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जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश की रूप में शपथ ली

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने 9 नवंबर को भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश (CJI)  की रूप में शपथ ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें राष्ट्रपति भवन में पद की शपथ दिलाई। जस्टिस चंद्रचूड़ ने जस्टिस उदय उमेश ललित का स्थान लिया है।

1959 में जन्मे डीवाई चंद्रचूड़ 13 मई, 2016 को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश नियुक्त किए गए थे। इससे पहले वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश रहे। जस्टिस चंद्रचूड़ के पिता वाईपी चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के 16वें मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं.

भारत के मुख्य न्यायाधीश: एक दृष्टि

  • भारत का मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) भारतीय न्यायपालिका तथा सर्वोच्च न्यायालय का अध्यक्ष होता है.
  • भारत में अब तक कुल 50 (वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सहित) न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की है. न्यायमूर्ति श्री एचजे कनिया भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश थे.
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह पर मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं.
  • सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन 2,80,000 मासिक और न्यायाधीश का वेतन 2,50,000 मासिक है. इनके लिए वेतन संसद तय करती है जो कि संचित निधि से पारित होती है.
  • न्यायाधीश का कार्यकाल 65 वर्ष की आयु तक होता है.

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भारत के 50वें CJI मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ को भारत का 50वां मुख्य न्यायाधीश (CJI) नियुक्त किया गया है. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 16 अक्तूबर को उन्हें इस पद पर नियुक्त किया. वे 9 नवंबर से अपना पदभार ग्रहण करेंगे.

निवर्तमान चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया यूयू ललित ने अपने उत्तराधिकारी के तौर पर केंद्र सरकार से डीवाई चंद्रचूड़ के नाम की सिफारिश की थी.

जस्टिस चंद्रचूड़ 10 नवंबर 2024 को इस पद से सेवानिवृत्त होंगे. जस्टिस चंद्रचूड़ के पिता वाईपी चंद्रचूड़ सुप्रीम कोर्ट के 16वें मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं.

भारत के मुख्य न्यायाधीश: एक दृष्टि

  • भारत का मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) भारतीय न्यायपालिका तथा सर्वोच्च न्यायालय का अध्यक्ष होता है.
  • भारत में अब तक कुल 49 (वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सहित) न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की है. न्यायमूर्ति श्री एचजे कनिया भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश थे.
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह पर मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं.
  • सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन 2,80,000 मासिक और न्यायाधीश का वेतन 2,50,000 मासिक है. इनके लिए वेतन संसद तय करती है जो कि संचित निधि से पारित होती है.
  • न्यायाधीश का कार्यकाल 65 वर्ष की आयु तक होता है.

न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित भारत के 49वें प्रधान न्यायाधीश बने

न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित भारत के 49वें प्रधान न्यायाधीश बने

न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित ने भारत के नए प्रधान न्यायाधीश के रूप में 27 अगस्त को शपथ ली. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु उन्‍हें राष्‍ट्रपति भवन में पद की शपथ दिलाई.

मुख्य बिन्दु

  • वे भारत के 49वें प्रधान न्यायाधीश बने हैं. उन्होंने  सेवानिवृत्त हुए 48वें प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एनवी रमणा का स्थान लिया है.
  • न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित का कार्यकाल 74 दिन (8 नवंबर 2022 तक) का होगा, जो औसत कार्यकाल से कम है. न्यायमूर्ति ललित के बाद सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ अगले (50वें) प्रधान न्यायाधीश हो सकते हैं. उनका कार्यकाल दो वर्ष का होगा.
  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश 65 वर्ष और उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु होने पर सेवानिवृत्त होते हैं.
  • भारत गणराज्य में अब तक कुल 49 (वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सहित) न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की है। न्यायमूर्ति श्री एचजे कनिया भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश थे.

राजीव हत्‍या कांड दोषी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश, जानिए क्या है अनुच्छेद 142

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्‍या कांड में दोषी एजी पेरारिवलन की रिहाई का आदेश दिया है. पेरारिवलन इस मामले में पिछले 31 सालों उम्रकैद की सजा काट रहे सात दोषियों में से एक है. कोर्ट ने संविधान के अनुच्‍छेद 142 में मिले विशेषाधिकार के तहत यह फैसला लिया.

मुख्य बिंदु

  • पेरारिवलन ने सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में कहा था कि तमिलनाडु राज्य मंत्रिमंडल ने उसे रिहा करने के लिए राज्यपाल से सिफारिश की थी, लेकिन राज्यपाल ने फाइल को काफी समय तक अपने पास रखने के बाद राष्ट्रपति को भेज दिया था. यह संविधान के खिलाफ है.
  • जस्टिस एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मामले के सभी सातों दोषियों की समय से पहले रिहाई की सिफारिश संबंधी तमिलनाडु राज्य मंत्रिमंडल की सलाह राज्यपाल के लिए बाध्यकारी थी.
  • सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा था कि अगर राज्यपाल पेरारिवलन के मुद्दे पर राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश को मानने को तैयार नहीं हैं तो उन्हें फाइल को पुनर्विचार के लिए वापस मंत्रिमंडल में भेज देना चाहिए था.
  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस दलील को भी अस्वीकार कर दिया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत किसी मामले में माफी देने का अधिकार विशिष्ट रूप से राष्ट्रपति के पास है. पीठ ने कहा कि यह अनुच्छेद 161 को निष्प्रभावी कर देगा.
  • दरअसल, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने कहा था कि केवल राष्ट्रपति ही केंद्रीय कानून के तहत दोषी ठहराए गए व्यक्ति की माफी, सजा में बदलाव और दया संबंधी याचिकाओं पर फैसला कर सकते हैं.
  • राजीव गांधी हत्याकांड में सात लोगों को दोषी ठहराया गया था. सभी दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई थी, लेकिन साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया था.
  • तमिलनाडु सरकार राजीव हत्याकांड के आरोपियों की रिहाई चाहती है. मौजूदा डीएमके सरकार के साथ ही पूर्ववर्ती जे जयललिता और एके पलानीसामी की सरकारों ने 2016 और 2018 में दोषियों की रिहाई की राज्यपाल से सिफारिश की थी.
  • 21 मई 1991 को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में हत्या हुई थी. इसके बाद 11 जून 1991 को पेरारिवलन को गिरफ्तार किया गया था.

अनुच्छेद 161 में क्या है?

अनुच्छेद 161 में राज्यपाल के पास दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा को माफ करने, राहत देने, राहत या छूट देने या निलंबित करने, हटाने या कम करने की शक्ति दी गई.

अनुच्छेद 72 और अनुच्छेद 161 में अंतर

अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का दायरा अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से ज्यादा व्यापक है. कोर्ट मार्शल के तहत राष्ट्रपति व्यक्ति की सजा माफ कर सकता है लेकिन अनुच्छेद 161 राज्यपाल को ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं करता है. राष्ट्रपति उन सभी मामलों में क्षमादान दे सकता है जिसमें मौत की सजा दी गई हो, लेकिन राज्यपाल की क्षमादान शक्ति मौत की सजा के मामले के लिए नहीं होती है.

क्या है संविधान का अनुच्छेद 142?

भरतीय संविधान के अनुच्छेद 142 में सुप्रीम कोर्ट को विशेष अधिकार दिया गया है. इस आर्टिकल के मुताबिक जब तक किसी अन्य कानून को लागू नहीं किया जाता तब तक सुप्रीम कोर्ट का आदेश सर्वोपरि रहेगा. इसके तहत कोर्ट ऐसे फैसले दे सकता है जो किसी लंबित पड़े मामले को पूरा करने के लिए जरूरी हो.

सुप्रीम कोर्ट ने 124-A के अंतर्गत देशद्रोह कानून को स्थगित करने का आदेश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124-A के अंतर्गत देशद्रोह कानून को स्थगित करने का आदेश दिया है. शीर्ष न्‍यायालय ने एक अंतरिम आदेश में केंद्र और राज्य सरकारों से इस धारा पर पुनर्विचार होने तक कोई भी प्राथमिकी दर्ज नहीं करने का आग्रह किया है.

सुप्रीम कोर्ट इससे संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है. प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यों की पीठ राजद्रोह कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है. इस पीठ में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और हिमा कोहली शामिल हैं.

मुख्य बिंदु

  • न्‍यायालय ने एक कहा है कि धारा 124A के अंतर्गत लगाए गए आरोपों के संबंध में सभी लंबित मामले अपील और कार्यवाही को फिलहाल स्थगित रखा जाए. जो लोग पहले से ही इस धारा के अंतर्गत जेल में हैं, वे जमानत के लिए संबंधित अदालतों में जा सकते हैं.
  • केन्‍द्र सरकार ने उच्‍चतम न्‍यायालय में बताया था कि उसने IPC की धारा 124A के प्रावधानों पर का दुरुपयोग को रोकने के लिए पुनर्विचार करने का फैसला किया है. सरकार ने शीर्ष न्यायालय से आग्रह किया कि जब तक यह काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक इससे संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई न की जाए.
  • सरकार ने न्‍यायालय में दाखिल शपथ-पत्र में कहा कि 1962 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने ‘केदारनाथ बनाम बिहार राज्य’ मामले में इस कानून को वैध बताया है.

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124-A: एक दृष्टि

  • भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A को 1870 में शामिल किया गया था. इसके मुताबिक अगर कोई भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमानना फैलाने का प्रयास करता है तो यह राजद्रोह माना जाएगा.
  • भारत में इस कानून को अंग्रेज सरकार भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की अभिव्यक्ति को दबाने के लिए लेकर आई थी. इसके जरिए महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक जैसे नेताओं के लेखन को दबा दिया गया. इन लोगों पर राजद्रोह कानून के तहत मुकदमे चलाए गए.
  • अनुच्छेद 124A के मुताबिक राजद्रोह एक गैर-जमानती अपराध है. इसके दोषी को तीन साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा के साथ जुर्माना तक हो सकता है. जिस व्यक्ति पर राजद्रोह का आरोप होता है वह सरकारी नौकरी नहीं कर सकता. उसका पासपोर्ट भी जब्त कर लिया जाता है.
  • इस कानून से जुड़ा एक मामला हाल ही में चर्चा में रहा है. अप्रैल, 2022 में महाराष्ट्र में सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति रवि राणा पर राजद्रोह का केस दर्ज हुआ. दोनों नेताओं ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के घर के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने का एलान किया था. राज्य सरकार का कहना था कि दोनों सरकार और मुख्यमंत्री के खिलाफ घृणा फैला रहे थे.

न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना देश के 48वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली

न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना ने 24 अप्रैल को भारत के 48वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में शपथ ग्रहण की. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में उन्हें पद की शपथ दिलाई. जस्टिस रमन्ना का कार्यकाल 26 अगस्त 2022 तक होगा.

मौजूदा मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने देश के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति रमन्ना के नाम की सिफारिश की थी जिसे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी दी थी.

एनवी रमन्ना
एनवी रमन्ना का पूरा नाम नाथुलापति वेंकट रमन्ना है. उन्हें 2014 में सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था. जून 2000 में जस्टिस रमन्ना आंध प्रदेश हाईकोर्ट के स्थायी जज के तौर पर नियुक्त हुए थे. सितंबर 2013 में वो दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए थे.

भारत के मुख्य न्यायाधीश: एक दृष्टि

भारत का मुख्य न्यायधीश (Chief Justice of India) भारतीय न्यायपालिका तथा सर्वोच्च न्यायालय का अध्यक्ष होता है. भारत में अब तक कुल 48 (वर्तमान मुख्य न्यायाधीश सहित) न्यायाधीशों ने मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा की है. न्यायमूर्ति श्री एचजे कनिया भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश थे.

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(2) के अनुसार राष्ट्रपति अपनी इच्छानुसार सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की सलाह पर मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करते हैं. वहीं अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश की सलाह पर करते हैं.

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का वेतन 2,80,000 मासिक और न्यायाधीश का वेतन 2,50,000 मासिक है. इनके लिए वेतन संसद तय करती है जो कि संचित निधि से पारित होती है. न्यायाधीश का कार्यकाल 65 वर्ष की आयु तक होता है.

न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना देश के 48वें मुख्य न्यायाधीश होंगे

न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना भारत के 48वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) होंगे. मौजूदा मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने अपने न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना के नाम की सिफारिश की थी. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 6 अप्रैल को इनके नाम पर मंजूरी दी.

मौजूदा मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे 23 अप्रैल को सेवानिवृत्त होंगे और 24 अप्रैल को न्यायमूर्ति एनवी रमन्ना अगले मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेंगे. जस्टिस रमन्ना का कार्यकाल 26 अगस्त 2022 तक होगा.

एनवी रमन्ना: एक दृष्टि
एनवी रमन्ना का पूरा नाम नाथुलापति वेंकट रमन्ना है. उन्हें 2014 में सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त किया गया था. जून 2000 में जस्टिस रमन्ना आंध प्रदेश हाईकोर्ट के स्थायी जज के तौर पर नियुक्त हुए थे. सितंबर 2013 में वो दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किए गए थे.

उच्चतम न्यायालय ने वाट्सएप, ईमेल और फैक्स से समन भेजने की इजाजत दी

उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) ने वाट्सएप, ईमेल और फैक्स से लगभग सभी कानूनी प्रक्रियाओं के लिए अनिवार्य समन और नोटिस भेजने की इजाजत दे दी है. मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अगुआई में पीठ ने फोन मैसेंजर सेवाओं के माध्यम से उसी दिन नोटिस और समन भेजे जाने की इजाजत दी. इस पीठ में जस्टिस एएस बोपन्ना और आर सुभाष रेड्डी भी शामिल हैं,

पीठ ने वाट्सएप को विशेष रूप से प्रभावी सेवा के रूप में नामित करने के अटॉर्नी जनरल के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया. पीठ ने कहा, दो नीले निशान बताएंगे कि प्राप्तकर्ता ने नोटिस देख लिया है.

पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने राज्‍यसभा के मनोनीत सदस्‍य के रूप में शपथ ली

उच्‍चतम न्‍यायालय के पूर्व प्रधान न्यायाधीश (CJI) रंजन गोगोई ने 19 मार्च को राज्‍यसभा के मनोनीत सदस्‍य के रूप में शपथ ली. राज्‍यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडु ने उन्‍हें शपथ दिलाई. राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनित किया था. उन्होंने 3 अक्तूबर 2018 से 15 नवंबर 2019 तक देश के 46वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में सेवा दी थी.

ऐसा पहली बार हुआ है जब राष्ट्रपति ने किसी पूर्व प्रधान न्यायाधीश को राज्यसभा के लिए मनोनित किया हो. इससे पहले पूर्व प्रधान न्यायाधीश मोहम्मद हिदायतुल्लाह और रंगनाथ मिश्रा भी राज्यसभा के सदस्य रह चुके हैं, लेकिन ये राज्यसभा चुनाव द्वारा चुने गये थे.

केंद्र सरकार ने गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया था और गृह मंत्रालय ने इस आशय की अधिसूचना जारी की थी. जारी अधिसूचना के मुताबिक, ‘संविधान के अनुच्छेद 80 के खंड (1) के उपखंड (a) और इसी अनुच्छेद के खंड (3) के तहत राष्ट्रपति ने गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनित किया था. राष्ट्रपति ने राज्यसभा के मनोनीत सदस्यों में से एक के कार्यकाल पूरा होने की वजह से रिक्त हुई सीट पर रंजन गोगोई का मनोयन किया है. यह सीट केटीएस तुलसी के कार्यकाल पूरा होने की वजह से रिक्त हुई थी.

राज्यसभा: एक दृष्टि

  • राज्यसभा भारतीय संसद का उच्च सदन जबकि लोकसभा निम्न सदन है. राज्य सभा के सदस्यों की वर्तमान संख्या 245 है. जिनमें 12 सदस्य भारत के राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किए जाते हैं. अन्य सदस्यों का चुनाव होता है.
  • राज्यसभा के सदस्य 6 साल के लिए चुने जाते हैं, जिनमें एक-तिहाई सदस्य हर 2 साल में सेवा-निवृत होते हैं. भारत के उप-राष्ट्रपति (वर्तमान में वैकेया नायडू) राज्यसभा के सभापति होते हैं. राज्यसभा का पहला सत्र 13 मई 1952 को हुआ था.
  • संविधान के अनुच्छेद 80 में राज्यसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 निर्धारित की गई है. जिनमें 12 सदस्य भारत के राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत किए जाते हैं और 238 सदस्य राज्यों के और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रतिनिधि होते हैं. राज्यसभा के सदस्यों की वर्तमान संख्या 245 है.
  • राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाने वाले सदस्य ऐसे व्यक्ति होते हैं जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा जैसे विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है.
  • संविधान के अनुच्छेद 84 के अनुसार राज्यसभा का सदस्य चुने जाने वाले उम्मीदवार को भारत का नागरिक होना चाहिए और उसे कम से कम 30 वर्ष की आयु का होना चाहिए.

रंजन गोगोई: मुख्य बिंदु

  • रंजन गोगोई पूर्वोत्तर (असम) के पहले व्यक्ति बने जिन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया. उनके पिता केशब चंद्र गोगोई असम के मुख्यमंत्री रहे.
  • गोगोई सुप्रीम कोर्ट की उस पांच सदस्यीय पीठ के अध्यक्ष थे जिसने नौ नंवबर 2019 को संवेदनशील अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाया था. यह इतिहास में दूसरी सबसे लंबी सुनवाई रही थी.
  • उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उन पीठों की भी अध्यक्षता की थी जिन्होंने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और राफेल लड़ाकू विमान सौदे जैसे मसलों पर फैसले सुनाए थे.
  • गोगोई सुप्रीम कोर्ट के 25 न्यायाधीशों में से उन 11 न्यायाधीशों में शामिल रहे जिन्होंने अदालत की वेबसाइट पर अपनी संपत्ति का विवरण दिया था.
  • जस्टिस गोगोई का 16 दिसंबर 2015 को दिया गया एक आदेश उन्हें इतिहास में खास मुकाम पर दर्ज कराता है.
  • देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश के जरिए किसी राज्य का लोकायुक्त नियुक्त किया था.
  • जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सेवानिवृत न्यायाधीश जस्टिस वीरेन्द्र सिंह को उत्तर प्रदेश का लोकायुक्त नियुक्त करने का आदेश जारी किया था.

भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शरद अरविंद बोबडे ने शपथ ली

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ने भारत के 47वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में 18 नवम्बर को शपथ ली. राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्‍ट्रपति भवन में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई. न्‍यायमूर्ति रंजन गोगोई के 17 नवम्बर को सेवानिवृत्‍त हो जाने के बाद श्री बोबड़े भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश बने हैं. न्‍यायमूर्ति बोबड़े का कार्यकाल 23 अप्रैल, 2021 तक होगा.

न्यायमूर्ति बोबड़े 12 अप्रैल, 2013 में उच्‍चतम न्‍यायालय के न्‍यायाधीश के रूप में नियुक्‍त किये गये थे. वे ऐतिहासिक अयोध्‍या फैसला सुनाने वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ में शामिल थे.

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जस्टिस बोबडे के मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने को 29 अक्टूबर को मंजूरी दे दी थी. प्रक्रिया के अनुसार सेवानिवृत्त होने वाले मुख्य न्यायधीश अगले मुख्य न्यायधीश के नाम की अनुशंसा विधि मंत्री को भेजते हैं. विधि मंत्री इस नाम को मंत्रीपरिषद् के समक्ष प्रस्तुत करते हैं और मंत्रीपरिषद् की सहमति से राष्ट्रपति मंजूरी प्रदान करते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने शबरिमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मामले की सुनवाही बड़ी बेंच को दिया

सुप्रीम कोर्ट ने शबरिमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के मामले की सुनवाही के लिए सात जजों की बड़ी बेंच को दे दिया है. यह संवैधानिक बेंच इस मामले के साथ-साथ मस्जिद में मुस्लिम, अज्ञारी में पारसी महिलाओं और दाऊदी बोहरा समुदाय की महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर भी फैसला लेगी.

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अपने फैसले पर पुनर्विचार याचिकाओं को 3-2 के बहुमत के आधार पर बड़ी बेंच को भेजा. 3 जजों ने बहुमत से मामले को 7 जजों की संविधान पीठ को रेफर किया है जबकि 2 जजों- जस्टिस नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने इसके खिलाफ अपना निर्णय दिया.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि महिलाओं के प्रवेश का पिछला फैसला फिलहाल बरकरार रहेगा. CJI रंजन गोगोई ने कहा कि धार्मिक प्रथाओं को सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और संविधान के भाग 3 के अन्य प्रावधानों के खिलाफ नहीं होना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट ने लिंग आधारित भेदभाव माना था
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2018 को अपने फैसले में शबरिमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं और लड़कियों के प्रवेश पर लगी रोक को लिंग आधारित भेदभाव माना था. कोर्ट ने हिंदू धर्म की सदियों पुरानी इस परंपरा को गैरकानूनी और असंवैधानिक कहा था.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हिंसक विरोध के बाद 56 पुनर्विचार याचिकाओं सहित करीब 60 याचिकाएं अदालत में दाखिल हुईं जिन पर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने सुनवाई की.

सुप्रीम कोर्ट ने रफाल लड़ाकू विमानों की खरीद के मामले में जांच की याचिका को नामंजूर किया

सुप्रीम कोर्ट ने 36 रफाल लड़ाकू विमानों की खरीद के मामले में न्‍यायालय की निगरानी में जांच की मांग संबंधी पुनर्विचार याचिकाओं को आज खारिज कर दिया. न्‍यायालय ने कहा कि पुनर्विचार याचिकाएं सुनवाई लायक नहीं है. तीन न्‍यायाधीशों की पीठ ने रफाल सौदे में प्राथमिकी दर्ज करने की मांग भी नामंजूर कर दी. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस के कौल और जस्टिस के एम जोसेफ की पीठ ने फैसला सुनाया.

इन याचिकाओं में 14 दिसम्‍बर 2018 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई थी जिसमें न्‍यायालय ने कहा था कि रफाल खरीद के निर्णय से संबंधित प्रक्रिया में संदेह का कोई सवाल ही नहीं है.

न्‍यायालय में दायर पुनर्विचार याचिकाओं में पूर्व केन्‍द्रीय मंत्रियों यशवंत सिन्‍हा और अरूण शौरी तथा अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण की याचिकाएं भी शामिल थीं. याचिका में आरोप लगाया गया है कि रफाल सौदे से जुड़े महत्‍वपूर्ण तथ्‍यों को दबाया गया है, इसलिए इसकी आपराधिक जांच की जानी चाहिए.