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इसरो ने SSLV-D3 प्रक्षेपण यान से उपग्रह ‘EOS-08’ का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 16 अगस्त को पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ‘EOS-08’ और एक अन्‍य छोटे उपग्रह ‘SR-0’ का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया. यह प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से किया गया.

मुख्य बिन्दु

  • दोनों उपग्रहों को SSLV-D3 प्रक्षेपण यान (रॉकेट) के माध्यम से पृथ्वी से 475 किलोमीटर दूर कक्षा में स्थापित किया गया.
  • SSLV-D3 रॉकेट 34 मीटर लंबा और लगभग 119 टन वजन का है. यह SSLV-D3 प्रक्षेपण यान की तीसरी उड़ान थी.
  • SSLV रॉकेट मिनी, माइक्रो या नैनो उपग्रहों (10 से 500 किलोग्राम द्रव्यमान) को 500 किमी की कक्षा में लॉन्च करने में सक्षम है.
  • रॉकेट के तीन चरण ठोस ईंधन द्वारा संचालित होते हैं जबकि अंतिम वेलोसिटी ट्रिमिंग मॉड्यूल (वीटीएम) में तरल ईंधन का इस्तेमाल होता है.
  • पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ‘EOS-08’ निगरानी, ​​आपदा निगरानी, ​​आग का पता लगाने, ज्वालामुखी गतिविधियों, औद्योगिक और बिजली संयंत्र आपदाओं जैसे अनुप्रयोगों के लिए दिन और रात के दौरान इंफ्रारेड तस्‍वीरें भेजेंगा.
  • EOS-08 का द्रव्यमान लगभग 175.5 किलोग्राम है और यह लगभग 420 वाट बिजली उत्पन्न करता है. इस उपग्रह का जीवनकाल एक साल है.
  • उपग्रह ‘SR-0’ चेन्नई स्थित अंतरिक्ष क्षेत्र के स्टार्टअप स्पेस रिक्शा का पहला उपग्रह है.

शुभांशु शुक्ला को इसरो और नासा के संयुक्त अंतरिक्ष मिशन के लिए चुना गया

भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को भारतीय अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी इसरो और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के संयुक्त अंतरिक्ष मिशन ‘एक्सिओम-4’ के लिए चुना गया है.

मुख्य बिन्दु

  • अगर कैप्टन शुक्ला इस मिशन के तहत अंतरिक्ष जाते हैं तो वो भारत के दूसरे अंतरिक्ष यात्री होंगे. राकेश शर्मा अंतरिक्ष में जाने वाले पहले और एकमात्र भारतीय हैं. 3 अप्रैल 1984 को उन्होंने सोवियत रॉकेट सोयुज टी-11 से अंतरिक्ष की यात्रा की थी.
  • इसरो ने 2 अगस्त को एक्सिओम-4 मिशन के लिए कैप्टन शुभांशु शुक्ला (39 साल) के साथ ग्रुप कैप्टन प्रशांत बालाकृष्णन नायर (48 साल) का चयन किया है.
  • शुभांशु शुक्ला प्राथमिक (प्राइम) अंतरिक्ष यात्री होंगे जबकि नायर को बैकअप के लिए चुना गया है. यानि शुभांशु अगर किसी वजह से इस मिशन पर नहीं जा पाए तो बालाकृष्णन नायर उनकी जगह लेंगे.
  • ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ‘एक्सिओम-4’ मिशन के तहत अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) जाएंगे. यह अमेरिका की एक निजी स्पेस कंपनी एक्सिओम स्पेस का चौथा मिशन होगा.
  • यह मिशन स्पेसएक्स रॉकेट के ज़रिये लॉन्च होगा. नासा ने एक्सिओम-4 मिशन के लिए कोई तारीख निर्धारित नहीं की है.
  • अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पहुंचने वाले इस अंतरिक्ष यान में ग्रुप कैप्टन शुक्ला के साथ पौलेंड, हंगरी और अमेरिका के भी अंतरिक्ष यात्री होंगे.
  • साल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका के बीच इस मिशन पर सहमति बनी थी.

गगनयान मिशन

  • शुभांशु शुक्ला और बालाकृष्णन नायर इसरो के ‘गगनयान’ मिशन में भी शामिल हैं. गगनयान मिशन के लिए भारतीय वायुसेना के चार पायलटों का चयन किया गया है. गगनयान मिशन में अन्य दो पायलट अजीत कृष्णन और अंगद प्रताप हैं.
  • गगनयान मिशन के तहत तीन अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किलोमीटर की कक्षा में भेजा जाएगा जिसके तीन दिन बाद उन्हें वापस आना होगा.
  • वर्तमान में, केवल तीन देश- रूस, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के पास मानव अंतरिक्ष मिशन लॉन्च करने की क्षमता है.

अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS)

  • अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (International Space Station) एक प्रकार का अंतरिक्ष यान है जो अंतरिक्ष में पृथ्वी की परिक्रमा करता है और जहां अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक रह सकते हैं.
  • अंतरिक्ष यात्री अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन का उपयोग विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधान उद्देश्यों के लिए किया जाता है. यह पृथ्वी से लगभग 400 किमी ऊपर है.
  • अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को 1998 में लॉन्च किया गया था. यह यूरोप, अमेरिका, रूस, कनाडा और जापान की एक संयुक्त परियोजना है.

निजी तौर पर निर्मित देश के दूसरे रॉकेट ‘अग्निबाण SOrTeD’ का प्रक्षेपण किया गया

भारत ने अंतरिक्ष क्षेत्र में 29 मई को इतिहास रच दिया. निजी तौर पर निर्मित देश के दूसरे अंतरिक्ष रॉकेट का निजी लॉन्चपैड ‘धनुष’ से प्रक्षेपण किया गया. चेन्नई की अंतरिक्ष स्टार्टअप अग्निकुल कॉसमॉस ने श्रीहरिकोटा से सिंगल स्टेज टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर ​रॉकेट ‘अग्निबाण SOrTeD’ का सफल प्रक्षेपण किया.

मुख्य बिन्दु

  • यह ऐसा पहला प्रक्षेपण था जिसमें गैस एवं तरल यानी दोनों प्रकार के ईंधन का इस्तेमाल किया गया. SOrTeD में दुनिया के पहले सिंगल पीस 3डी प्रिंटेड सेमी-क्रायोजेनिक इंजन का इस्तेमाल किया गया है. इसका डिजाइन स्वदेशी तौर पर तैयार किया गया और इसे देश में ही बनाया गया है.
  • इस प्रक्षेपण को ऐतिहासिक इसलिए भी माना जा रहा है क्योंकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अब तक ऐसे सेमी-क्रायोजेनिक इंजन को सफलतापूर्वक नहीं उड़ाया नहीं है, जिसमें प्रोपेलर के तौर पर तरल एवं गैस दोनों प्रकार के ईंधन का उपयोग किया जाता है.
  • ‘अग्निबाण SOrTeD’ को अग्निकुल द्वारा स्थापित भारत के पहले निजी लॉन्च पैड ‘धनुष’ से प्रक्षेपित किया गया है.
  • अग्निकुल अंतरिक्ष में अपना रॉकेट प्रक्षेपित करने वाली दूसरी भारतीय निजी कंपनी बन गई है. रॉकेट प्रक्षेपित करने वाली पहली निजी कंपनी हैदराबाद स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस थी. इसने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) श्रीहरिकोटा लॉन्चपैड से अपना स्वदेशी रूप से विकसित ‘विक्रम-एस’ रॉकेट को अक्टूबर 2022 में प्रक्षेपित किया था.
  • अग्निकुल के इस मिशन का मुख्य उद्देश्य एक परीक्षण उड़ान के रूप में काम करना, देसी तकनीकों का प्रदर्शन करना, महत्त्वपूर्ण उड़ान डेटा जुटाना और अग्निकुल के प्रक्षेपण यान अग्निबाण के लिए प्रणालियों का बेहतर कामकाज सुनिश्चित करना है.
  • अग्निबाण रॉकेट, दो चरण वाला प्रक्षेपण यान है जो करीब 300 किलोग्राम तक पेलोड को 700 किलोमीटर की ऊंचाई पर कक्षाओं में ले जा सकता है.
  • चेन्नई स्तिथ अग्निकुल कॉसमॉस की स्थापना 2017 में मोइन एसपीएम और श्रीनाथ रविचंद्रन ने आईआईटी मद्रास के सहयोग से की थी.

चंद्रयान-3 की टीम को अमेरिका के स्पेस फाउंडेशन का शीर्ष पुरस्कार

इसरो की चंद्रयान-3 मिशन टीम को अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए 2024 जॉन एल ‘जैक’ स्विगर्ट, जूनियर पुरस्कार (John L. ‘Jack’ Swigert Jr. Award) से सम्मानित किया गया है. यह पुरस्कार अमेरिका के स्पेस फाउंडेशन (Space Foundation) द्वारा दिया जाता है.

मुख्य बिन्दु

  • कोलोराडो स्थित स्पेस फाउंडेशन के वार्षिक अंतरिक्ष संगोष्ठी उद्घाटन समारोह में यह पुरस्कार प्रदान किया गया. ह्यूस्टन में भारत के महावाणिज्य दूत डीसी मंजूनाथ ने इसरो की टीम की ओर से पुरस्कार प्राप्त किया.
  • स्पेस फाउंडेशन अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सूचना, शिक्षा और सहयोग प्रदान करता है. स्पेस फाउंडेशन के सीईओ हीथर प्रिंगल ने कहा, अंतरिक्ष में भारत का नेतृत्व दुनिया के लिए एक प्रेरणा है.
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को यह पुरस्कार चंद्रयान-3 टीम की असाधारण उपलब्धियों के लिए दिया गया है. चंद्रयान-3 चंद्रमा के अज्ञात दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र पर उतरने वाला विश्व का पहला यान था.
  • इसरो ने चंद्रयान-3 मिशन को जुलाई 2023 में लॉन्च किया था. चंद्रयान-3 मिशन में शामिल विक्रम नामक लैंडर और प्रज्ञान नामक रोवर को 23 अगस्त, 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक उतारा गया था.
  • अंतरिक्ष अन्वेषण के लिए जॉन एल. ‘जैक’ स्विगर्ट जूनियर पुरस्कार का नाम अंतरिक्ष यात्री जॉन एल. स्विगर्ट जूनियर के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने प्रसिद्ध अपोलो 13 चंद्र मिशन में काम किया था.

ISRO के सैटेलाइट पीएसएलवी ने शून्य कक्षीय मलबा मिशन पूरा किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के रॉकेट PSLV ने शून्य कक्षीय मलबा मिशन (ISRO Achieves Zero Orbital Debris Mission) पूरा कर एक बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है. इससे फायदा यह होगा कि अब इसरो नए मिशन के लिए जो भी रॉकेट लॉन्च करेगा, उसका मलबा अंतरिक्ष में नहीं बिखरेगा.

मुख्य बिन्दु

  • इसरो ने इस मिशन को ऐसे समय में पूरा किया है जब दुनिया भर के वैज्ञानिकों के लिए अंतरिक्ष में मलबा एक बड़ी चुनौती बना हुआ है.
  • यह उपलब्धि 21 मार्च को हासिल किया गया जब PSLV ऑर्बिटल एक्सपेरिमेंटल मॉड्यूल-3 (POEM-3) ने पृथ्वी के वायुमंडल में फिर से प्रवेश किया और अपने मिशन को पूरा किया.
  • इस परीक्षण में PSLV-C58 /एक्सपीओसैट मिशन ने व्यावहारिक रूप से कक्षा में शून्य मलबा छोड़ा है.
  • किसी भी सैटेलाइट को उसकी कक्षा में स्थापित करने के बाद पीएसएलवी तीन हिस्सों में बंट जाता है. इसे POEM-3 कहा जाता है.
  • इस परीक्षण में PSLV को पहले 650 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा से 350 किलोमीटर वाली कक्षा में लाया गया.
  • इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि कक्षा बदलने के दौरान किसी भी सैटेलाइट के दुर्घटनाग्रस्त होने का खतरा कम हो जाएगा.

चंद्रयान-3 की लैंडिग साइट शिव-शक्ति को IAU ने मंजूरी दी

अंतरराष्ट्रीय खगोलीय संघ (IAU) ने 19 मार्च को चंद्रयान -3 की लैंडिंग साइट के लिए ‘शिव शक्ति’ नाम को मंजूरी दे दी है. यह नाम प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 26 अगस्त, 2023 को मिशन की सफलता की घोषणा के बाद दिया गया था.

चंद्रयान-3 मिशन

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा प्रक्षेपित चंद्रयान-3 का विक्रम लैंडर 23 अगस्त को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग किया था.
  • भारत चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का चौथा (अमेरिका, रूस, चीन के बाद) और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला विश्व का पहला देश बना है.

लैंडर मॉड्यूल ने जहां पर कदम रखे, उस जगह का नामकरण

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चंद्रयान-3 के लैंडर मॉड्यूल ‘विक्रम’ ने जहां पर कदम रखे, उस जगह को ‘शिवशक्ति‘ नाम दिया था.
  • प्रधानमंत्री मोदी ने चंद्रयान-2 के इम्पैक्ट पॉइंट को ‘तिरंगा‘ नाम दिया है. वर्ष 2019 में यहीं पर चंद्रयान-2 का लैंडर क्रैश हो गया था.

इसरो ने का पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान ‘पुष्पक’ का सफल परीक्षण किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 22 मार्च 2024 को अपने रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) की लैंडिंग का सफल परीक्षण किया था. इसका नाम ‘पुष्पक’ है. यह कर्नाटक के चित्रदुर्ग में चालाकेरे एयरोनॉटिकल टेस्ट रेंज में की गई थी. पुष्पक इसरो का इस तरह के प्रयासों की श्रृंखला में दूसरा (RLV LEX-02) था.

पुष्पक का परीक्षण: मुख्य बिन्दु

  • पुष्पक खास तरह का स्पेस शटल है. इसे जटिल युद्धाभ्यास करने, त्रुटियों को ठीक करने और पूरी तरह से स्वायत्त रूप से रनवे पर उतरने के लिए डिज़ाइन किया गया है. पुष्पक परियोजना की अनुमानित लागत 100 करोड़ रुपये (लगभग 13.5 मिलियन डॉलर) है.
  • पुष्पक मिशन प्राथमिक उद्देश्य रीयूजेबल (पुनः उपयोग योग्य) प्रक्षेपण यान (लॉन्च व्हीकल) के लिए आवश्यक प्रौद्योगिकियों का विकास करना है, जिससे प्रक्षेपण लागत काम हो सके.
  • इस परीक्षण में पुष्पक RLV को भारतीय वायु सेना के चिनूक हेलीकॉप्टर द्वारा उठाया गया और फिर 4.5 किलोमीटर की ऊंचाई से छोड़ा गया. इसके जारी होने के बाद रनवे से 4 किलोमीटर की दूरी पर पुष्पक सुधार करते हुए स्वतंत्र रूप से रनवे की ओर चला गया. यह रनवे पर ठीक से उतरा और ब्रेक पैराशूट, लैंडिंग गियर ब्रेक और नोज व्हील स्टीयरिंग सिस्टम का उपयोग करके रुक गया.
  • रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल का अगला चरण संभावित रूप से कक्षा में मौजूद उपग्रहों में ईंधन भरने या नवीनीकरण के लिए उपग्रहों को वापस लाने में सक्षम हो सकता है. पुष्पक आरएलवी को रीयूजेबल सिंगल-स्टेज-टू-ऑर्बिट (SSTO) वाहन के रूप में डिजाइन किया गया है.
  • इसरो  (ISRO) ने अपने लॉन्च वाहन के लिए ‘पुष्पक’ नाम चुना है. लंबे समय से इसरो अपने रॉकेट का नामकरण पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल, जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) और स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (एसएसएलवी) जैसे नामों से करता रहा है.

देश के पहले मानव अंतरिक्ष उडान मिशन ‘गगनयान’ के लिए चार यात्रियों के नाम घोषित

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के पहले मानव अंतरिक्ष उडान मिशन ‘गगनयान’ (Gaganyaan Mission) के लिए चार यात्रियों के नाम की घोषणा 28 फ़रवरी को की थी. ये अंतरिक्ष यात्री ‘गगनयान मिशन’ के लिए प्रशिक्षण ले रहे हैं.

मुख्य बिन्दु

  • गगनयान मिशन के लिए ये अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन प्रशांत नायर, ग्रुप कैप्टन अजीत कृष्णन, ग्रुप कैप्टन अंगद प्रताप और विंग कमांडर शुभांशु शुक्ला चुने गए हैं. चारों देश के हर तरह के फाइटर जेट्स उड़ा चुके हैं.
  • सभी अंतरिक्ष यात्री जो पहले क्रू मिशन का हिस्सा होंगे, वे भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के टेस्ट पायलट हैं. इनके चयन के लिए इसरो और आईएएफ के इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन (आईएएम) जिम्मेदार थे.
  • अंतरिक्ष उड़ान के लिए आवश्यक परिस्थितियों के अनुकूल ढलने के लिए उन्हें शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से प्रशिक्षित किया जाता है. विभिन्न प्रकार के विमान उड़ाने के कारण, वे जल्दी ही नई प्रणालियों से परिचित हो जाते हैं. वे विभिन्न प्रकार के दबावों और गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध काम करने के भी आदी होते हैं.
  • भारतीय वायुसेना के इंस्टीट्यूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन (आइएएम) ने 2019 में 12 टेस्ट पायलटों का चयन किया था. इसरो ने कई चरणों के बाद इनमें से चार लोगों का अंतिम चयन किया.
  • इन चारों को शुरुआती प्रशिक्षण के लिए रूस भेजा गया था. प्रशिक्षण 2021 में पूरा हुआ. अब इन्हें बेंगलुरु में कई एजेंसियां और सशस्त्र बल प्रशिक्षण दे रहे हैं. चारों नियमित रूप से वायुसेना के विमान भी उड़ाते हैं.

क्या है गगनयान मिशन

  • गगनयान मिशन में चालक दल के चार सदस्यों को तीन दिन के लिए पृथ्वी से 400 किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष की कक्षा में भेजा जाएगा और सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाया जाएगा.
  • यह मिशन 2025 में लॉन्च होगा. मिशन के लिए ‘क्रू मॉड्यूल’ रॉकेट का इस्तेमाल होगा.
  • इसरो ने अक्टूबर 2023 में श्रीहरिकोटा से गगनयान स्पेसक्राफ्ट लॉन्च किया था. परीक्षण यह जानने के लिए था कि क्या रॉकेट में खराबी की हालत में अंतरिक्ष यात्री सुरक्षित बच सकते हैं.
  • गगनयान मिशन में कामयाबी मिलने पर अमेरिका, चीन और रूस के बाद भारत मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन भेजने वाला चौथा देश बन जाएगा.

इसरो ने GSLV-F14 रॉकेट के माध्यम से मौसम उपग्रह ‘INSAT-3DS’ को प्रक्षेपित किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 17 फ़रवरी, 2024 को मौसम उपग्रह ‘INSAT-3DS’ को प्रक्षेपित किया था. इसे श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर (SDSC-SHAR) से GSLV-F14 रॉकेट के माध्यम से अंतरिक्ष में भेज गया.

मुख्य बिन्दु

  • उपग्रह INSAT-3DS का वजन 2,274 किलोग्राम है. यह तीसरी पीढ़ी का मौसम पूर्वानुमान संबंधी अत्याधुनिक उपग्रह है. इसे भूस्थैतिक कक्षा में स्थापित किया गया है. यह पूरी तरह से पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा वित्त पोषित है.
  • यह उपग्रह मौसम के साथ-साथ आपदा को लेकर भी अलर्ट जारी करेगी. खास तौर पर भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी IMD और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत विभिन्न विभागों को सेवा प्रदान करेगा.
  • INSAT-3DS में छह चैनल इमेजर, 19 चैनल साउंडर पेलोड, डेटा रिले ट्रांसपोंडर (DRT) और सैटेलाइट सहायता प्राप्त खोज और बचाव (SA & SR) ट्रांसपोंडर हैं.
  • उपग्रह INSAT-3DS का प्रक्षेपण GSLV-F14 रॉकेट से किया गया था. इस रॉकेट का नाम ‘नॉटी बॉय’ दिया गया है. GSLV-F14, 51.7 मीटर लंबा और 420 टन वजन वाला तीन फेज का जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV) है.
  • बहरहाल, उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए इसरो मुख्य रूप से तीन रॉकेटों का प्रयोग करता है. GSLV, PSLV और LVM3. PSLV की तुलना में GSLV कहीं अधिक शक्तिशाली रॉकेट है. यह  PSLV से ज्यादा भारी उपग्रहों को कैरी कर सकता है.
  • चूंकि सफल प्रक्षेपणों के मामले में GSLV का ट्रैक रिकॉर्ड PSLV जितना अच्छा नहीं रहा है, इसलिए इसरो के एक पूर्व अध्यक्ष ने इसे ‘नॉटी बॉय’ का उपनाम दिया है.
  • यह GSLV रॉकेट का कुल मिलाकर 16वां मिशन था और स्वदेशी रूप से विकसित क्रायोजेनिक इंजन का उपयोग करके इसकी 10वीं उड़ान थी.

इसरो ने आदित्‍य एल-1 उपग्रह को अंतिम कक्षा में सफलतापूर्वक स्‍थापित किया

भारतीय अतंरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 6 जनवरी को आदित्‍य एल-1 उपग्रह (Aditya L-1 satellite) को अंतिम कक्षा में सफलतापूर्वक स्‍थापित कर दिया. आदित्‍य एल-1 भारत का पहला सौर अभियान है जो सूर्य के कोरोना, सूर्य के भीषण ताप और पृथ्‍वी पर इसके प्रभाव का अध्ययन करेगा.

मुख्य बिन्दु

  • आदित्‍य एल-1 को हालो कक्षा में एल-1 बिन्‍दु (लैग्रेंजियन बिंदु) के नजदीक सफलतापूर्वक प्रवेश कराया गया है. इसरो ने इसके लिए कमान केन्‍द्र से मोटर और थ्रस्‍टर का प्रयोग किया.
  • एल-1 बिन्‍दु पृथ्‍वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है. अंतरिक्ष यान में 440 न्‍यूटन लिक्विड अपोजी मोटर, आठ 22 न्‍यूटन थ्रस्‍टर और चार 10 न्‍यूटन थ्रस्‍टर लगे थे जो इसे एल-1 बिन्‍दु तक ले गये.
  • लैग्रेंजियन बिंदु वह स्थान है जहां कोई वस्तु सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण प्रभाव के कारण संतुलन में रह सकती है. यह बिन्‍दु पृथ्वी से लगभग 15 लाख किलोमीटर दूर है.
  • लैग्रेंजियन बिंदु का उपयोग अंतरिक्ष यान द्वारा स्थिति में बने रहने के लिए आवश्यक ईंधन की खपत को कम करने के लिए किया जा सकता है.
  • एल-1 बिंदु, पांच लैग्रेंजियन बिंदुओं में से एक है. यह बिंदु सूर्य का निर्बाध दृश्य प्राप्त करता है और वर्तमान में सौर और हेलिओस्फेरिक वेधशाला उपग्रह SOHO इसी बिन्दु पर हैं.

ISRO ने एक्स-रे पोलारिमीटर सैटेलाइट का सफल प्रक्षेपण किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 1 जनवरी 2024 को एक्स-रे पोलारिमीटर सैटेलाइट (XPoSat) का सफल प्रक्षेपण किया था. यह प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा में सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया गया था. इस प्रक्षेपण अभियान में 10 अन्य वैज्ञानिक पेलोड्स उपग्रहों को भी प्रक्षेपित किया गया था.

मुख्य बिन्दु

  • यह सैटेलाइट ब्लैक होल (आकाशगंगा) और न्यूट्रॉन सितारों का अध्ययन करेगा. यह मिशन करीब पांच साल (2028 तक) का होने वाला है.
  • एक्सपोसैट (XPoSat) का प्रक्षेपण ध्रुवीय सैटेलाइट लॉन्च व्हिकल (PSLV)-C5 के माध्यम से किया गया था. PSLV-C5 का लिफ्ट-ऑफ द्रव्यमान 260 टन है. यह रॉकेट एक्सपोसैट को पृथ्वी से 650 किमी ऊंचाई पर स्थापित किया.
  • इस मिशन के माध्यम से अमेरिका के बाद भारत ब्लैक होल (आकाशगंगा) और न्यूट्रॉन सितारों का अध्ययन करने के लिए एक विशेष सैटेलाइट भेजने वाला दुनिया का दूसरा देश बन गया.

चंद्रयान-3 के प्रज्ञान रोवर को निष्क्रिय किया गया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चंद्रयान-3 के रोवर ‘प्रज्ञान’ के पेलोड्स को फिलहाल निष्‍क्रिय कर दिया है. चंद्रमा की सतह पर अपने सभी कार्य पूरा करने के बाद इसे निष्‍क्रिय किया गया है.

इसरो द्वारा प्रक्षेपित चंद्रयान-3 का लैंडर ‘विक्रम’ और उसके अंदर रखे रोवर ‘प्रज्ञान’ ने 23 अगस्त को चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग किया था. लैंडिंग के कुछ घंटे बाद प्रज्ञान रोवर विक्रम लैंडर से बाहर आ गया था और इसने चांद की सतह पर घूमना शुरू किया था.

मुख्य बिन्दु

  • रोवर ‘प्रज्ञान’ की बैटरी सूर्य का प्रकाश द्वारा चार्ज होता है. चन्‍द्रमा पर 14 दिन तक सूर्य का प्रकाश उपलब्ध न होने के कारण रोवर पेलोड्स को निष्क्रिय किया गया है.
  • प्रज्ञान रोवर चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित है. रोवर की बैटरी पूरी तरह से चार्ज है और चंद्रमा पर 22 सितम्‍बर को अगले सूर्योदय होने पर इसे प्रकाश मिलने लगेगा. रिसीवर को चालू रखा गया है.
  • इसरो ने आशा व्‍यक्‍त की है कि प्रज्ञान रोवर को अन्य कार्यों के लिए फिर से सफलतापूर्वक सक्रिय किया जा सकेगा. ऐसा न होने पर भी रोवर हमेशा के लिए चंद्रमा की सतह पर मौजूद रहेगा.
  • 26 किलो वजन वाला छह पहियों पर चलने वाला और सौर शक्ति संचालित रोवर ने चंद्रमा की सतह की छानबीन कर हम तक अहम जानकारी पहुंचाई है.
  • चंद्र ग्रह पर सल्फर, एल्यूमीनियम, सिलिकॉन, कैल्शियम और आयरन की मौजूदगी का प्रमाण भेजा गया है.