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मछलियों में होने वाली ‘वायरल नर्वस नेक्रोसिस’ बीमारी के लिए भारत में एक स्वदेशी टीका विकसित

मछलियों में होने वाली ‘वायरल नर्वस नेक्रोसिस’ (Viral Nervous Necrosis) बीमारी के लिए भारत में पहली बार एक स्वदेशी टीका (वैक्सीन) विकसित किया गया है. इस टीके का विकास चेन्नई स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रैकिश एक्वाकल्चर (Central Institute of Brackish Aquaculture) ने किया है. इस टीके का नाम नोडावैक-आर (Nodavac-R) है.

‘वायरल नर्वस नेक्रोसिस’ (VNN) बीमारी बीटानोडै-वायरस (Betanoda-virus) के कारण होती है. यह बीमारी मछलियों के 40 से अधिक प्रजातियों को प्रभावित करती है, उनमें से ज्यादातर समुद्री प्रजातियां हैं. यह ज्यादातर टेलीस्ट मछली (teleost fish) को प्रभावित करता है.

जलवायु परिवर्तन के लिये सबसे शक्तिशाली सुपर कंप्यूटर

दिग्गज टेक कंपनी ‘माइक्रोसॉफ्ट’ और ब्रिटेन के ‘मेट ऑफिस’ मिलकर दुनिया के सबसे शक्तिशाली सुपर कंप्यूटर के निर्माण की घोषणा की है. यह सुपर कंप्यूटर मौसम और जलवायु-परिवर्तन से संबंधित पूर्वानुमान के लिये होगा.

इस सुपर कंप्यूटर के वर्ष 2022 तक परिचालन शुरू कर देने का अनुमान है. इसके माध्यम से गंभीर मौसम घटनाओं की सटीक पूर्वानुमान और चेतावनी जारी की जा सकेगी, जिससे आम लोगों को ब्रिटेन में लगातार बढ़ रहे तूफान, बाढ़ और बर्फ के प्रभाव से बचाने में मदद मिलेगी.

यह सुपर कंप्यूटर नवीकरणीय ऊर्जा से चलेगा जिससे एक वर्ष में 7,415 टन कार्बन डाइऑक्साइड को बचाने में मदद मिलेगी. इसमें 5 मिलियन से अधिक प्रोसेसर कोर होंगे जो प्रति सेकंड 60 क्वाड्रिलियन गणना करने में सक्षम होगा.

पृथ्वी पर मात्र 3 प्रतिशत भू-भाग ही मानव गतिविधियों से दूर

हाल ही में किये गये एक शोध से पता चला है कि पृथ्वी पर मात्र 3 प्रतिशत भू-भाग ही मानव गतिविधियों से दूर रहा है जहाँ पारिस्थितिक रूप से (ecologically) सभी प्रकार के मूल प्रजाति (native species) का निवास है.

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा किया गया यह शोध ‘फ्रंटियर्स इन फारेस्ट एंड ग्लोबल चेंज’ (Frontiers in Forests and Global Change) जर्नल में प्रकाशित हुआ है.

इंटैक्ट हैबिटेट क्या है?

विज्ञान की भाषा में मानव गतिविधियों से दूर भू-भाग को ‘इंटैक्ट हैबिटेट’ (Intact Habitat) कहा जाता है. पहले यह दावा किया गया था कि पृथ्वी का 40% हिस्सा इंटैक्ट हैबिटेट है. हालांकि, इस अध्ययन कहता है कि यह क्षेत्र मात्र 3% है.

इंटैक्ट हैबिटेट: शोध के मुख्य बिंदु

पृथ्वी का मात्र 3 प्रतिशत भू-भाग ही ‘इंटैक्ट हैबिटेट’ है. यह वह क्षेत्र है जहाँ मानव गतिविधि का कोई संकेत नहीं है.
इस शोध में पाया गया है कि इंटैक्ट हैबिटेट में मौजूद प्रजातियां, आक्रामक प्रजातियों या बीमारियों के कारण समाप्त हो रही हैं. इसका तात्पर्य है कि इंटैक्ट हैबिटेट मानव गतिविधियों के बिना भी खतरों का सामना कर रहे हैं.
कार्यात्मक रूप से इंटैक्ट हैबिटेट क्षेत्र उत्तरी कनाडा, बोरेल, कांगो बेसिन अमेज़ॅन, सहारा रेगिस्तान, टुंड्रा बायोम, पूर्वी साइबेरिया हैं.

पहली बार मृतकों के दिल को मशीन से जिंदा कर 6 बच्चों में ट्रांसप्लांट किया गया

ब्रिटेन के डॉक्टरों ने मृत घोषित हो चुके व्यक्तियों के दिल का उपयोग कर 6 बच्चों का सफलतापूर्वक ट्रांसप्लांट किया है. इसके लिए एक खास किस्म की मशीन का इस्तेमाल किया गया है. ये सभी बच्चे अब पूरी तरह स्वस्थ हैं. इससे पहले हार्ट ट्रांसप्लांट में केवल उन व्यक्तियों के ही हार्ट का उपयोग होता था, जो ब्रेन डेड घोषित होते थे.

ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) के डॉक्टरों ने हार्ट ट्रांसप्लांट की यह तकनीक विकसित की है. इसके लिए NHS ने ‘ऑर्गन केयर सिस्टम’ (Organ care system) मशीन बनाई है.

इस तकनीक का उपयोग करते हुए केंब्रिजशायर के रॉयल पेपवर्थ अस्पताल के डॉक्टरों ने ऑर्गन केयर मशीन के जरिए मृत व्यक्तियों के दिल को जिंदा कर 6 बच्चों के शरीर में धड़कन पैदा कर दी. यह उपलब्धि हासिल करने वाली यह दुनिया की पहली टीम बन गई है.

इस तकनीक से 12 से 16 साल के 6 ऐसे बच्चों को नया जीवन मिला, जो पिछले दो-तीन सालों से अंगदान के रूप में हार्ट मिलने का इंतजार कर रहे थे.

मरणोपरांत हार्ट डोनेट की प्रक्रिया: एक दृष्टि

  • इस तकनीक के बिकसित हो जाने के बाद अब मरणोपरांत दिल (हार्ट) डोनेट किया जा सकेगा, और लोगों को ट्रांसप्लांट के लिए लंबे समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा.
  • मृत्यु की पुष्टि होते ही डोनर के दिल को तुरंत निकालकर इस मशीन में रखकर 12 घंटे तक जांचा जाता है और उसके बाद ही ट्रांसप्लांट किया जाता है.
  • डोनर से मिले दिल को जिस मरीज के शरीर में लगाना है, उसके शरीर की आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन, पोषक तत्व और उसके ग्रुप का ब्लड इस मशीन में रखे दिल में 24 घंटों तक प्रवाहित किया जाता है.

नासा का पांचवां रोवर परसिवेअरेंस सफलतापूर्वक मंगल ग्रह की सतह पर उतरा

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (नासा) का पांचवां रोवर ‘परसिवेअरेंस’ (Perseverance) सफलतापूर्वक मंगल ग्रह की सतह पर उतर गया है. यह रोवर धरती से 47.2 करोड़ किलोमीटर की यात्रा कर मंगल ग्रह की सतह पर 19 फरवरी को उतरा. छह पहियों वाला ये रोवर अगले दो साल तक मंगल की सतह पर मौजूद चट्टानों का परीक्षण कर जीवन के प्रमाणों की तलाश करेगा.

‘परसिवेअरेंस’ नासा द्वारा भेजा गया अब तक का सबसे बड़ा रोवर है. इस रोवर की सफलतापूर्वक लैंडिंग के बाद अमेरिका मंगल ग्रह पर सबसे ज्यादा रोवर भेजने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी का यह 9वां मंगल अभियान है.

रोवर परसिवेअरेंस (Perseverance): एक दृष्टि

  • एक टन भार वाला यह रोवर, सात फीट लंबी रोबोटिक आर्म से लैस है. वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए इसमें 19 कैमरे, दो माइक्रोफोन और अत्याधुनिक उपकरण लगे हैं. इसमें लेजर स्पेक्ट्रोमीटर भी है, जिससे ऊर्जा के विभिन्न तरंगों का उपयोग करके चट्टानों की जांच की जा सकेगी.
  • ये रोवर करीब 30 चट्टानों और मिट्टी के नमूने इकट्ठा करके 2030 के दशक में किसी समय प्रयोगशाला विश्लेषण के लिए पृथ्वी पर भेजेगा.

वैज्ञानिकों ने धरती से सबसे दूर स्थित ब्लैक होल की खोज की

वैज्ञानिकों ने धरती से सबसे दूर स्थित महाविशाल ब्लैक होल (Supermassive Black Hole) की खोज कर ली है. यह 13 अरब प्रकाश वर्ष दूर है. J0313-1806 नाम के ब्लैक होल का द्रव्यमान हमारे सूरज से 1.6 अरब गुना ज्यादा है और इसकी चमक हमारी आकाशगंगा से हजार गुना ज्यादा है.

महाविशाल ब्लैक होल: मुख्य तथ्य

  • ऐरिजोना यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट्स के मुताबिक यह महाविशाल ब्लैक होल तब पैदा हुआ था जब ब्रह्मांड सिर्फ 67 करोड़ साल पुराना था.
  • इस महाविशाल ब्लैक होल का शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण आसपास के मटीरियल को अपनी ओर खींच लेता है जिससे उसके आसपास बेहद गर्म मटीरियल की एक डिस्क पैदा हो जाती है. इससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा का उत्सर्जन होता है और क्वाजर (Quasar) पैदा होते हैं.
  • अभी तक माना जाता रहा है कि महाविशाल ब्लैक होल सितारों के क्लस्टर के मरने से पैदा होते हैं. हालांकि, इस ब्लैक होल की खोज और आकार के साथ अब ऐस्ट्रोनॉमर्स का कहना है कि हो सकता है कि एकदम शुरुआती ठंडी हाइड्रोजन गैस के ढहने से ये बने हों.
  • स्टडी में पाया गया है कि अगर यह महाविशाल ब्लैक होल बिग बैंग के सिर्फ 10 करोड़ साल बाद पैदा हुआ है तो इसे तेजी से बढ़ने के लिए हमारे सूरज के 10 हजार गुना द्रव्यमान की शुरू में जरूरत रही होगी.

पृथ्‍वी के घूमने की गति बढ़ी, 0.5 मिली सेकंड पहले ही एक चक्कर पूरा कर रही है

वैज्ञानिकों के अनुसार धरती के घूमने की गति बढ़ रही है. हम सभी जानते हैं कि पृथ्‍वी 24 घंटे में अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा करती है. इसी कारण हमें दिन और रात का अनुभव होता है. अब यह 24 घंटे से पहले ही अपनी धुरी पर एक चक्कर पूरा कर रही है. वैज्ञानिक इसके करणों की खोज कर रहे हैं. नेशनल फिजिकल लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों के अनुसार, पिछले 50 सालों के दौरान धरती अपनी धुरी पर तेजी से घूमने लगी है.

वैज्ञानिकों को पहली बार पृथ्‍वी के अपनी धुरी पर घूमने की गति बढ़ने का पता जून 2020 में लगा था. तब से पृथ्‍वी 24 घंटे में 0.5 मिली सेकंड पहले ही एक चक्कर पूरा कर रही है. उनका कहना है कि इसके कारण हर देश को अपनी घड़ियों में बदलाव करना होगा. यह बदलाव एटॉमिक क्लॉक में करना होगा. विज्ञान की भाषा में इसे लीप सेकंड कहा जाता है. कुल मिलाकर वैज्ञानिकों को निगेटिव लीप सेकंड जोड़ना होगा.

पेरिस स्थित इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन सर्विस के वैज्ञानिक पृथ्‍वी के अपनी धुरी पर घूमने का पिछले 50 साल का रिकॉर्ड की जाँच कर रहे हैं. उनका अनुमान है कि 50 साल का सटीक समय निकालकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि आगे क्या होगा.

पिछले 50 साल में कई बार लीप सेकेंड जोड़े जा चुके हैं. साल 1970 से अब तक 27 लीप सेकेंड जोडे़ गए हैं. पृथ्‍वी की घूमने की गति में होने वाले बदलाव के कारण ऐसा किया जाता है. आखिरी बार 31 दिसंबर 2016 को लीप सेकेंड जोड़ा गया था. अब, लीप सेकेंड की जगह ‘निगेटिव लीप सेकेंड’ जोड़ने की बात हो रही है.

पृथ्‍वी के घूमने की गति में परिवर्तन का असर

पृथ्‍वी के घूमने का असर व्यापक रूप से इन्सानों पर पड़ता है. यह बात महज चंद मिली सेकंड की नहीं है. यह समय गड़बड़ाने से हमारी संचार व्यवस्था में परेशानी आ सकती है. कारण हमारे सैटेलाइट्स और संचार यंत्र सोलर टाइम के अनुसार सेट किये जाते हैं. ये समय तारों, चांद और सूरज के पोजिशन के अनुसार सेट हैं.

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने ‘गौ विज्ञान’ पर राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित किये जाने की घोषणा की

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग (RKA) ने ‘गौ विज्ञान’ (Cow Science) पर राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित किये जाने की घोषणा की है. इसकी घोषणा RKA के अध्यक्ष वल्लभभाई कथीरिया ने 5 जनवरी को की. इस परीक्षण का उद्देश्य देशी गायों और इसके फायदे के बारे में छात्रों और आम लोगों के बीच रुचि पैदा करना है.

यह परीक्षण प्रत्येक वर्ष आयोजित किया जायेगा. इस वर्ष इस परीक्षा का आयोजन 25 फरवरी को किया जाएगा. इस ऑनलाइन परीक्षा का नाम ‘गौ विज्ञान प्रचार-प्रसार परीक्षा’ होगा. इस परीक्षा में प्राथमिक, माध्यमिक और कॉलेज स्तर के छात्र और आम लोग निशुल्क हिस्सा ले सकेंगे

इस परीक्षा में ऑब्जेक्टिव टाइप प्रश्न पूछे जाएंगे और आयोग की वेबसाइट पर पाठ्यक्रम के बारे में ब्यौरा उपलब्ध कराया जाएगा. परीक्षा परिणामों की घोषणा तुरंत कर दी जाएगी और सर्टिफिकेट दिए जाएंगे. साथ ही होनहार उम्मीदवारों को इनाम दिया जाएगा.

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग क्या है?

राष्ट्रीय कामधेनु आयोग की स्थापना केंद्र सरकार ने फरवरी 2019 में की थी. इसका लक्ष्य गायों के संरक्षण, संवर्द्धन के लिए काम करना है. यह मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत आता है.

चीन ने प्रकाश आधारित दुनिया का पहला क्वांटम कंप्यूटर ‘जियूझांग’ बनाने का दावा किया

चीन के वैज्ञानिकों ने प्रकाश आधारित, दुनिया का पहला क्वांटम कंप्यूटर बनाने का दावा किया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक यह कंप्यूटर पारंपरिक सुपर कंप्यूटर के मुकाबले कहीं अधिक तेजी से कार्य कर सकता है. इस सुपर कंप्यूटर का नाम गणित के प्राचीन चीनी ग्रंथ के नाम पर ‘जियूझांग’ दिया गया है.

जियूझांग क्वांटम कंप्यूटर भरोसेमंद तरीके से कंप्यूटेशनल एडवान्टेज का प्रदर्शन कर सकता है, जो कंप्यूटर क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि है. इस कंप्यूटर की मदद से शक्तिशाली मशीन को बनाने के तरीके में मौलिक बदलाव आएगा.

क्वांटम कंप्यूटर: एक दृष्टि

क्वांटम कंप्यूटर बहुत तेजी से काम करते हैं, जो पारंपरिक कंप्यूटर के लिए संभव नहीं है. इनकी मदद से भौतिक विज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और चिकित्सा क्षेत्र में उपलब्धि हासिल होती है. यह सुपर कंप्यूटर जो गणना मात्र 200 सेकेंड (100 ट्रिलियन गुना तेज) में कर सकता है, उसे करने में पारंपरिक पद्धति से बने दुनिया के सबसे तेज कंप्यूटर ‘फुगाकू’ को 60 करोड़ साल लगेंगे.

पिछले साल गूगल ने 53 क्यूबिट क्वांटम कंप्यूटर बनाने की घोषणा की थी. जियूझांग 76 फोटॉन में हेरफेर कर जटिल गणना करता है, जबकि गूगल का क्वांटम कंप्यूटर सुपर कंडक्टिव वस्तुओं का इस्तेमाल करता है.

भारत के सबसे बड़े HPC-AI सुपरकंप्यूटर ‘PARAM Siddhi–AI’ को कमीशन किया

C-DAC (Centre for Development of Advanced Computing) ने भारत के सबसे बड़े HPC-AI सुपरकंप्यूटर ‘PARAM Siddhi–AI’ को कमीशन किया. HPC-AI का पूरा नाम High Performance Computing and Artificial Intelligence है. PARAM Siddhi–AI विज्ञान प्रद्योगिकी के क्षेत्र में शोध और खोज में मदद करेगा.

भारत का पहला सुपर कंप्यूटर ‘Param Shivay’ था. इसका निर्माण भी C-DAC द्वारा किया गया था. परम शिवाय ने 1,20,000 से अधिक गणना कोर और 833 टीफ्लॉप्स का उपयोग किया. TeaFlop कंप्यूटर की प्रोसेसिंग स्पीड का एक पैमाना है.

अमेरिका में कल्पना चावला के नाम पर अंतरिक्ष यान का नाम रखा गया

अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी नॉर्थरोप ग्रुमेन ने अपने अगले स्पेस स्टेशन रिसप्लाय शिप ‘NG-14’ सिग्नस अंतरिक्ष यान का नाम ‘एस एस कल्पना चावला’ रखने की घोषणा की है. यह अंतरिक्ष यान 29 सितंबर को इंटरनेशनल स्‍पेस स्‍टेशन के लिए लॉन्‍च किया जाएगा.

एस एस कल्पना चावला एक री-सप्‍लाई शिप है. यह अंतरिक्ष यान अपने साथ इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) के लिए करीब 3629 किग्रा वजनी सामान लेकर जाएगा. इसे वर्जीनिया स्पेस के मिड-अटलांटिक रीजनल स्पेसपोर्ट (MARS) वॉलॉप्स द्वीप से कक्षा में लॉन्च किया जाएगा.

कल्‍पना चावला: एक दृष्टि

16 जनवरी, 2003 को कल्‍पना चावला अमेरिकी अंतिरक्ष यान कोलंबिया के चालक दल के रूप में अंतरिक्ष में जाने वाली भारत की पहली महिला बनी थीं. पृथ्वी के वायुमंडल में फिर से प्रवेश करने के दौरान कोलंबिया अंतरिक्ष यान दुर्घटना ग्रस्त हो गया था. इस दुर्घटना में सभी सात क्रू सदस्यों की मौत हो गयी थी. चावला ने नासा में भारतीय मूल की पहली महिला अंतरिक्ष यात्री के रूप में इतिहास रचा है.

सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया ने कोविड-19 वैक्‍सीन ‘कोविशील्‍ड’ के ट्रायल रोक लगाई

सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने कोविड-19 वैक्‍सीन ‘कोविशील्‍ड’ (Covid-19 vaccine Covishield) का ट्रायल रोक दिया है. देशभर में 17 अलग-अलग जगहों पर इस टीके का परीक्षण हो रहा था. कंपनी ने यह फैसला ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) से नोटिस पाने के बाद लिया. DCGI ने नोटिस में कहा कि SII ने वैक्‍सीन के ‘सामने आए गंभीर प्रतिकूल प्रभावों’ के बारे में अपना एनालिसिस भी उसे नहीं सौंपा.

ब्रिटेन की दावा कंपनी अस्‍त्राजेनेका ने ऑक्‍सफर्ड यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स के साथ मिलकर यह वैक्‍सीन बनाई है. DCGI ने सीरम इंस्टिट्यूट से पूछा था कि उसने यह क्‍यों नहीं बताया कि अस्‍त्राजेनेका ने इस वैक्‍सीन का ट्रायल रोक दिया है. अस्‍त्राजेनेका के ट्रायल रोकने का ऐलान करने के बावजूद सीरम इंस्टिट्यूट ने ट्रायल जारी रखने की बात कही थी.

संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और यूनाइटेड किंगडम सहित विभिन्न देशों में ‘कोविशील्‍ड’ परीक्षण चरण में था. भारत में इस टीका के फेज 2 और 3 ट्रायल को मंजूरी दी गई थी. सीरम इंस्टिट्यूट ने अस्‍त्राजेनेका के साथ कोविड- 19 टीके की एक अरब डोज बनाने की डील कर रखी है. वही इस वैक्‍सीन का भारत में क्लिनिकल ट्रायल कर रही है. अबतक देश में करीब 100 लोगों को यह टीका लगाया जा चुका है.

सीरम इंस्टिट्यूट अपना जवाब DCGI को सौंपेगा. बहुत कुछ अस्‍त्राजेनेका पर भी निर्भर करेगा कि उसकी जांच में क्‍या निकलकर आता है. ट्रायल अस्‍थायी तौर पर इसलिए रोका गया है ताकि बीमारी के बारे में और जाना जा सके.