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भारत चंद्रमा ने दक्षिणी ध्रुव पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश बना

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा प्रक्षेपित चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग किया. इसके साथ थी भारत चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का चौथा (अमेरिका, रूस, चीन के बाद) और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश बन गया.

मुख्य बिन्दु

  • इसरो ने चंद्रयान-3 मिशन का प्रक्षेपण 14 जुलाई को ‘लॉन्च व्हीकल मार्क-3’ (LVM-3) रॉकेट (प्रक्षेपण यान) द्वारा श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अन्‍तरिक्ष केन्‍द्र से किया था.
  • 23 अगस्त को शाम 6.04 बजे चंद्रयान-3 के लैंडर ‘विक्रम’ और उसके अंदर रखे रोवर ‘प्रज्ञान’ ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के करीब सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग किया. सॉफ्ट लैंडिंग का अर्थ बिना झटके के सतह पर उतरना होता है.
  • भारत से पहले चांद पर पूर्ववर्ती सोवियत संघ, अमेरिका और चीन ही सफल ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ कर पाए हैं. इनमें से कोई भी देश चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के आस-पास ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ नहीं कर पाया था.
  • अब तक चांद के लिए जो भी सफल मिशन रहे हैं वो चांद के उत्तर या मध्य में हैं. यहां पर लैंडिंग के लिए जगह समतल है और सूरज की सही रोशनी भी आती है. चाँद के दक्षिणी ध्रुव पर रोशनी नहीं पहुंचती साथ ही सतह पथरीली, ऊबड़-खाबड़ और गड्ढों से भरी है.
  • चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग का यह भारत का दूसरा प्रयास था. इसरो ने पहला प्रयास 7 सितंबर 2019 को ‘चंद्रयान-2’ मिशन द्वारा किया था, जो सॉफ्ट लैंडिंग करने में असफल रहा था. इसरो का पहला चंद्र मिशन ‘चंद्रयान-1’ को 2008 में प्रक्षेपित किया गया था. इस मिशन में चाँद पर उतरने के लिए लैंडर मॉड्यूल नहीं था.
  • इसरो के वर्तमान चेयरमैन एस सोमनाथ हैं. चंद्रयान-3 के प्रोजेक्ट डायरेक्टर महान वैज्ञानिक पी वीरामुथुवेल हैं. वहीं चंद्रयान-3 मिशन की डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर महिला वैज्ञानिक कल्पना के हैं. चंद्रयान-3 मिशन का कुल खर्च की राशि 615 करोड़ रुपये है.
  • दक्षिण अफ्रीका की यात्रा पर गए प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने जोहान्‍सबर्ग से वर्चुअली इसरो के लैंडिंग कार्यक्रम को देखा और संबोधित किया. प्रधानमंत्री 15वें ब्रिक्‍स सम्मेलन में हिस्सा लेने दक्षिण अफ्रीका गए थे.

चंद्रयान 3 मिशन: एक दृष्टि

  • चंद्रयान 3 के तीन हिस्‍से हैं- प्रोपल्‍शन, लैंडर और रोवर. प्रोपल्‍शन, लैंडर और रोवर को पृथ्‍वी की कक्षा से चंद्रमा की कक्षा में ले गया था. रोवर को लैंडर के अंदर स्थापित किया गया था. लैंडर का नाम ‘विक्रम’ और रोवर का नाम ‘प्रज्ञान’ दिया गया है.
  • लैंडर का काम चंद्रमा की सतह पर उतरकर उसमें मौजूद 6 पहियों वाले रोवर को बाहर निकालना था. रोवर चांद की सतह पर खनिजों सहित कई महत्‍वपूर्ण जानकारी जुटाएगा.
  • इस मिशन का उद्देश्य ध्रुवीय क्षेत्र के पास चंद्रमा की सतह के तापीय गुणों को मापना, भूकंपीय गतिविधि का पता लगाना और लूनर क्रस्ट और मेंटल की संरचना का चित्रण करना भी है.
  • लैंडर और रोवर (कुल वजन 1,752 किलोग्राम) को एक चंद्र दिवस की अवधि (धरती के लगभग 14 दिन के बराबर) तक काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
  • सुरक्षित रूप से चंद्र सतह पर उतरने के लिए लैंडर में कई सेंसर थे, जिसमें एक्सेलेरोमीटर, अल्टीमीटर, डॉपलर वेलोमीटर, इनक्लिनोमीटर, टचडाउन सेंसर और खतरे से बचने एवं स्थिति संबंधी जानकारी के लिए कैमरे लगे थे.

लैंडर मॉड्यूल ने जहां पर कदम रखे, उस जगह का नामकरण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चंद्रयान-3 के लैंडर मॉड्यूल ‘विक्रम’ ने जहां पर कदम रखे, उस जगह का नामकरण किया है.

  • चंद्रमा के 23 अगस्‍त 2023 को चंद्रयान-3 का लैंडर मॉड्यूल जिस हिस्से पर उतरा, अब उस पॉइंट को ‘शिवशक्ति‘ के नाम से जाना जाएगा.
  • प्रधानमंत्री मोदी ने चंद्रयान-2 के इम्पैक्ट पॉइंट को भी एक नाम दिया. अब उसे ‘तिरंगा‘ के नाम से जाना जाएगा. 2019 में यहीं पर चंद्रयान-2 का लैंडर क्रैश हो गया था.
  • प्रधानमंत्री ने कहा कि शिवशक्ति पॉइंट आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देगा कि हमें विज्ञान का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए ही करना है. तिरंगा पॉइंट हमें प्रेरणा देगा कि कोई भी विफलता आखिरी नहीं होती.

23 अगस्त को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में मनाया जाएगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रत्येक वर्ष 23 अगस्त को जब भारत के विक्रम लैंडर ने दक्षिणी ध्रुव के पास सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग किया, उस दिन को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की.

इसरो ने श्रीहरिकोटा से चन्‍द्रयान-3 को सफलतापूर्वक प्रेक्षिपत‍ किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 14 जुलाई को चन्‍द्रयान-3 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपन किया था. या प्रक्षेपन श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अन्‍तरिक्ष केन्‍द्र से किया गया था.

मुख्य बिन्दु

  • चन्‍द्रयान-3 को LVM-3 प्रक्षेपण यान (रॉकेट) से प्रक्षेपित किया गया. प्रक्षेपण यान LVM-3 का वजन 642 टन है. यह भारी उपग्रहों को ले जाने के लिए एक सफल और भरोसेमंद प्रक्षेपण यान है.
  • LVM-3 रॉकेट के संचालन के लिए तीन चरणों ठोस ईंधन, तरल ईंधन और अंत में क्रायोजनिक ईंधन (तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन) को पूर्ण करते हुए चंद्रयान-3 लगभग 16 मिनट में पृथ्वी की कक्षा (जियो ट्रांसफर ऑर्बिट) में स्थापित हुआ.
  • चन्‍द्रयान-3 के चांद के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र पर 23 अगस्‍त या 24 अगस्‍त को उतरने की आशा है. यह चंद्रमा तक पहुंचने के लिए एक महीने में 3.84 लाख किलोमीटर की दूरी (ओवल आकार के मार्ग में) तय करेगा.
  • यह चांद की सतह पर उतरने का भारत का दूसरा प्रयास है. 2019 में ‘चन्‍द्रयान-2’ मिशन आखिरी चरण में चांद की सतह पर उतरने में विफल हो गया था.
  • अगर भारत सफलतापूर्वक चांद की सतह पर उतरने में सफल रहता है तो यह उपलब्धि हासिल करने वाला वो दुनिया का चौथा देश होगा. इससे पहले अमरीका, तत्‍कालीन सोवियत संघ और चीन ने ये उपलब्धि हासिल की है.

चंद्रयान 3: एक दृष्टि

  • चंद्रयान 3 के तीन हिस्‍से हैं- प्रोपल्‍शन मॉड्यूल, लैंडर और रोवर मॉड्यूल. प्रोपल्‍शन मॉड्यूल लैंडर और रोवर को पृथ्‍वी की कक्षा से चंद्रमा की कक्षा में ले जाएगा.
  • लैंडर का काम चंद्रमा की सतह पर उतरकर उसमें मौजूद रोवर को बाहर निकालना है. रोवर चांद की सतह पर खनिजों सहित कई महत्‍वपूर्ण जानकारी जुटाएगा.
  • इस मिशन का उद्देश्य ध्रुवीय क्षेत्र के पास चंद्रमा की सतह के तापीय गुणों को मापना, भूकंपीय गतिविधि का पता लगाना और लूनर क्रस्ट और मेंटल की संरचना का चित्रण करना भी है.

इसरो ने अगली पीढी का नौवहन उपग्रह एनवीएस-1 का प्रक्षेपण किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 29 मई को अगली पीढी का नौवहन उपग्रह ‘नाविक’ एनवीएस-1 का प्रक्षेपण किया. यह सैटेलाइट खासकर सशस्त्र बलों को मजबूत करने और नौवहन सेवाओं की निगरानी के लिए बनाया गया है.

मुख्य बिन्दु

  • यह प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र श्रीहरिकोटा से भूस्थिर उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) एफ-12 के माध्यम से किया गया.
  • एनवीएस-1 का भार लगभग दो हजार 232 किलोग्राम है.  यह दूसरी पीढ़ी का पहला नेविगेशन उपग्रह है. इसका उद्देश्‍य निगरानी और नौवहन क्षमता प्रदान करना है.
  • इसका इस्तेमाल स्थलीय, हवाई और समुद्री परिवहन, लोकेशन-आधारित सेवाओं, निजी गतिशीलता, संसाधन निगरानी, सर्वेक्षण और भूगणित, वैज्ञानिक अनुसंधान, समय प्रसार और आपात स्थिति में किया जाएगा.
  • इसरो के मुताबिक, यह पहली बार स्वदेशी रूप से विकसित रूबिडियम परमाणु घड़ी का प्रक्षेपण में उपयोग किया जाएगा. पहले तारीख और स्थान का निर्धारण करने के लिए आयातित रूबिडियम परमाणु घड़ियों का इस्तेमाल करते थे.
  • अब अहमदाबाद स्थित अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र में विकसित रूबिडियम परमाणु घड़ी होगी. यह महत्वपूर्ण तकनीक कुछ ही देशों के पास है.

ISRO ने हाल ही में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान ‘PSLV C-55’ को सफलतापूर्वक लॉन्च किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने हाल ही में श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्‍द्र से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान PSLV C-55 को सफलतापूर्वक लॉन्च किया था. यह प्रक्षेपण न्‍यू स्‍पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) द्वारा किया गया, जो इसरो की वाणिज्यिक शाखा है.

मुख्य बिन्दु

  • इसरो ने PSLV C-55 प्रक्षेपण यान द्वारा सिंगापुर के दो उपग्रह 741 किलोग्राम वजन वाला प्रा‍थमिक उपग्रह ‘TeLEOS-2’ और 16 किलोग्राम भार वाला दूसरा उपग्रह Lumelite-4 को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया.
  • यह PSLV की 57वीं उडान थी. इस यान से उपग्रह प्रक्षेपण का यह सोलहवां मिशन था. C-55, PSLV यान का सबसे हल्का संस्करण है.
  • वैज्ञानिकों ने PSLV ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल-2 (POEM-2) का उपयोग इसके द्वारा किये गए गैर-पृथक पेलोड के माध्यम से वैज्ञानिक प्रयोगों को करने हेतु एक कक्षीय मंच के रूप में किया.
  • TeLEOS-2 पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (EOS) है और रॉकेट द्वारा ले जाया जाने वाला प्राथमिक उपग्रह होगा. यह सभी मौसमों में दिन और रात में कवरेज प्रदान करने में सक्षम होगा.
  • वर्ष 2015 में ISRO ने TeLEOS-1 लॉन्च किया, जिसे रिमोट सेंसिंग एप्लीकेशन के लिये पृथ्वी की निचली कक्षा में लॉन्च किया गया था.
  • LUMILITE-4 एक उन्नत 12U उपग्रह है जिसे उच्च-प्रदर्शन अंतरिक्ष-जनित VHF डेटा एक्सचेंज सिस्टम (VDES) के तकनीकी प्रदर्शन के लिये विकसित किया गया है.
  • POEM इसरो (ISRO) का एक प्रायोगिक मिशन है जो PSLV प्रक्षेपण यान के चौथे चरण के दौरान कक्षीय मंच के रूप में कक्षा में वैज्ञानिक प्रयोग करता है.

इसरो ने प्रक्षेपण यान की स्वतः लैंडिंग का मिशन सफलतापूर्वक पूरा किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने दोबारा उपयोग में लाए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान की स्वतः लैंडिंग मिशन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया है.

मुख्य बिन्दु

  • यह परीक्षण 2 अप्रैल को कर्नाटक में चित्रदुर्ग के परीक्षण रेंज में RLV LEX प्रक्षेपण यान के माध्यम से किया गया.
  • परीक्षण के दौरान वायु सेना के चिनूक हेलीकॉप्टर ने प्रक्षेपण-यान को साढ़े चार किलोमीटर की ऊंचाई पर ले जाकर छोड़ दिया. वहां से प्रक्षेपण यान ने 350 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से हवाई पट्टी पर स्‍वतः लैंडिंग की. इस दौरान वह सभी दस मानदंडों पर ख़रा उतरा.
  • प्रक्षेपण यान की स्वायत्त लैंडिंग (LEX) की स्थितियों को बिलकुल उस तरह डिजाइन किया गया था, जिस तरह अंतरिक्ष से पृथ्वी की कक्षा में लौटने वाले यान की स्थितियां होती हैं.
  • इस तकनीक को हासिल करने के साथ भारत बार-बार इस्तेमाल हो सकने वाला प्रक्षेपण यान (RLV) बनाने के करीब पहुंच गया है. खास बात यह है कि भारत का यह मिशन पूरी तरह स्वदेशी है.
  • हवाई पट्टी पर विमान की तरह प्रक्षेपण यान उतारने की तकनीक हासिल करने वाला भारत दुनिया का छठा देश बन गया है. अभी यह तकनीक अमेरिका, रूस, चीन, स्पेन और न्यूजीलैंड के पास है.
  • RLV को भारतीय रक्षा अनुसंधान संगठन (DRDO) व वायुसेना (IAF) की मदद से बनाया गया है.

इसरो ने श्रीहरिकोटा से लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान SSLVD-2 का प्रक्षेपण किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 10 फ़रवरी को लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान ‘SSLV-D2’ का सफल प्रक्षेपण किया था. यह प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा, आंध्र प्रदेश से किया गया था.

मुख्य बिन्दु

  • SSLVD-2, SSLV का दूसरा संस्करण था. पहला संस्करण SSLVD-1 को पहली बार अगस्त 2022 में प्रक्षेपित किया गया था लेकिन यह उपग्रहों को सटीक कक्षा में स्थापित करने में विफल रहा था.
  • SSLV-D2 द्वारा इसरो के पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ‘EOS-07’ और दो सह-यात्री उपग्रहों- Janus-1 एवं AzaadiSat2 को आंतरिक्ष में स्थापित किया गया.
  • Janus-1 एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शक उपग्रह है जिसे अमेरिका स्थित Antaris और इसके भारतीय भागीदारों XDLinks तथा Ananth Technologies द्वारा बनाया गया है.
  • चेन्नई स्थित अंतरिक्ष स्टार्टअप SpaceKidz को 450 किलोमीटर की गोलाकार कक्षा में स्थापित किया गया है.  यह एक क्यूब उपग्रह है जिसका वज़न लगभग 8 किलोग्राम है और इसमें 75 अलग-अलग पेलोड हैं.
  • EOS-07 156.3 किलोग्राम का उपग्रह है जिसे इसरो द्वारा डिज़ाइन और विकसित किया गया है. इस मिशन का उद्देश्य भविष्य के परिचालन उपग्रहों के लिये माइक्रोसेटेलाइट बसों और नई तकनीकों के साथ संगत पेलोड उपकरणों को डिज़ाइन एवं विकसित करना है.

SSLV: एक दृष्टि

  • SSLV, इसरो का सबसे छोटा प्रक्षेपण यान रॉकेट है. यह 3 चरण का प्रक्षेपण यान है जिसे टर्मिनल के रूप में तीन ठोस प्रणोदन चरणों (Solid Propulsion Stages) और तरल प्रणोदन आधारित वेग ट्रिमिंग मॉड्यूल (Velocity Trimming Module -VTM) के साथ संयोजित (कॉन्फिगर) किया गया है.
  • SSLV का व्यास 2 मीटर और लंबाई 34 मीटर है, जिसका भार लगभग 120 टन है तथा 500 किलोमीटर की समतल कक्षीय तल में 10 से 500 किलोग्राम उपग्रह लॉन्च करने में सक्षम है.
  • रॉकेट SSLV-D2 बहुत कम लागत में अंतरिक्ष तक पहुंच प्रदान करता है, कम टर्न-अराउंड समय और कई उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने में सक्षम है.

ISRO ने बहुपयोगी साउंडिंग रॉकेट RH-200 का 200वां सफल प्रक्षेपण किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 25 नवंबर को अपने बहुपयोगी साउंडिंग रॉकेट RH-200 का 200वां सफल प्रक्षेपण किया था. यह प्रक्षेपण तिरूवनंतपुरम के थुम्बा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्चिंग स्टेशन (TERLS) से किया गया था.

RH200 क्या है?

  • RH200, दो चरणों वाला बहुउद्देश्यीय साउंडिंग रॉकेट है जो वैज्ञानिक पेलोड को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम है.
  • यह 70 किमी की ऊंचाई तक जाने में सक्षम है. 3.5 मीटर लंबा यह रॉकेट रोहिणी रॉकेट परिवार का है. इसका उपयोग इसरो द्वारा वायुमंडलीय अध्ययन के लिए किया जाता है.
  • साउंडिंग रॉकेट, उपकरण ले जाने वाला रॉकेट है जो अपनी उड़ान के दौरान माप लेने और वैज्ञानिक प्रयोग करने में सक्षम है.
  • इसका उपयोग पृथ्वी की सतह से 48 से 145 किमी की ऊँचाई पर उपकरणों को लॉन्च करने के लिए किया जाता है. इस रॉकेट का पहला और दूसरा चरण ठोस मोटरों द्वारा संचालित होता है.
  • भारत में लॉन्च किया जाने वाला पहला साउंडिंग रॉकेट अमेरिकी नाइकी-अपाचे (Nike-Apache) था. यह ऐतिहासिक लांच 21 नवंबर, 1963 को हुआ था.
  • रोहिणी RH-75 – पहला स्वदेशी रूप से विकसित साउंडिंग रॉकेट – 1967 में इसरो द्वारा लॉन्च किया गया था. तब से, इन रॉकेटों को TERLS और सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा दोनों से लॉन्च किया गया है.

देश का पहला प्राइवेट रॉकेट विक्रम-एस से तीन उपग्रहों का प्रक्षेपण

भारत के पहले प्राइवेट रॉकेट विक्रम-एस (Rocket Vikram-S)  ने 19 नवंबर को सफलता के साथ उड़ान भरी और तीन उपग्रहों (सैटलाइट्स) को उनकी कक्षा में स्थापित किया. यह प्रक्षेपण श्री हरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से किया गया.

इसके साथ ही देश के अंतरिक्ष कार्यक्रमों में निजी क्षेत्र के प्रवेश का प्रारंभ हुआ. यही कारण है, इस मिशन का नाम ‘प्रारंभ’ रखा गया है.

रॉकेट ‘विक्रम एस’: मुख्य बिन्दु

  • इसरो के संस्थापक डॉ. विक्रम साराभाई की याद में पहले प्राइवेट रॉकेट का नाम ‘विक्रम एस’ दिया गया है. इसे हैदराबाद के स्टार्टअप ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ ने बनाया है.
  • 550 किलोग्राम वजनी यह रॉकेट कार्बन फाइबर से बना है. इसमें 3-D प्रिंटेड इंजन लगे हैं. यह रॉकेट 83 किलो के पेलोड (सैटलाइट) को 100 किमी. ऊंचाई तक ले जाने में सक्षम है. यह आवाज की 5 गुना अधिकतम रफ्तार से उड़ान भर सकता है.
  • रॉकेट ‘विक्रम एस’ के पहले उड़ान से तीन सैटलाइट्स भेजे गए. इनमें दो भारतीय और एक विदेशी कंपनी का था. भारतीय सैटलाइट – चेन्नै बेस्ड स्टार्टअप ‘स्पेसकिड्ज़’ और आंध्र के एन-स्पेसटेक के थे. स्पेसकिड्ज़ के ‘फन-सैट’ को भारत, अमेरिका, सिंगापुर और इंडोनेशिया के स्टूडेंट्स ने तैयार किया है. वहीं, विदेशी सैटलाइट अर्मेनियन बाजूम-Q स्पेस रिसर्च लैब से जुड़ा था.
  • आम रॉकेट ईंधन के बजाय इसमें LNG (लिक्विड नेचरल गैस) और LoX (लिक्विड ऑक्सीजन) की मदद ली गई है, जो किफायती और प्रदूषण मुक्त होता है.
  • यह लॉन्च सब-ऑर्बिटल था यानी रॉकेट आउटर स्पेस में नहीं गया और काम पूरा कर समंदर में गिर गया.
  • भारत इस लॉन्च के बाद अमेरिका, रूस, ईयू, जापान, चीन और फ्रांस जैसे देशों के क्लब में शामिल हो गया, जहां प्राइवेट रॉकेट छोड़े जा रहे हैं.

ISRO ने LVM3 प्रक्षेपण यान से 36 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 23 अक्तूबर को LVM3 प्रक्षेपण यान से 36 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किया था. ये उपग्रह ब्रिटिश कंपनी ‘वन वेब’ के थे जिन्हें आंध्रप्रदेश के श्रीहरिकोटा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किए गए.

मुख्य बिन्दु

  • वनवेब, ब्रिटेन स्थित एक निजी उपग्रह संचार कंपनी है, जिसमें भारत की ‘भारती एंटरप्राइजेज’ एक प्रमुख निवेशक और शेयरधारक है. वनवेब के 36 उपग्रहों के एक और सेट को जनवरी 2023 में कक्षा में स्थापित करने की योजना है.
  • LVM3 (Launch Vehicle Mark 3) भारत का सबसे भारी रॉकेट है. यह जियोसिन्क्रोनस सैटलाइट लॉन्च वीइकल-मार्क3 (GSLV-Mk3) नाम से भी जाना जाता है.
  • मिशन में वनवेब के 5,796 किलोग्राम वजन के 36 उपग्रहों के साथ अंतरिक्ष में जाने वाला LVM3 पहला भारतीय रॉकेट बन गया है.
  • यह LVM3 का पहला वाणिज्यिक (कॉमर्शियल) मिशन था. इस मिशन पर इसने ‘वनवेब’ के 36 उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit)  में स्थापित किया.
  • प्रक्षेपण के करीब 20 मिनट बाद ही 601 किलोमीटर की ऊंचाई पर धरती की निचली कक्षा में सभी 36 सैटलाइट सफलता से स्थापित हो गए.
  • इससे पहले ISRO ने पोलर सैटलाइट लॉन्च वीइकल (PSLV) के माध्यम से वाणिज्यिक मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया था लेकिन GSLV के लिए यह पहला वाणिज्यिक मिशन था.
  • ISRO अब तक 345 विदेशी सैटलाइट को लॉन्च कर चुका है. इन सभी सैटलाइट को PSLV से अंतरिक्ष में भेजा गया था.
  • LVM3 रॉकेट 43.5 मीटर लंबा और 644 टन वजनी है. यह 8 हजार किलो वजन ले जाने में सक्षम है.

चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण जून 2023 में

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण जून 2023 में होने की संभावना है. इसरो प्रमुख डॉ. एस. सोमनाथ ने कहा कि चंद्रयान-3 लगभग तैयार है और इसका परीक्षण भी लगभग पूरा हो चुका है.

राष्ट्रपति HAL के एकीकृत क्रायोजेनिक इंजन निर्माण संयंत्र का शुभारंभ किया

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 27 सितम्बर को बेंगलुरु में हिन्‍दुस्‍तान एयरोनॉटिक्‍स लिमिटेड (HAL) के एकीकृत क्रायोजेनिक इंजन निर्माण संयंत्र का शुभारंभ किया.

क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के उपग्रह प्रक्षेपण में किया जाता है. राष्ट्रपति ने इस दौरान हिन्‍दुस्‍तान एयरोनॉटिक्‍स लिमिटेड में दक्षिण क्षेत्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान की आधारशिला भी रखी.

इसरो का ‘SSLV-D1’ रॉकेट का पहला प्रक्षेपण आंशिक सफल रहा

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का ‘SSLV-D1’ रॉकेट का पहला प्रक्षेपण आंशिक रूप से सफल रहा. यह प्रक्षेपण 7 अगस्त को श्री हरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से किया गया था.

मुख्य बिन्दु

  • इस प्रक्षेपण में इसरो ने ‘SSLV-D1’ रॉकेट के माध्यम से पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (अर्थ आब्‍जर्वर उपग्रह) ‘EOS-02’ और एक अन्‍य उपग्रह ‘आजादी-सैट’ (AzadiSAT) को अंतरिक्ष उनके निर्धारित कक्षा में भेजा गया  था.
  • इस प्रक्षेपण में दोनों उपग्रह अपने निर्धारित कक्षा में पहुँचने में सफल नहीं हुआ. आखिरी समय में इन उपग्रहों का संपर्क इसरो से टूट गया.
  • ‘SSLV-D1’ (स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल) इसरो का सबसे छोटा वाणिज्यिक रॉकेट है. इसे बेबी रॉकेट से जाना जाता है.
  • ‘EOS02’ एक अर्थ ऑब्जरवेशन सैटेलाइट हैं. 142 किलोग्राम का यह सैटेलाइट रात में भी पृथ्वी की निगरानी कर सकता है.
  • दूसरा सैटेलाइट ‘AzaadiSAT’ है. यह ‘स्पेसकिड्ज इंडिया’ नाम की देसी निजी स्पेस एजेंसी का स्टूडेंट सैटेलाइट है. इसे देश की 750 लड़कियों ने मिलकर बनाया है.

इसरो ने PSLV-C 53 का सफल परीक्षण किया, सिंगापुर के तीन उपग्रहों का प्रक्षेपण

अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने हाल ही में ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान ‘PSLV-C 53’ का सफल परीक्षण किया था. इस परीक्षण में PSLV-C 53 के माध्यम से सिंगापुर के तीन उपग्रहों को सफलतापूर्वक अभीष्ट कक्षा में प्रक्षेपित किया गया. यह प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपित किया गया था. यह PSLV का 55वां मिशन था.

मुख्य बिंदु

  • PSLV-C 53 इसरो की वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) का दूसरा समर्पित वाणिज्यिक मिशन है. इससे पहले 23 जून को इसरो ने NSIL के लिए बनाए गए नए संचार उपग्रह जीसैट-24 को प्रक्षेपित किया था. इसका प्रक्षेपण फ्रेंच गुयाना (दक्षिण अमेरिका) के कोउरू से किया गया था.
  • 44.4 मीटर लंबे PSLV-C 53 से सिंगापुर के तीन उपग्रहों 365 किग्रा के DS-EO, और 155 किलोग्राम के न्यूसर और सिंगापुर के नानयांग टेक्नालाजिकल यूनिवर्सिटी (NTU) के 2.8 किलोग्राम के स्कूब-1 उपग्रह को प्रक्षेपित किया गया.
  • प्रक्षेपण यान ने तीनों उपग्रहों को 10 डिग्री झुकाव के साथ 570 किमी की सटीक कक्षा में स्थापित किया.
  • दिन और रात, सभी मौसम में तस्वीरें भेजने में सक्षम DS-EO में इलेक्ट्रो-आप्टिक, मल्टी-स्पेक्ट्रल पेलोड होता है जो भूमि वर्गीकरण के लिए पूर्ण रंगीन तस्वीरें भेजेगा. इसके साथ ही मानवीय सहायता और आपदा राहत आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा.
  • न्यूसर सिंगापुर का पहला छोटा वाणिज्यिक उपग्रह है जो AR पेलोड ले जाता है, जो दिन और रात में और सभी मौसम में तस्वीरें भेजने में सक्षम है.
  • सिंगापुर के नानयांग टेक्नालाजिकल यूनिवर्सिटी (NTU) स्कूब-1 सिंगापुर के स्टूडेंट सैटेलाइट सीरीज का पहला उपग्रह है.