधुनिक केंद्र में प्रतिवर्ष 80 से 100 ब्रह्मोस मिसाइलों का उत्पादन करने का लक्ष्य है, जिसे बाद में बढ़ाया जा सकता है.
  • इस सुविधा से अगले वित्तीय वर्ष से लगभग ₹3,000 करोड़ का कारोबार होने और ₹500 करोड़ का जीएसटी राजस्व मिलने की उम्मीद है.

लखनऊ ब्रह्मोस यूनिट

  • लखनऊ ब्रह्मोस निर्माण यूनिट, उत्तर प्रदेश डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर (UPDIC) की सबसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में से एक है, जो मिसाइल के असेंबली, इंटीग्रेशन और परीक्षण (Testing) का पूरा काम भारत में ही करती है.
  • इस अत्याधुनिक केंद्र में प्रतिवर्ष 80 से 100 ब्रह्मोस मिसाइलों का उत्पादन करने का लक्ष्य है, जिसे बाद में बढ़ाया जा सकता है.

ब्रह्मोस मिसाइल

  • ब्रह्मोस (BrahMos) मिसाइल दुनिया की सबसे तेज़ और घातक सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में से एक है. यह भारत की रक्षा क्षमताओं की रीढ़ मानी जाती है और ‘मेक इन इंडिया’ का एक प्रमुख प्रतीक है.
  • यह मिसाइल भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस के एनपीओ मशीनोस्ट्रोयेनिया का एक संयुक्त उद्यम है, जिसके तहत ब्रह्मोस एयरोस्पेस का गठन किया गया है.
  • इसका नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मोस्कवा नदी के नाम पर रखा गया है.
  • अपनी सुपरसोनिक गति (मैक 3), उच्च सटीकता और विस्तारित मारक क्षमता के कारण भारतीय सशस्त्र बलों की रीढ़ मानी जाती है.
  • इसके उन्नत संस्करणों की रेंज 450 किमी से 800 किमी तक है. इसे भूमि (मोबाइल ऑटोनॉमस लॉन्चर से), समुद्र (युद्धपोतों और पनडुब्बियों से) और वायु (Su-30MKI फाइटर जेट से) लॉन्च किया जा सकता है.

स्‍वदेशी स्टील्थ युद्धपोत उदयगिरि और हिमगिरि भारतीय नौसेना के बेड़े में श‍ामिल

  • अत्याधुनिक स्‍वदेशी स्टील्थ युद्धपोत ‘उदयगिरि’ और ‘हिमगिरि’ को 26 अगस्त को भारतीय नौसेना के बेड़े में शामिल किया गया.
  • रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने विशाखापत्तनम स्थित नौसेना अड्डे पर इन दोनों युद्धपोतों का जलावतरण किया.
  • उदयगिरि और हिमगिरि दोनों युद्धपोतों को भारत सरकार के ‘प्रोजेक्ट 17A’ के तहत विकसित किया गया है.
  • ‘उदयगिरि’ को मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) ने, वहीं ‘हिमगिरि’ को गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) ने बनाया है. ऐसा पहली बार है, जब दो युद्धपोतों का एकसाथ एक ही जगह पर जलावतरण किया गया.

प्रोजेक्ट 17A (नीलगिरि श्रेणी)

  • सरकार ने वर्ष 2015 में ‘प्रोजेक्ट 17A‘ को मंज़ूरी दी थी. इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत 50,000 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत के सात स्टील्थ युद्धपोतों का निर्माण किया जाना है. इन युद्धपोतों को नीलगिरि श्रेणी के फ्रिगेट नाम से जाना जाता है.
  • इन सात युद्धपोतों में से, तीन का अनुबंध गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE) को प्रदान किया गया था, जबकि अन्य चार युद्धपोतों का अनुबंध मझगांव डॉक्स लिमिटेड (MDL) को दिया गया था.
  • GRSE द्वारा बनाए जा रहे तीन स्टील्थ युद्धपोत- हिमगिरि, दूनागिरि और विंध्यगिरि हैं. MDL द्वारा बनाए जा रहे चार स्टील्थ युद्धपोत हैं- नीलगिरि, उदयगिरि, तारागिरि और महेंद्रगिरि.
  • प्रोजेक्ट 17A (नीलगिरि श्रेणी) के तहत निर्मित युद्धपोत, ‘प्रोजेक्ट 17’ (शिवालिक श्रेणी) के तहत निर्मित किए गए तीन  युद्धपोतों का उन्नत संस्करण है.
  • INS शिवालिक (F47), INS सतपुड़ा (F48), और INS सह्याद्री (F49) शिवालिक श्रेणी के तहत निर्मित किए गए तीन  युद्धपोत हैं जो भारतीय नौसेना के सेवा में हैं.
  • ‘हिमगिरि’ युद्धपोत, नौसेना के प्रोजेक्ट 17A के अंतर्गत GRSE द्वारा बनाए जा रहे तीन स्टील्थ युद्धपोतों में से पहला है.
  • नीलगिरि और उदयगिरि युद्धपोत पहले ही MDL द्वारा भारतीय नौसेना को सौंपा जा चुका है.
  • प्रोजेक्ट 17A के तहत निर्मित सभी युद्धपोतों का डिज़ाइन और निर्माण देश में ही किया जा रहा है और इनमें 75% अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया जाएगा.

स्टील्थ युद्धपोत क्या होता है?

  • स्टील्थ युद्धपोत अपनी निर्माण प्रक्रिया में स्टील्थ प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हैं, जिससे जहाज को विभिन्न पहचान तकनीकों, जैसे रडार, इन्फ्रारेड, सोनार और अन्य विधियों द्वारा पता लगाना कठिन होता है.

उदयगिरि और हिमगिरि: मुख्य विशेषताएं

  • दोनों युद्धपोत उदयगिरि और हिमगिरि करीब 6,700 टन के हैं और पूर्ववर्ती शिवालिक-क्लास युद्धपोतों से आकार में करीब 5% बड़े हैं.
  • इन स्टील्थ युद्धपोतों को बहुत सारे हथियारों से लैस किया जा सकता है. मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें भी इनसे आसानी से दागे जा सकते हैं.
  • इनकी डिजाइन ऐसी है कि रडार की पकड़ से बच जाते हैं. इन जहाजों के पास एंटी-सबमरीन हथियार भी हैं. ये ब्रह्मोस मिसाइल, टॉरपीडो और रॉकेटों आदि से भी लैस हैं.
  • यह युद्धपोत डीजल इंजनों और गैस टर्बाइनों के संयोजन से संचालित होता है. इसकी अधिकतम गति 30 नॉटिकल माइल्स है.
  • 149 मीटर लंबा और 6,670 टन वजनी हिमगिरि, GRSE के 65 वर्षों के इतिहास में अब तक निर्मित सबसे बड़ा और सबसे उन्नत गाइडेड-मिसाइल फ्रिगेट है.

MDL और GRSE: एक दृष्टि

  • GRSE (गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स), कोलकाता में स्थित एक प्रमुख भारतीय जहाज निर्माण कंपनी है. यह रक्षा मंत्रालय के तहत काम करती है. यह भारतीय नौसेना और भारतीय तटरक्षक बल के लिए युद्धपोतों और अन्य जहाजों का निर्माण करती है.
  • MDL (माझगाव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड) मुंबई में स्थित भारत का एक प्रमुख शिपयार्ड है. यह भारतीय नौसेना के लिए युद्धपोत, पनडुब्बियां और अपतटीय प्लेटफार्मों का निर्माण करता है. 1774 में स्थापित, यह भारत का सबसे बड़ा शिपयार्ड है.