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अमूल को वैश्विक सहकारी समितियों की रैंकिंग में प्रथम स्थान

अमूल (Amul) को हाल ही में जारी वैश्विक सहकारी समितियों की रैंकिंग में प्रथम स्थान घोषित किया गया है. यह घोषणा कतर की राजधानी दोहा में आयोजित इंटरनेशनल कोऑपरेटिव अलायंस (ICA) कॉन्फ्रेंस के दौरान किया गया.

मुख्य बिन्दु

  • इस रैंकिंग में भारत की एक और प्रमुख सहकारी संस्था, इफको (IFFCO – इंडियन फार्मर्स फर्टिलाइजर कोऑपरेटिव लिमिटेड), ने विश्व स्तर पर दूसरा स्थान हासिल किया है.
  • अमूल को यह प्रतिष्ठित रैंकिंग ‘सकल घरेलू उत्पाद (GDP) प्रति व्यक्ति प्रदर्शन’ (Turnover relative to GDP per capita) के आधार पर मिली है.
  • अमूल का संचालन गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (GCMMF), जो अमूल ब्रांड का संचालन करता है.
  • इफको (IFFCO) भारत के किसानों के स्वामित्व वाली एक उर्वरक (Fertiliser) सहकारी संस्था है. इफको, लाखों किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले उर्वरक और कृषि उत्पाद प्रदान करके देश की खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादकता में महत्वपूर्ण योगदान देती है.

दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन का शुभारंभ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्तूबर दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन (Mission for Aatmanirbharta in Pulses) का शुभारंभ किया था. यह मिशन प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) के साथ शुरू किया गया.

इस मिशन का मुख्य उद्देश्य देश में दालों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता को कम करना है.

मिशन की प्रमुख बातें

  • यह मिशन छह वर्षों (2025-26 से 2030-31) के लिए ₹11,440 करोड़ के कुल परिव्यय के साथ शुरू किया गया है.
  • इसका मुख्य लक्ष्य दालों के उत्पादन में देश को आत्मनिर्भर बनाना और आयात पर निर्भरता को कम करना है. तूर (अरहर), उड़द, और मसूर के उत्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.
  • वर्ष 2030-31 तक देश में दालों का उत्पादन 350 लाख टन तक बढ़ाये जाने का लक्ष्य है.
  • अगले चार वर्षों के लिए, पंजीकृत किसानों से तूर, उड़द और मसूर की 100% खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सुनिश्चित की जाएगी. यह खरीद नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) जैसी सरकारी एजेंसियां करेंगी.

यह मिशन कई स्तरों पर काम करेगा:

  1. उत्पादकता में वृद्धि:उच्च उत्पादकता वाली, कीट-प्रतिरोधी और जलवायु-अनुकूल किस्मों के बीजों का विकास और वितरण किया जाएगा. किसानों को मुफ्त बीज किट वितरित की जाएंगी.
  2. क्षेत्र विस्तार: खाली पड़ी ज़मीन और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) के माध्यम से दालों की खेती के तहत क्षेत्रफल को बढ़ाया जाएगा.
  3. मूल्य श्रृंखला का सुदृढ़ीकरण: कटाई के बाद के नुकसान को कम करने के लिए 1,000 नई प्रोसेसिंग और पैकेजिंग इकाइयाँ स्थापित किया जाएगा.
  4. किसानों के लिए समर्थन: किसानों के कौशल को बढ़ाने के लिए संरचित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. वैश्विक कीमतों की निगरानी के लिए एक तंत्र स्थापित किया जाएगा ताकि किसानों के हितों की रक्षा हो सके.

यह मिशन भारत को दालों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने और किसानों की आय में वृद्धि करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता होने के बावजूद, अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए अभी भी 15-20% दालों का आयात करता है.

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना का शुभारंभ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्तूबर प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) का शुभारंभ किया था. यह भारत सरकार की योजना है. यह योजना दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन के साथ शुरू किया गया.

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के तहत कृषि उत्पादकता के मामले में अत्यंत पिछड़े जिलों को अन्य विकसित जिलों के बराबर लाना और कृषि को अधिक आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाना है.

योजना के मुख्य उद्देश्य

  1. उत्पादकता में वृद्धि
  2. किसानों को फसल विविधीकरण की ओर प्रेरित करना
  3. पंचायत एवं प्रखंड स्तर पर भंडारण क्षमता में वृद्धि
  4. सिंचाई सुविधा में सुधार
  5. कृषि ऋण को आसान बनाना

योजना में शामिल जिले

  • इस योजना में देश के उन 100 जिलों को शामिल किया जाएगा, जो कृषि उत्पादकता में पिछड़े हैं. प्रत्येक राज्य से कम से कम एक जिला जरूर शामिल किया जाएगा.
  • पात्र जिलों का चयन तीन प्रमुख आधार पर किया जाएगा. ये आधार हैं:
  1. कम कृषि उत्पादकता
  2. कम फसल सघनता
  3. कम लोन वितरण

योजना की प्रमुख बातें

  • इस योजना से लगभग 1.7 करोड़ छोटे और सीमांत किसानों को लाभ मिलने का अनुमान है.
  • यह योजना पाँच वर्षों के लिए है, जो 2025-26 से शुरू होकर 2029-30 तक रहेगी.
  • इसपर प्रत्येक वर्ष 24 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे और 1.70 करोड़ किसानों को फायदा होगा.
  • इसका मॉडल नीति आयोग के आकांक्षी जिला कार्यक्रम से लिया गया है.
  • आकांक्षी जिला कार्यक्रम भारत सरकार की एक पहल है जिसका उद्देश्य देश के सबसे कम विकसित जिलों में सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है.

सहकार-आधारित सीबीजी और स्प्रे ड्रायर पोटाश ग्रेन्युल परियोजना

  • गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह ने 5 अक्तूबर को महाराष्ट्र में भारत की पहली सहकार-आधारित सीबीजी और स्प्रे ड्रायर पोटाश ग्रेन्युल परियोजना (Cooperative‑Run CBG & Spray Dryer Potash Project) का उद्घाटन किया.
  • अहिल्यानगर जिले के कोपरगांव स्थित सहकार महर्षि शंकरराव कोल्हे सहकारी चीनी मिल में यह परियोजना शुरू की गयी है.
  • श्री शाह ने कहा कि देश भर की 15 सहकारी चीनी मिलों में इस तरह की इकाइयाँ स्थापित की जाएँगी.

परियोजना की विशेषताएं

  • यह भारत में एक महत्वपूर्ण पहल है जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा और उर्वरक का उत्पादन होगा.
  • इस  परियोजना के माध्यम से कृषि अपशिष्ट को स्वच्छ ईंधन (CBG/CNG) और जैविक पोटाश उर्वरक में बदला जाएगा. इससे पर्यावरण संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाने में मदद मिलेगी.
  • यह परियोजना भारत की पहली सहकारी-आधारित (Cooperative-Run) ‘संपीड़ित बायो-गैस (CBG) और स्प्रे ड्रायर पोटाश ग्रेन्युल’ परियोजना है.

परियोजना के उद्देश्य

  1. स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन: कृषि और जैविक कचरे, जैसे गन्ने की प्रेसमड (press mud) और फसल के अवशेषों का उपयोग करके संपीड़ित बायो-गैस (CBG) का उत्पादन करना. इस CBG का उपयोग CNG के विकल्प के रूप में परिवहन और उद्योगों में किया जाएगा.
  2. पोटाश उर्वरक उत्पादन: इस प्रक्रिया के उप-उत्पादों (by-products) का उपयोग करके ‘स्प्रे ड्रायर’ तकनीक से उच्च गुणवत्ता वाले पोटाश ग्रेन्युल (Potash Granules) उर्वरक का निर्माण करना. यह किसानों को आयातित पोटाश पर निर्भरता कम करेगा.

दालों में आत्मनिर्भरता के लिए एक राष्ट्रीय मिशन को मंजूरी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने दालों में आत्मनिर्भरता के लिए एक राष्ट्रीय मिशन को मंजूरी दी है. इस मिशन का मुख्य उद्देश्य देश में दालों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता को कम करना है.

मिशन की मुख्य विशेषताएं

विशेषताविवरण
समयावधिछह वर्ष (2025-26 से 2030-31 तक).
वित्तीय परिव्यय₹11,440 करोड़.
मुख्य लक्ष्य2030-31 तक दालों का उत्पादन 350 लाख टन तक बढ़ाना.
फोकस वाली दालेंतूर (अरहर), उड़द, और मसूर के उत्पादन पर विशेष ध्यान.
खरीद की गारंटीअगले चार वर्षों के लिए, पंजीकृत किसानों से तूर, उड़द और मसूर की 100% खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर सुनिश्चित की जाएगी. यह खरीद नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) जैसी सरकारी एजेंसियां करेंगी.

यह मिशन कई स्तरों पर काम करेगा:

  1. उत्पादकता में वृद्धि:उच्च उत्पादकता वाली, कीट-प्रतिरोधी और जलवायु-अनुकूल किस्मों के बीजों का विकास और वितरण किया जाएगा. किसानों को मुफ्त बीज किट वितरित की जाएंगी.
  2. क्षेत्र विस्तार: खाली पड़ी ज़मीन और फसल विविधीकरण (Crop Diversification) के माध्यम से दालों की खेती के तहत क्षेत्रफल को बढ़ाया जाएगा.
  3. मूल्य श्रृंखला का सुदृढ़ीकरण: कटाई के बाद के नुकसान को कम करने के लिए 1,000 नई प्रोसेसिंग और पैकेजिंग इकाइयाँ स्थापित किया जाएगा.
  4. किसानों के लिए समर्थन: किसानों के कौशल को बढ़ाने के लिए संरचित प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. वैश्विक कीमतों की निगरानी के लिए एक तंत्र स्थापित किया जाएगा ताकि किसानों के हितों की रक्षा हो सके.

यह मिशन भारत को दालों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने और किसानों की आय में वृद्धि करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा दाल उत्पादक और उपभोक्ता होने के बावजूद, अपनी घरेलू मांग को पूरा करने के लिए अभी भी 15-20% दालों का आयात करता है।

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्‍य में वृद्धि

  • सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के विपणन सत्र के लिए सभी अधिदेशित रबी फसलों का न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य (MSP) बढ़ा दिया है.
  • प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्यक्षता में 1 अक्तूबर को हुई मंत्रिमंडल की आर्थिक कार्य समिति ने यह निर्णय लिया.
  • सबसे अधिक वृद्धि कुसुम (Safflower) पर की गई है. कुसुम के MSP में प्रति क्‍व‍िंटल 600 रुपये और मसूर दाल पर 300 रुपये की बढोत्‍तरी की गई है.
  • यह वृद्धि किसानों को उनकी उत्पादन लागत पर कम से कम 50% मुनाफा सुनिश्चित करने की सरकार की प्रतिबद्धता के अनुरूप है।

विपणन सत्र 2026-27 के लिए रबी फसलों के नवीनतम MSP (₹ प्रति क्विंटल)

फसलMSP (2026–27)MSP (2025–26)वृद्धि (₹)परिवर्तन (%)
गेहूं (Wheat)₹2,585₹2,425₹1606.60%
जौ (Barley)₹2,150₹1,980₹1708.60%
चना (Gram)₹5,875₹5,650₹2254.00%
मसूर (Lentil)₹7,000₹6,700₹3004.50%
सरसों (Rapeseed & Mustard)₹6,200₹5,950₹2504.20%
कुसुम (Safflower)₹6,540₹5,940₹60010.10%

रबी फसल (Rabi Crops) क्या है?

  • रबी फसल उन फसलों को कहा जाता है जिन्हें अक्टूबर से दिसंबर के बीच बोया जाता है, और मार्च से मई के बीच में काटा जाता है। इन्हें ‘शीतकालीन फसलें’ भी कहते हैं।

प्रमुख रबी फसलों के उदाहरण

  1. अनाज: गेहूं, जौ (Barley), जई (Oats),
  2. दलहन: चना, मटर, मसूर
  3. तिलहन: सरसों, अलसी, कुसुम

MSP (Minimum Support Price) क्या है?

  • MSP (Minimum Support Price) यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत होती है, जिस पर सरकार किसानों से अनाज खरीदती है. इसे सरकारी भाव भी कहा जा सकता है.
  • सरकार हर साल फसलों की MSP तय करती है ताकि किसानों की उपज का वाजिब भाव मिल सके. इसके तहत सरकार फूड कारपोरेशन ऑफ इंडिया, नैफेड जैसी सरकारी एजेसिंयों की मदद से किसानों की फसलों को खरीदती है.

देश के 100 जिलों के लिए प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना को मंजूरी गई

  • सरकार ने प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PM Dhan Dhanya Krishi Yojana) को मंजूरी दी है. यह मंजूरी 16 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक दी गई.
  • वर्ष 2025-26 के बजट में इस योजना की घोषणा की गई थी. यह योजना पाँच वर्षों के लिए है, जो 2025-26 से शुरू होकर 2029-30 तक रहेगी.  इसपर प्रत्येक वर्ष 24 हजार करोड़ रुपये खर्च होंगे और 1.70 करोड़ किसानों को फायदा होगा.

योजना के मुख्य उद्देश्य

प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना के तहत सरकार का प्रयास उत्पादन-उत्पादकता के मामले में अत्यंत पिछड़े जिलों को अन्य विकसित जिलों के बराबर लाने का है. इस योजना के निम्नलिखित मुख्य उद्देश्य हैं:

  1. उत्पादकता में वृद्धि
  2. किसानों को फसल विविधीकरण की ओर प्रेरित करना
  3. पंचायत एवं प्रखंड स्तर पर भंडारण क्षमता में वृद्धि
  4. सिंचाई सुविधा में सुधार
  5. कृषि ऋण को आसान बनाना

योजना में शामिल जिले

  • इस योजना में देश के उन 100 जिलों को शामिल किया जाएगा, जो कृषि उत्पादकता में पिछड़े हैं. प्रत्येक राज्य से कम से कम एक जिला जरूर शामिल किया जाएगा.
  • पात्र जिलों का चयन तीन प्रमुख आधार पर किया जाएगा. ये आधार हैं:
  1. कम कृषि उत्पादकता
  2. कम फसल सघनता
  3. कम लोन वितरण

योजना का क्रियान्वयन एवं निगरानी

  • इस योजना का क्रियान्वयन सरकार और निजी क्षेत्र की भागीदारी से किया जाएगा.
  • योजना के प्रभावी क्रियान्वयन एवं निगरानी के लिए जिला, राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर समितियां गठित की जाएँगी.
  • जिला कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों को अंतिम रूप जिला धन धान्य समिति द्वारा दिया जाएगा. प्रगतिशील किसान भी जिला स्तरीय समिति के सदस्य होंगे.
  • प्रत्येक चयनित धन-धान्य जिले में योजना की प्रगति की निगरानी नीति आयोग द्वारा मासिक डैशबोर्ड का उपयोग करते हुए किया जाएगा.
  • योजना का मूल्यांकन और निगरानी 117 संकेतकों के आधार पर किया जाएगा. योजना के प्रदर्शन की नियमित समीक्षा के लिए प्रत्येक चयनित धन-धान्य जिले में केंद्रीय नोडल अधिकारी नियुक्त किए जाएंगे.

आकांक्षी जिला कार्यक्रम से प्रेरित

  • प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना, नीति आयोग के आकांक्षी जिला कार्यक्रम (Aspirational Districts Programme)  से प्रेरित है और अपनी तरह का पहला कार्यक्रम है जो विशेष रूप से कृषि तथा उससे संबद्ध क्षेत्रों पर केंद्रित है.
  • आकांक्षी जिला कार्यक्रम भारत सरकार की एक पहल है जिसका उद्देश्य देश के सबसे कम विकसित जिलों में सामाजिक-आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है.
  • आकांक्षी जिला कार्यक्रम के तहत, 112 जिलों की पहचान की गई है, जिन्हें ‘आकांक्षी जिले’ कहा जाता है, और इन जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण, बुनियादी ढांचा, और वित्तीय समावेशन जैसे क्षेत्रों में सुधार लाने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है.

भारत ने पहली जीनोम-संपादित चावल की किस्म विकसित की

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने दुनिया की पहली जीनोम-संपादित (जीन एडिटिंग) चावल की दो उन्नत किस्में, ‘DRR धान 100 (कमला)’ और ‘पुसा DST राइस 1’ विकसित की हैं. केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 4 मई को इन दोनों किस्‍मों को जारी किया.
  • ये किस्‍मों को उगाने के लिए कम पानी की जरूरत होगी और ये जल्‍दी पककर तैयार होंगी. इतना ही नहीं इन किस्‍मों का उत्‍पादन भी पारंपरिक किस्‍मों के मुकाबले 20-30% तक ज्‍यादा होगा.
  • भारत जीन-संपादित, गैर-आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलें विकसित करने वाले दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है.
  • इन किस्मों को आधुनिक CRISPR-Cas जीनोम-संपादन तकनीक से विकसित किया गया है. इस तकनीक में बिना किसी बाहरी डीएनए के पौधों के मूल जीन में परिवर्तन किया जाता है. यह तकनीक सुरक्षित मानी जाती है और भारत में इसे खेती के लिए मंजूरी मिल चुकी है.
  • ICAR के अनुसार, कम परिपक्वता अवधि (20 दिन जल्दी तैयार होने) के कारण पानी की बचत और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी लाई जा सकेगी.
  • ICAR ने 2018 में चावल में जीनोम-संपादन अनुसंधान परियोजना की शुरुआत की थी. इसके तहत दो प्रमुख किस्मों ‘सांबा महसूरी (BPT5204)’ और ‘MTU1010 (कॉटन्डोरा सन्नालु)’ — को चुना गया था.
  • कमला किस्म को सांबा महसूरी में जीनोम-संपादित करके विकसित किया गया है. पुसा DST राइस 1 को कॉटनडोरा सन्नालू किस्म में जीनोम-संपादित करके विकसित किया गया था.
  • भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद ने कमला किस्म विकसित की है. पुसा DST राइस 1 को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, दिल्ली ने विकसित किया है.

आंध्र प्रदेश के प्राकृतिक खेती मॉडल को गुलबेनकियन पुरस्कार 2024 दिया गया

आंध्र प्रदेश समुदाय प्रबंधित प्राकृतिक खेती (Andhra Pradesh Community Managed Natural Farming- APCNF) को 2024 का गुलबेंकियन पुरस्कार (Gulbenkian Prize) दिया गया है. APCNF को यह सम्मान प्रसिद्ध मृदा वैज्ञानिक रतन लाल और मिस्र की संस्था SKEEM के साथ संयुक्त रूप से दिया गया है.

मुख्य बिन्दु

  • आंध्र प्रदेश समुदाय प्रबंधित प्राकृतिक खेती (APCNF) को यह सम्मान वैश्विक खाद्य सुरक्षा, जलवायु लचीलापन और पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए दिया गया है .
  • APCNF, आंध्र प्रदेश सरकार की पहल है. आंध्र प्रदेश सरकार ने 2016 में अपनी रायथु साधिकारा संस्था योजना के माध्यम से APCNF शुरू की थी.
  • APCNF के तहत छोटे किसानों को व्यापक रूप से प्रचलित रासायनिक गहन खेती के बजाय प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जात है.
  • इस योजना के तहत किसानों को जैविक अवशेषों का उपयोग करने, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार के लिए जुताई कम करने, स्वदेशी बीजों का उपयोग करने और वृक्षारोपण सहित फसलों में विविधता लाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है.
  • योजना का मुख्य उद्देश्य कृषि आर्थिक संकट और जलवायु परिवर्तन के कारण किसानों के संकट का स्थायी समाधान खोजना है.

मानवता के लिए गुलबेंकियन पुरस्कार

  • मानवता के लिए गुलबेंकियन पुरस्कार की स्थापना 2020 में पुर्तगाल के कैलोस्टे गुलबेंकियन फाउंडेशन द्वारा की गई थी.
  • यह पुरस्कार उन व्यक्तियों और संगठनों को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए दिया जाता है जिंहोने जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए एक स्थायी समाधान को प्रेरित किया है.
  • कुल पुरस्कार राशि एक मिलियन यूरो है, जिसे पुरस्कार विजेताओं के बीच वितरित किया जाता है.

लघु सिंचाई योजनाओं की छठी गणना की रिपोर्ट जारी

जल शक्ति मंत्रालय ने लघु सिंचाई योजनाओं की छठी गणना की रिपोर्ट 26 अगस्त को जारी की थी. रिपोर्ट के अनुसार देश में 2 करोड 31 लाख 40 हजार लघु सिंचाई योजनाएं हैं. इनमें से 2 करोड 19 लाख 30 हजार भूजल और 12 लाख 10 हजार सतही जल योजनाएं हैं.

मुख्य बिन्दु

  • सबसे अधिक लघु सिंचाई योजनाएं उत्तर प्रदेश में हैं. इसके बाद महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु का स्थान है.
  • भूजल योजनाओं में महाराष्ट्र सबसे आगे है. उसके बाद कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिसा और झारखंड का स्थान हैं.
  • सतही जल योजनाओं में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, ओडिशा और झारखंड की हिस्सेदारी सबसे अधिक है.
  • भूजल योजनाओं में खोदे गए कुएं, कम गहरे ट्यूबवेल, मध्यम ट्यूबवेल और गहरे ट्यूबवेल शामिल हैं. सतही जल योजनाओं में सतही प्रवाह और सर्फस लिफ्ट योजनाएं शामिल हैं.
  • पांचवी गणना की तुलना में छठी लघु सिंचाई गणना के दौरान लघु सिंचाई योजनाओं में लगभग 1.42 मिलियन की वृद्धि हुई है. राष्ट्रीय स्तर पर, भूजल और सतही जल स्तर की योजनाओं में क्रमशः 6.9% और 1.2% की वृद्धि हुई है.
  • लघु सिंचाई योजनाओं में खोदे गए कुंओं की हिस्सेदारी सबसे अधिक है, इसके बाद कम गहरे ट्यूबवेल, मध्यम ट्यूबवेल और गहरे ट्यूबवेल हैं.
  • महाराष्ट्र कुएं खोदने, सतही प्रवाह और सर्फस लिफ्ट योजनाओं में अग्रणी राज्य है. उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब क्रमशः कम गहरे ट्यूबवेल, मध्यम ट्यूबवेल और गहरे ट्यूबवेल में अग्रणी राज्य हैं.

देहरादून में श्रीअन्न महोत्सव आयोजित किया गया

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 13 से 16 जून तक श्रीअन्न महोत्सव का आयोजन किया गया था. इसका उद्देश्य मोटे अनाजों के स्वास्थ्य लाभ से लोगों को अवगत कराना और राज्य में मोटे अनाजों के उत्पादन की क्षमता पर विमर्श करना था. महोत्वस में मोटे अनाज के 100 से अधिक स्टॉल लगाए गये थे.

मुख्य बिदु

  • इस महोत्सव में केन्द्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के साथ अन्य राज्यों के कृषि मंत्रियों, वैज्ञानिकों और किसानों ने हिस्सा लिया था.
  • महोत्सव का आयोजन मोटे अनाजों के उत्पादन के प्रति लोगों को आकर्षित करने के प्रयोजन से किया गया था.
  • उत्तराखंड में वर्ष 2025 तक मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाकर दोगुना करने का लक्ष्य है. उत्तराखंड के कृषि मंत्री राज्य सरकार ने मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए चालू वित्त वर्ष में 73 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने गेहूं की एक नई किस्म ‘एचडी-3385’ विकसित की

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने गेहूं की एक नई किस्म ‘एचडी-3385’ विकसित की है. इस पर मौसम में परिवर्तन और बढ़ती गर्मी का असर कम होता है.

एचडी-3385 किस्म अगैती बुवाई के लिए अनुकूल है. इसकी फसल को मार्च खत्म होने से पहले काटा जा सकता है.