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‘हरित हाइड्रोजन’ के उत्पादन के लिए एक प्रमुख नीति प्रवर्तक की घोषणा

केन्द्र सरकार ने ‘हरित हाइड्रोजन’ (Green Hydrogen) या ‘हरित अमोनिया’ के उत्पादन के लिए एक प्रमुख नीति प्रवर्तक की घोषणा की है. इस नीति के लागू होने से जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होगी और कच्चे तेल का आयात भी कम होगा.

  • प्रधानमंत्री ने 2021 में भारत के 75वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन का शुभारंभ किया था. मिशन का उद्देश्य सरकार को जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने और भारत को हरित हाइड्रोजन का केंद्र बनाने में सहायता करना है.
  • सरकार, भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के प्रोडक्‍शन और एक्‍सपोर्ट का ग्‍लोबल हब बनाना चाहती है. ये ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की एक नई प्रगति उसको आत्‍मनिर्भर बनाएगा और पूरे विश्‍व में क्‍लीन एनर्जी ट्रांजीशन की नई प्रेरणा भी बनेगा. सरकार का लक्ष्य 2030 तक 50 लाख टन हरित हाइड्रोजन का उत्पादन करना है.
  • हरित हाइड्रोजन नीति से कार्बन-मुक्त हरित हाइड्रोजन की उत्पादन लागत को कम करने में मदद मिलेगी. नीति के अन्तर्गत कंपनियों को स्वयं या दूसरी इकाई के माध्यम से सौर या पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों से बिजली पैदा करने को लेकर क्षमता स्थापित करने की आजादी होगी.

भारत में अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की दो नए आर्द्रभूमि ‘रामसर स्थल’ को जोड़ा गया

02 फरवरी 2022 को विश्व आर्द्रभूमि दिवस (World Wetlands Day) के दिन भारत में दो नए रामसर स्थलों (अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमि) को शामिल किया गया था. ये दो स्थल- गुजरात में खिजड़िया वन्यजीव अभयारण्य और उत्तर प्रदेश में बखिरा वन्यजीव अभयारण्य हैं. ये भारत के 48वें और 49वें रामसर स्थल हैं.

विश्व आर्द्रभूमि दिवस 2022 के अवसर पर इसरो के अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (SAC) द्वारा ‘नेशनल वेटलैंड डेकाडल चेंज एटलस’ तैयार किया गया था. SAC द्वारा इससे संबंधित मूल एटलस वर्ष 2011 में जारी किया गया था.

मुख्य बिंदु

  • विश्व आर्द्रभूमि दिवस 02 फरवरी, 1971 को ईरानी शहर रामसर में ‘आर्द्रभूमि पर कन्वेंशन’ को अपनाने की तारीख को चिह्नित करता है. यह दिवस पहली बार वर्ष 1997 में मनाया गया था.
  • रामसर कन्वेंशन एक अंतर-सरकारी संधि है जो आर्द्रभूमि एवं उनके संसाधनों के संरक्षण तथा उचित उपयोग हेतु राष्ट्रीय कार्रवाई और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिये रूपरेखा प्रदान करती है.
  • रामसर सूची के अनुसार, सबसे अधिक रामसर स्थलों वाले देश यूनाइटेड किंगडम (175) और मेंक्सिको (142) हैं. अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमि का क्षेत्रफल (148,000 वर्ग किमी) सबसे अधिक बोलीविया में है.

आर्द्रभूमि क्या होता है?

  • आर्द्रभूमि पानी में स्थित मौसमी या स्थायी पारिस्थितिक तंत्र हैं. इनमें मैंग्रोव, दलदल, नदियाँ, झीलें, डेल्टा, बाढ़ के मैदान और बाढ़ के जंगल, चावल के खेत, प्रवाल भित्तियाँ, समुद्री क्षेत्र (6 मीटर से कम ऊँचे ज्वार वाले स्थान) के अलावा मानव निर्मित आर्द्रभूमि जैसे- अपशिष्ट जल उपचार तालाब और जलाशय आदि शामिल होते हैं.
  • आर्द्रभूमियां प्राकृतिक पर्यावरण का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं. ये बाढ़ की घटनाओं में कमी लाती हैं, तटीय इलाकों की रक्षा करती हैं, साथ ही प्रदूषकों को अवशोषित कर पानी की गुणवत्ता में सुधार करती हैं.
  • आर्द्रभूमि मानव और पृथ्वी के लिये महत्त्वपूर्ण हैं. 1 बिलियन से अधिक लोग जीवनयापन के लिये उन पर निर्भर हैं और दुनिया की 40% प्रजातियाँ आर्द्रभूमि में रहती हैं तथा प्रजनन करती हैं.
  • भारत में कुल 49 रामसर स्थल (आर्द्रभूमि) हैं जो देश की कुल भूमि का 4.6% (15.26 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र) है. आर्द्रभूमि के राज्य-वार वितरण में गुजरात शीर्ष पर है (एक लंबी तटरेखा के कारण). इसके बाद आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल का स्थान है.

जापान में चेरी ब्लॉसम मौसम समय से पहले खत्म हुआ

हर साल बसंत के मौसम में जापान की जमीन खूबसूरत गुलाबी चेरी ब्लॉसम (Cherry Blossom) के फूलों से ढकी रहती है. इस साल यह मौसम पहले के मुकाबले जल्दी आ गया है और जल्दी ही खत्म भी हो गया.

चेरी ब्लॉसम का इतना जल्दी खिलाना अपने आप में एक रेकॉर्ड है. वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम पर यह असर पड़ा है. जापान में इतने पहले चेरी ब्लॉसम 1,200 साल से पहले हुआ था.

चेरी ब्लॉसम की पीक की तारिख मौसम और बारिश जैसी चीजों पर निर्भर करता है. लेकिन ट्रेंड से पता चलता है कि यह पहले होता जा रहा है. इस साल क्योटो में इसका पीक 26 मार्च को और राजधानी टोक्यो में 22 मार्च को आया. क्योटो में पीक सदियों से अप्रैल के मध्य में रहा है.

चेरी ब्लॉसम क्या है?

चेरी ब्लॉसम एक फूल है. जापान में इसे ‘सकूरा’ (Sakura) कहा जाता है. पर्यटक चेरी ब्लॉसम को देखने दूर-दूर से आते हैं. चेरी ब्लॉसम के मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध में समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में पाए जाते हैं. इसमें जापान, भारत, नेपाल, पाकिस्तान, चीन, कोरिया, अमेरिका, ब्रिटेन, इंडोनेशिया आदि शामिल हैं.

बारिश के पानी को संरक्षित करने के लिए ‘कैच द रेन’ नाम से देशव्यापी अभियान

सरकार ने बारिश के पानी को संरक्षित करने के लिए ‘कैच द रेन’ (Catch the Rain) नाम से देशव्यापी अभियान चलाने की घोषणा की है. इस पहल की घोषणा केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने 3 मार्च को की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अभियान में देश के नागरिकों से बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की है.

‘कैच द रेन’ अभियान: मुख्य बिंदु

  • बारिश के पानी को संरक्षित करने के लिए ‘कैच द रेन’ अभियान 1 अप्रैल से 30 जून तक चलाया जायेगा. इस अभियान में सरकार के सात मंत्रालय हिस्सा लेंगे. इसे स्वच्छता अभियान की तर्ज पर इसे चलाया जाएगा.
  • इस अभियान में लोगों की भागीदारी के द्वारा मानसून से पहले बारिश के पानी को एकत्रित करने वाली जगहों को साफ करने सुरक्षित बनाने पर जोर रहेगा. यह अभियान देश के 623 जिलों में चलेगा. गांवों को भी योजना से जोड़ा जाएगा.
  • इस दौरान लोगों को जल के महत्व के बारे में जागरूक बनाने का एक बड़ा अभियान छेड़ा जाएगा. इसमें पौने दो लाख नेहरू युवा केंद्रों की भूमिका को और कारगर बनाने पर जोर दिया जाएगा.
  • वर्ष 2019 में जुलाई से सितंबर के बीच देश के 252 जिलों में अभियान चलाया गया था. इस दौरान भूजल की भारी कमी वाले चिह्नित ब्लॉक, जिलों और राज्यों को लक्षित करके 6,000 करोड़ रुपये की लागत वाली अटल भूजल योजना शुरू की गई. इस बार यह अभियान देशव्यापी होगा.
  • इस अभियान में रेल और रक्षा मंत्रालय की भूमिका बहुत बड़ी होगी. इन दोनों मंत्रालयों के पास लाखों हेक्टेयर जमीन पड़ी हुई है, जहां बारिश के पानी को एकत्रित किया जा सकता है. इसके अलावा खाद्य व सार्वजनिक वितरण मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय, नागरिक उड्डयन, शिक्षा और खेल व युवा मामले मंत्रालय की सहभागिता सुनिश्चित की जाएगी.

भारत ने तटीय सुरक्षा के लिए अपने सभी समुद्र तटों पर आठ नीले झंडे फहराए

भारत ने तटीय क्षेत्र की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर के अभियान के तहत अपने सभी समुद्र तटों पर 28 दिसम्बर को आठ नीले झंडे फहराए. भारत के आठ समुद्री तटों को प्रतिष्ठित ‘ब्लू फ्लैग’ सर्टिफिकेट से सम्मानित किया गया है. इसमें गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और ओडिशा समेत पांच राज्यों के तट शामिल हैं. भारत एक ही प्रयास में आठ समुद्री तटों के लिए ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन प्राप्त करने वाला दुनिया का पहला देश बना है.

ब्लू फ्लैग से सम्मानित भारत के आठ समुद्री तट

ब्लू फ्लैग से सम्मानित भारत के आठ समुद्री तट गुजरात का शिवराजपुर बीच, दियु का घोघला, कर्नाटक का कासरकोड व पदुबिद्री, केरल का कप्पड, आंध्र प्रदेश का रुषिकोंडा, ओडिशा का गोल्डन और अंडमान व निकोबार का राधानगर तट हैं.

भारत में ‘ब्लू फ्लैग’ के मानकों के मुताबिक समुद्र तटों को विकसित करने का पायलट प्रोजेक्ट दिसंबर 2017 में शुरू किया था. ओडिशा के कोणार्क तट पर चंद्रभागा बीच भारत का पहला बीच है जिसे ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेट मिला है. यह ब्लू फ्लैग प्रमाणन प्राप्त करने वाला एशिया का पहला समुद्र तट है.

ब्लू फ्लैग प्रमाणन क्या है?

ब्लू फ्लैग दुनिया का सबसे मान्यता प्राप्त व प्रतिष्ठित स्वैच्छिक इको लेबल (पर्यावरण हितैषी) अवार्ड है जो समुद्र तटों को दिया जाता है. ब्लू फ्लैग कार्यक्रम को फ्रांस के पेरिस से शुरू किया गया था.
यह प्रमाणन डेनमार्क की एजेंसी द्वारा 33 सख्त मानदंड के आधार पर किया जाता है. ये मानदंड चार प्रमुख वर्गों- पर्यावरण सूचना और शिक्षा, स्नान के लिए जल की गुणवत्ता, पर्यावरण प्रबंधन और संरक्षण तथा समुद्र तट पर सुरक्षा और सेवाओं से संबंधित हैं.

राष्ट्रीय जल पुरस्कार 2020: तमिलनाडु को सर्वश्रेष्ठ राज्य और लुठियाग को सर्वश्रेष्ठ गांव का पुरस्कार

उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने 12 नवम्बर को राष्ट्रीय जल पुरस्कार (NWA) प्रदान किए. यह इन पुरस्कारों का दूसरा संस्करण था. पुरस्कार समारोह का आयोजन जल शक्ति मंत्रालय, जल संसाधन विभाग, नदी विकास और गंगा कायाकल्प द्वारा 11 और 12 नवंबर 2020 को आभासी मंच के माध्यम से किया गया था.

इन पुरस्कारों में राज्यों की श्रेणी में, तमिलनाडु को सर्वश्रेष्ठ राज्य का पुरस्कार दिया गया. महाराष्ट्र और राजस्थान क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे. राष्ट्रीय जल पुरस्कार के तहत उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के चिरबिटिया लुथियाग को सर्वश्रेष्ठ ग्राम पंचायत (उत्तर क्षेत्र) का पुरस्कार मिला.

NGT ने दिल्ली और NCR में पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगाया

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने दिल्ली समेत पूरे NCR में पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगा दिया है. यह प्रतिबन्ध 10 नवम्बर से 30 नवंबर तक रहेगा. बढ़ते प्रदूषण और कोरोना को देखते हुए यह फैसला लिया गया है. NGT का यह आदेश देश के उन सभी शहरों में भी लागू होगा जहां पिछले साल नवंबर में वायु की गुणवत्ता ‘खराब’ (poor) श्रेणी या इससे ऊपर की श्रेणी तक चला गया था.

ऐसा शहर जहाँ नवंबर 2019 में वायु की गुणवत्ता ‘मध्यम’ (moderate) यानी एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) 51-100 के बीच था, तो प्रदूषण रहित पटाखे बेचे और चलाए जा सकते हैं. लेकिन, दिवाली और छठ पर सिर्फ 2 घंटे की छूट मिलेगी. यह 2 घंटे राज्य सरकारों की तरफ से तय समय के मुताबिक होंगे.

एयर क्वालिटी इंडेक्स क्या है?

एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) वायु की गुणवत्ता को बताता है. इसमें बताया जाता है कि वातावरण में मौजूद हवा में किन गैसों की कितनी मात्रा घुली हुई है. इस इंडेक्स में 6 कैटेगरी बनाई गई हैं.

AQIश्रेणी
0-50अच्छी
51-100ठीक (मॉडरेट)
101-150सेंसेटिव लोगों की सेहत के लिए खराब
151-200सभी की सेहत के लिए खराब
201-300सेहत के लिए बहुत खराब
301-500खतरनाक

डॉल्फ़िन के संरक्षण के लिए भारत, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमा में सहमति

नदियों में पाई जाने वाली डॉल्फ़िन के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए भारत, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमा के विशेषज्ञ मिलकर सहयोग करने पर सहमत हुए हैं. यह सहमति वीडियो कांफ्रेंस के माध्यम से आयोजित एक संगोष्ठी में बनी. इस संगोष्ठी में विशेषज्ञों ने क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से इस डॉल्फ़िन के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए भविष्य की रणनीति पर भी चर्चा की.

डॉल्फ़िन एक विशेष प्रजाति है जो मुख्य रूप से एशिया और दक्षिण अमरीका की नदियों में पाई जाती है. यह प्रजाति तेजी से लुप्त हो रही है. भारत के राष्ट्रीय जलीय जंतु गांगेय डॉल्फिन को प्रकृति संरक्षण के अन्तर्राष्ट्रीय संघ द्वारा लुप्तप्राय घोषित किया गया है.

विशेषज्ञों का मानना था कि डॉल्फिन संरक्षण के लिए वैज्ञानिक हस्तक्षेप के साथ सामुदायिक भागीदारी भी जरूरी है. उन्होंने छात्रों को डॉल्फिन के बारे में जानकारी देने और इस बारे में समग्र जागरूकता पर भी चर्चा की.

वैज्ञानिकों ने ओजोन परत के सबसे बड़ा छेद के बंद हो जाने की पुष्टि की

यूरोपियन संघ के कोपर्निकस एटमॉस्फियर मॉनिटरिंग सर्विस (CAMS) के वैज्ञानिकों ने ओजोन लेयर के सबसे बड़ा छेद (Largest Hole on the Ozone Layer) के भर जाने की पुष्टि की है. यह ओजोन लेयर यह छेद उत्तरी ध्रुव (धरती का आर्कटिक वाला क्षेत्र) के ऊपर लगभग 10 लाख वर्ग किमी तक फैला था. यह ओजोन परत के इतिहास में पाया गया सबसे बड़ा छेद था. इस छेद की वजह से धरती पर बड़ा खतरा मंडरा रहा था.

CAMS के वैज्ञानिकों के अनुसार, इस छेद के बंद होने का मुख्य कारण ध्रुवीय भंवर है. ध्रुवीय भंवर चक्रवाती हवाएँ हैं जो ध्रुवीय क्षेत्रों में ठंडी हवाएं लाती हैं. CAMS ने कहा कि, इस साल ध्रुवीय भंवरें बहुत ज्यादा मजबूत हैं और इसके अंदर का तापमान बहुत ठंडा है.

ओजोन लेयर: एक दृष्टि

  • पृथ्वी की सतह से 20 से 30 किलोमीटर की ऊंचाई (समताप मंडल में) पर ओजोन गैस की एक परत पाई जाती है. इसे ही ओजोन लेयर कहा जाता है.
  • ओजोन लेयर सूर्य से आने वाली हानिकारक अल्ट्रावॉयलेट रेडिएशन (पराबैगनी विकिरणों) को पृथ्वी पर आने से रोकती है. इसीलिए पृथ्वी पर जीवन के लिए ओजोन परत बहुत महत्वपूर्ण है.
  • ओजोन लेयर में छेद का मुख्य कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स और हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन्स होते है. स्ट्रेटोस्फेयर में इनकी मात्रा बढ़ने से ओजोन लेयर नुकसान पहुँचता है.
  • ओज़ोन ऑक्सीजन का ही एक प्रकार है और इसे O3 के संकेत से प्रदर्शित करते हैं. ऑक्सीजन के जब तीन परमाणु आपस में जुड़ते है तो ओज़ोन परत बनाते हैं.
  • ओजोन परत का निर्माण सूर्य से आने वाली अल्ट्रावायलेट रेडिएशन की वजह से होता है. जब यह अल्ट्रावायलेट किरणें सामान्य ऑक्सीजन (O2) के अणुओं पर गिरती हैं तो यह अक्सीजन के दोनों परमाणुओं को अलग-अलग कर देती है. मुक्त हुए यह दोनों ऑक्सीजन परमाणु, ऑक्सीजन के दूसरे अणु से मिलकर ओजोन (O3) का निर्माण करते हैं.

11वां पीटरबर्ग जलवायु संवाद जर्मनी की मेजबानी में आयोजित किया गया

11वां पीटरबर्ग जलवायु संवाद (11th Petersberg Climate Dialogue) 27-28 अप्रैल को विडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित किया गया. इस संवाद की मेजबानी जर्मनी सह-अध्यक्षता यूनाइटेड किंगडम (UK) ने की जिसमें 30 से अधिक देशों ने भाग लिया. केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री प्रकाश जावड़ेकर ने इस संवाद में भारत का प्रतिनिधित्व किया.

पीटरबर्ग जलवायु संवाद: एक दृष्टि

‘पीटर्सबर्ग जलवायु संवाद’ (PCD) को जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल की पहल पर 2010 में शुरू किया गया था. वर्ष 2009 में कोपेनहेगन जलवायु वार्ता के प्रभावी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचने के कारण इसे शुरू किया गया था. PCD का लक्ष्य जलवायु के संबंध में अंतरराष्ट्रीय विचार-विमर्श हेतु एक मंच प्रदान करना है.

NTPC ने पर्यावरण अनुकूल हाइड्रोजन ईंधन आधारित बसों के परिचालन की योजना बनाई

सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली कंपनी NTPC ने हाइड्रोजन ईंधन सेल से चलने वाली 10 इलेक्ट्रिक बसें और 10 कार खरीदने के लिए वैश्विक स्तर पर रुचि पत्र मंगाया है. कंपनी की योजना इन बसों और कारों का परिचालन दिल्ली और लेह के बीच करने की है. नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के सहयोग से इस पहल को पायलट परियोजना के आधार पर दिल्ली और लेह में लागू किया जाएगा.

हाइड्रोजन ईंधन आधारित सेल क्या है?

पर्यावरण अनुकूल इन बसों में हाइड्रोजन ईंधन आधारित सेल होता है. इसमें एक ईंधन सेल में से हाइड्रोजन को प्रवाहित किया जाता है. सेल के भीतर हाइड्रोजन इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन में टूट जाता है. वहीं अलग हुए इलेक्ट्रॉन को एक सर्किट में भेजा जाता है, जो विद्युत धारा और ऊष्मा का उत्पादन करता है. यह ईंधन कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करता है. कंपनी इसके लिए हाइड्रोजन के उत्पादन और भंडारण के साथ-साथ वितरण की भी व्यवस्था करेगी.

भारत में 1 अप्रैल से BS-6 उत्सर्जन मानक लागू, क्या है BS-4 और BS-6 में अंतर

भारत में 1 अप्रैल 2020 से BS-6 (Bharat Stage VI) उत्सर्जन मानक (Emission Norm) लागू हो गया. अभी तक देश में BS-4 (Bharat Stage IV) उत्सर्जन मानक लागू था. सरकार ने BS-5 को छोड़कर सीधे BS-6 उत्सर्जन को लागू करने का निर्णय लिया था. इसे लागू करने का उद्देश्य वाहनों से निकलने वाले प्रदूषक तत्व को कम करना है.

भारत में 2000 उत्सर्जन मानक लागू किया गया था

प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए भारत में चलने वाले वाहनों के लिए उत्सर्जन मानक ‘BS-1’ 2000 में लागू किया गया था. BS-1 (Bharat Stage) को यूरोपियन कार्बन उत्सर्जन मानक ‘euro-1’ की तर्ज पर लागू किया गया था. इसके बाद क्रमशः BS-2, BS-3 और BS-4 को लागू किया गया.

BS-3, BS-4 और BS-6 में अंतर

हर एक उत्सर्जन मानक में पेट्रोल और डीजल गाड़ियों से निकलने वाले धुएं के साथ सल्फर की मात्रा को कम किया जाता है. BS-3 मानक के पेट्रोल गाड़ियां 150 mg/kg (मिलीग्राम प्रति किलोग्राम) सल्फर उत्सर्जित कर सकती थी जो BS-6 में घटकर 10 mg/kg हो गया है. इसी तरह BS-3 मानक के डीजल गाड़ियां 350 mg/kg सल्फर उत्सर्जित कर सकती थी, जिसकी मात्रा BS-6 में 10 mg/kg हो गई है.

सल्फर उत्सर्जन (अधिकतम)

पेट्रोल: BS-3 150 mg/kg, BS-4 50 mg/kg, BS-6 10 mg/kg
डीजल: BS-3 350 mg/kg, BS-4 50 mg/kg, BS-6 10 mg/kg

ईंधन ग्रेड क्या है?

BS के बिभिन्न उत्सर्जन मानकों के तहत वाहन के इंजन को इस हिसाब से डिजाइन किया जाता है कि उससे निकलने वाले धुएं से सल्फर की मात्रा भारत सरकार के तय पैमाने के आधार पर निकले. इसके लिए कम सल्फर वाले ईंधन का भी इस्तेमाल किया जाता है और सरकार की तरफ से ईंधन का ग्रेड तय किया जाता है. BS-6 ईंधन देशभर में 1 अप्रैल 2020 से मिलना शुरू हो गया है.