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Tag Archive for: Constitution of India

भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने पद से त्यागपत्र दिया

July 22, 2025/by Team EduDose

भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया. उन्होंने अपना त्यागपत्र राष्‍ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को सौंपा. उन्होंने त्यागपत्र का कारण, स्‍वास्‍थ्‍य प्राथमिकता और चिकित्‍सा परामर्श के पालन को बताया है.

त्यागपत्र देने वाले तीसरे उपराष्ट्रपति

  • वीवी गिरि और भैरों सिंह शेखावत के बाद जगदीप धनखड़ अपने कार्यकाल के दौरान त्यागपत्र देने वाले तीसरे उपराष्ट्रपति हैं.
  • 10वें उपराष्ट्रपति कृष्णकांत एकमात्र ऐसे उपराष्ट्रपति हैं जिनका कार्यकाल के दौरान निधन (27 अगस्त 2002) हो गया था.
  • आर वेंकटरमन, शंकर दयाल शर्मा और केआर नारायणन ने भारत के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद उपराष्ट्रपति पद से त्यागपत्र दे दिया था.

राज्य सभा के सभापति

  • अनुच्छेद-64 के तहत उप-राष्ट्रपति भारतीय संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं. इसलिए राज्य सभा के उप-सभापति, नए उप-राष्ट्रपति के निर्वाचित होने तक राज्यसभा के पीठासीन अधिकारी होंगे.

जगदीप धनखड़: एक दृष्टि

  • जगदीप धनखड़ मूल रूप से राजस्थान के झुंझुनू जिले में हुआ था. वे पेशे से एक वकील हैं, बाद में राजनीति में आ गए. वह भाजपा के वरिष्ठ नेता रहे है.
  • वह 1989 में झुंझुनू संसदीय क्षेत्र से लोकसभा सदस्य चुने गए थे. 1993 में किशनगढ़ विधानसभा सीट से राजस्थान विधानसभा सदस्य चुने गए.
  • उन्होंने 1990 में केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री के रूप में कार्य किया. वे 2019-2022 तक पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रहे.
  • जगदीप धनखड़ ने 11 अगस्त 2022 को भारत के 14वें उपराष्ट्रपति के रूप में शपथ ली थी.

भारतीय संविधान में उप-राष्ट्रपति

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 63 में भारत के उप-राष्ट्रपति होने की बात कही गई है. उप-राष्ट्रपति देश का दूसरा सर्वोच्च संवैधानिक पद है. उनका कार्यकाल पाँच वर्ष का होता है.
  • अनुच्छेद 65 के अनुसार, राष्ट्रपति की मृत्यु, इस्तीफे या हटाने की स्थिति में उपराष्ट्रपति उस तारीख तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा जब तक कि नए राष्ट्रपति की नियुक्ति नहीं की जाती.
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 67 (क) के अनुसार, उपराष्ट्रपति भारत के राष्ट्रपति को अपना त्यागपत्र दे सकता है.

उपराष्ट्रपति चुनाव

  • संविधान का अनुच्छेद 324 तहत, उपराष्ट्रपति चुनाव भारतीय निर्वाचन आयोग संपन्न कराता है. इसके लिए निर्वाचन आयोग एक निर्वाचन अधिकारी नियुक्त करता है.
  • राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों पदों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से (आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति) होता है. यानी चुनाव जनता की बजाय उनके द्वारा चुने गए जन प्रतिनिधि करते हैं.
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 66 में उपराष्ट्रपति के चुनाव की प्रक्रिया का उल्लेख है. उपराष्ट्रपति चुनाव में लोक सभा और राज्य सभा के सदस्य, जिनमें मनोनीत सदस्य भी शामिल हैं, मतदान में हिस्सा लेते हैं.
  • वहीं राष्ट्रपति के चुनाव में लोक सभा और राज्य सभा के निर्वाचित सदस्य और राज्यों के विधानमंडलों के सदस्यों को भी मतदान का अधिकार होता है. राष्ट्रपति चुनाव में किसी भी सदन के मनोनीत सदस्य को वोट नहीं डाल सकते.
  • राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति चुनाव में किसी भी संदेह या विवाद सामने आने पर संविधान के अनुच्छेद-71 के मुताबिक, फैसले का अधिकार केवल देश की सुप्रीम कोर्ट को है.
  • उपराष्ट्रपति पद के लिए नामांकन भरने के लिए उम्मीदवार को कम-से-कम 20 सांसद बतौर प्रस्तावक और 20 सांसद बतौर समर्थक दिखाने की शर्त पूरी करनी होती है. उपराष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होना चाहिए.

नए उपराष्ट्रपति चुनाव के लिए समय-सीमा

  • संविधान में भारत के कार्यवाहक उपराष्ट्रपति पद का कोई उल्लेख नहीं है. अतः नए उपराष्ट्रपति के निर्वाचित होने तक यह पद रिक्त रहेगा.
  • संविधान के अनुच्छेद 68 (ख) के अनुसार मृत्यु, त्यागपत्र, पदच्युति या अन्य किसी कारण से पद रिक्त होने की स्थिति में, नए उपराष्ट्रपति के लिए चुनाव यथाशीघ्र कराया जाएगा.
  • अतः संविधान में नए उप-राष्ट्रपति के चुनाव के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है, यदि यह पद किसी कारण से रिक्त हो जाता है.
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राष्ट्रपति ने 4 लोगों को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया

July 15, 2025/by Team EduDose

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने प्रख्यात वकील उज्ज्वल देवराव निकम, सामाजिक कार्यकर्ता सदानंदन मास्टर, पूर्व विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला और इतिहासकार तथा शिक्षाविद मीनाक्षी जैन को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया. गृह मंत्रालय ने 13 जुलाई को एक अधिसूचना में इस निर्णय की जानकारी दी.

  1. उज्जवल निकम: उज्जवल निकम मुंबई आतंकवादी हमलों के मामले में सरकारी वकील रह चुके हैं. उन्होंने 1993 मुंबई बम धमाके प्रमोद महाजन हत्या और कई मामलों में भी अभियोजन पक्ष का नेतृत्व किया है.
  2. सदानंदन मास्टर: सदानंदन मास्टर का राज्य में शिक्षा जगत में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. केरल के कन्नूर जिले में उनके घर के पास एक हमले में राजनीतिक प्रतिद्वंदियों ने उनके दोनों पैर काट दिए थे. इस दर्दनाक घटना के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और शिक्षा और समाज सेवा में सक्रिय बने रहे.
  3. हर्षवर्धन श्रृंगला: भारतीय विदेश सेवा के सेवानिवृत राजनयिक हर्षवर्धन श्रृंगला 2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता के मुख्य समन्वयक के रूप में भूमिका निभाई थी. इससे पहले वह भारत की विदेश सचिव, अमरीका सहित कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके हैं.
  4. डॉ. मिनाक्षी जैन: डॉ. मिनाक्षी जैन दिल्‍ली विश्वविद्यालय के गार्गी कॉलेज में इतिहास की एसोसिएट प्रोफेसर और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की शासी परिषद की सदस्य रह चुकी है.

संविधान का अनुच्छेद 80

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 80 के तहत भारत के राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वे कला, साहित्य, विज्ञान, समाज सेवा और अन्य क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले अधिकतम 12 सदस्यों को राज्यसभा के लिए मनोनीत कर सकते हैं.
  • राज्‍यसभा में अधिकतम 250 सदस्‍य हो सकते हैं, जिसमें 238 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं. यह संख्या संविधान के अनुच्छेद 80 में निर्धारित की गई है.
  • वर्तमान में राज्यसभा की कुल सदस्य संख्या 245 है. इनमें से 233 सदस्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (दिल्ली, पुदुचेरी और जम्मू-कश्मीर) के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, और 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत हैं.
  • राज्यसभा भारतीय संसद का उच्च सदन है. राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल छह वर्ष का होता है और एक-तिहाई सदस्य हर दो वर्ष में सेवानिवृत्त होते हैं. यह एक स्थायी निकाय है जिसे राष्ट्रपति द्वारा भंग नहीं किया जा सकता.
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अंतर-राज्यीय परिषद की स्थायी समिति का पुनर्गठन किया गया

November 15, 2024/by Team EduDose
  • केंद्र सरकार ने हाल ही में अंतर-राज्यीय परिषद (Inter State Council) की स्थायी समिति का पुनर्गठन किया है.
  • इस समिति की अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह करेंगे. इस समिति में कुल 12 सदस्य होंगे.
  • समिति के सदस्यों में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान, निर्मला सीतारमण, राजीव रंजन सिंह, वीरेंद्र कुमार और सीआर पाटिल शामिल हैं.
  • समिति में 7 मुख्यमंत्रियों को शामिल किया गया है. इसमें आंध्रप्रदेश, असम, झारखंड, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री हैं.

अंतर-राज्यीय परिषद

  • अंतर-राज्यीय परिषद का गठन केंद्र-राज्य और अंतर-राज्यीय सहयोग को सुविधाजनक बनाने के लिए किया गया है.
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 263, भारत के राष्ट्रपति अंतर-राज्यीय परिषद को गठित करने का अधिकार देता है.
  • सरकारिया आयोग ने इसको एक स्थायी निकाय बनाने की सिफारिश की थी. 28 मई 1990 को राष्ट्रपति के आदेश के बाद इसका औपचारिक गठन हुआ था.
  • प्रधानमंत्री, अंतर-राज्यीय परिषद इसके अध्यक्ष होते हैं. इसके सदस्यों में सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री/प्रशासक शामिल होते हैं.
  • वर्ष 1996 में गृह मंत्री की अध्यक्षता में एक स्थायी समिति गठित की गई थी. परिषद के अध्यक्ष के अनुमोदन से समय-समय पर इसका पुनर्गठन किया जाता है. इसका सचिवालय नई दिल्ली में स्थित है.
  • स्थायी समिति अंतरराज्यीय परिषद के लिए सभी महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार-विमर्श करने और सिफारिशें करने का काम करती है.
  • यह समिति केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों से जुड़े सभी मामलों पर गहन चर्चा करती है और परिषद में पेश होने से पहले इन मामलों का गहन मूल्यांकन करती है.
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सांसद महुआ मोइत्रा की संसद सदस्यता रद्द, जानिए किन परिस्थितियों में होती है सदस्यता रद्द

December 9, 2023/by Team EduDose

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा की संसद सदस्यता 9 दिसम्बर को रद्द कर दी गई. लोकसभा की एथिक्स कमेटी की सिफ़ारिश पर मोइत्रा की सदस्यता रद्द की गई है. उनपर पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने का मामला दर्ज किया गया था.

महुआ मोइत्रा पर आरोप था कि उन्होंने भारतीय कारोबारी गौतम अदानी और उनकी कंपनियों के समूह को निशाना बनाने के लिए रिश्वत लेकर लगातार संसद में सवाल पूछे. ये आरोप बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने लगाए थे.

संसद सदस्यता रद्द किन परिस्थितियों में होती है?

भारतीय संसद के इतिहास में अलग-अलग दौर में कई कारणों से राज्यसभा और लोकसभा सांसदों की सदस्यता रद्द हुई है. ऐसा भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों, जन प्रतिनिधित्व से जुड़े क़ानूनों और संसदीय नियमों के तहत होता है. कमोबेश ऐसे ही नियम विधानसभा सदस्यों पर भी लागू होते हैं.

अनुच्छेद 101

  • अगर कोई सदस्य संसद के दोनों सदनों यानी लोकसभा और राज्यसभा के लिए चुन लिया जाता है तो उसे किसी एक सदन की सदस्यता से इस्तीफ़ा देना होता है. इसी के साथ, यह भी कहा गया है कि कोई सदस्य संसद और विधानसभा, दोनों का सदस्य नहीं हो सकता.
  • अगर संसद के किसी भी सदन का सदस्य बिना इजाज़त सभी बैठकों से 60 दिनों की अवधि तक ग़ैर-हाज़िर रहता है तो उसकी सीट ख़ाली घोषित की जा सकती है.

अनुच्छेद 102

  • कोई भी सदस्य अगर भारत सरकार या राज्य सरकार में ऐसे पद पर है, जो लाभ के पद की श्रेणी में आता है तो उसे अयोग्य घोषित किया जाता है.
  • अगर कोई सांसद किसी अदालत द्वारा मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर दिया जाए तो उसकी सदस्यता ख़त्म हो सकती है.
  • अगर कोई सांसद दीवालिया घोषित है और किसी अदालत से राहत नहीं मिली तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है.
  • अगर कोई व्यक्ति भारत का नागरिक न हो या फिर वह किसी और देश की नागरिकता ग्रहण कर ले तो उसकी सदस्यता रद्द कर दी जाएगी.
  • इसके अलावा, किसी और देश के प्रति निष्ठा जताने पर भी सदस्यता जा सकती है.
  • किसी सांसद की सदस्यता दसवीं अनुसूची (दल-बदल रोधी क़ानून) के तहत, अगर कोई सांसद उस पार्टी की सदस्यता छोड़ता है, जिससे वह चुना गया है तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाएगी. हालांकि, इसके लिए अपवाद भी है. एक राजनीतिक दल किसी दूसरे दल में विलय कर सकता है, बशर्ते उसके कम से कम दो तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों.
  • दसवीं अनुसूची में ही यह प्रावधान किया गया है कि सांसद को अपनी पार्टी की ओर से जारी व्हिप का सम्मान करना होगा. अगर कोई सांसद किसी विषय पर मतदान के दौरान अपनी पार्टी के आदेशों का पालन ना करे या फिर वोटिंग से ग़ैर-हाजिर रहे तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है.

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम

  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम में प्रावधान है कि अगर कोई सांसद कुछ क़ानूनों के तहत दो साल या इससे अधिक की सज़ा पाता है तो उसकी सदस्यता जा सकती है.
  • अगर यह पाया जाए कि किसी सांसद ने अपने चुनावी हलफ़नामे में कोई ग़लत जानकारी दी है या फिर वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम का उल्लंघन करता है तो उसकी सदस्यता जा सकती है.
  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के तहत इन कारणों से सदस्यता रद्द हो सकती है:
  • आरक्षित सीटों पर ग़लत प्रमाण पत्र के आधार पर चुनाव लड़ना, दो समूहों के बीच नफ़रत फैलाना, चुनाव प्रभावित करना, घूस लेना, बलात्कार या महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराध, धार्मिक सौहार्द खराब करना, छुआछूत करना, प्रतिबंधित वस्तुओं का आयात-निर्यात.
  • संसद की आचार संहिता का उल्लंघन करने पर सदस्यता रद्द हो सकती है. संसद के दोनों सदनों में एथिक्स कमेटियां हैं, जो सांसदों के आचरण संबंधित शिकायतों की जांच कर करती हैं.
  • एथिक्स कमेटी को सदस्यों के ‘अनएथिकल’ व्यवहार की शिकायतों की जांच करके लोकसभा अध्यक्ष को सिफ़ारिशें भेजने का अधिकार है.
  • एथिक्स कमेटी को समय-समय पर नियम बनाने और उन्हें संशोधित करने का भी अधिकार है. महुआ मोइत्रा की संसद सदस्यता भी इसी एथिक्स कमेटी की सिफ़ारिश के आधार पर रद्द की गई है.
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संविधान का 106वां संशोधन: नारी शक्ति वंदन विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी

September 30, 2023/by Team EduDose

राष्‍ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 29 सितम्बर को संविधान के 128वें संशोधन विधेयक (128th Constitutional Amendment Bill) 2023 को मंजूरी दे दी. संसद के विशेष सत्र में दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) ने हाल ही में संविधान इस संशोधन विधेयक को पारित किया था.

राष्‍ट्रपति की मंजूरी के बाद अब यह विधेयक कानून बन गया है. इसके अंतर्गत लोकसभा और राज्‍य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित की गई हैं.

मुख्य बिन्दु

  • नए संसद भवन में पारित होने वाला यह पहला विधेयक है. राज्यसभा में यह विधेयक सभी सदस्यों के समर्थन से पारित हुआ था. लोकसभा में दो सदस्यों को छोड़कर सभी सदस्यों ने समर्थन दिया था. इस विधेयक को पारित कराने के लिए दो तिहाई बहुमत आवश्यक था.
  • इस विधेयक का नाम ‘नारी शक्ति वंदन विधेयक’ (Nari Shakti Vandan Bill) दिया गया था. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह विधेयक, अधिनियम (Nari Shakti Vandan Act) का रूप ले लिया है.
  • इससे पहले भारतीय संविधान में 105 संशोधन हो चुके थे. यह भारतीय संविधान का 106वां संशोधन (106th Constitutional Amendment) होगा. 106वें संशोधन के तहत भारतीय संविधान में एक नया अनुच्छेद 334A जोड़ा गया है.
  • नया अनुच्छेद प्रभावी होने के बाद 15 वर्षों की अवधि के लिए लोकसभा (330A), राज्य विधानसभाओं (332A) और दिल्ली विधान सभा (239AA) में एक तिहाई (33 प्रतिशत) सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रहेगा. आरक्षण की अवधि संसद द्वारा और आगे बढ़ाई जा सकेगी.
  • इस विधेयक के लागू होने के बाद होने वाली जनगणना के प्रकाशन में आरक्षण प्रभावी होगा. जनगणना के आधार पर महिलाओं के लिये सीटें आरक्षित करने हेतु परिसीमन किया जाएगा.
  • इस अधिनियम के तहत जनगणना के आधार पर, परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएंगी.
  • अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए मौजूदा कोटे के अन्‍दर इन जातियों की महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण भी दिया गया है.
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आर वेंकटरमणी भारत के नए अटॉर्नी जनरल नियुक्त किए गए

September 30, 2022/by Team EduDose

वरिष्ठ अधिवक्ता आर वेंकटरमणी को तीन साल की अवधि के लिए भारत का नया अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया गया है. रोहतगी ने केके वेणुगोपाल की जगह ली है जिनका कार्यकाल 30 सितंबर को समाप्त हो गया था.

भारत के महान्ययवादी (Attorney General): एक दृष्टि

  • भारतीय संविधान के अनुछेद 76 के अनुसार भारत के महान्ययवादी (अटॉर्नी जनरल) की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है. उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश बनने की योग्यता रखने वाले किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति महान्यायवादी के पद पर नियुक्त कर सकते हैं.
  • देश के महान्यायवादी का कर्तव्य कानूनी मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देना और कानूनी प्रकिया की उन जिम्मेदारियों को निभाना है जो राष्ट्रपति की ओर से उनके पास भेजे जाते हैं. इसके अतिरिक्त संविधान और किसी अन्य कानून के अंतर्गत उनका जो काम निर्धारित है, उनका भी पालन उन्हें पूरा करना होता है.
  • अपने कर्तव्य के निर्वहन के दौरान उन्हें देश के किसी भी न्यायालय में उपस्थित होने का अधिकार है. उन्हें संसद की कार्यवाही में भी भाग लेने का अधिकार है, हालांकि उनके पास मतदान का अधिकार नहीं होता. उनके कामकाज में सहायता के लिए सॉलिसिटर जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल होते हैं.
  • भारत के लिए पहले महान्ययवादी एमसी सीतलवाड हैं.
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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्षता में अंतर्राज्यीय परिषद का पुनर्गठन किया गया

May 28, 2022/by Team EduDose

सरकार ने हाल ही में अंतर्राज्यीय परिषद (ISC) का पुनर्गठन किया है. इस परिषद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्ष और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और 16 केंद्रीय मंत्री सदस्य हैं.

राजनाथ सिंह, अमित शाह, निर्मला सीतारमण, नरेंद्र सिंह तोमर, वीरेंद्र कुमार, हरदीप सिंह पुरी, नितिन गडकरी, एस जयशंकर, अर्जुन मुंडा, पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान, प्रल्हाद जोशी, अश्विनी वैष्णव, गजेंद्र सिंह शेखावत, किरेन रिजिजू और भूपेंद्र यादव केंद्रीय मंत्रियों में शामिल हैं.

सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित की अध्यक्षता में अंतर्राज्यीय परिषद की स्थायी समिति का भी पुनर्गठन किया है. आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री इस समिति के सदस्य होंगे. सदस्यों में केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण, नरेंद्र सिंह तोमर, वीरेंद्र कुमार और गजेंद्र सिंह शेखावत शामिल होंगे.

अंतर्राज्यीय परिषद: एक दृष्टि

  • न्यायमूर्ति आरएस सरकारिया की अध्यक्षता में वर्ष 1988 में गठित आयोग ने अंतर्राज्यीय परिषद स्थापित किये जाने की सिफारिश की थी.
  • अंतर्राज्यीय परिषद के अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और सभी राज्यों के मुख्यमंत्री इसके सदस्य होते हैं. विधानसभा नहीं रखने वाले केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासक इसके सदस्य होते हैं. इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत केंद्रीय मंत्रिपरिषद में कैबिनेट रैंक के छह मंत्री भी इसके सदस्य होते हैं.
  • अंतर्राज्यीय परिषद का कार्य देश में सहकारी संघवाद को बढ़ावा देने और उसका समर्थन करने के लिये एक मज़बूत संस्थागत ढाँचा तैयार करना है. अंतर्राज्यीय परिषद में केंद्र-राज्य तथा अंतर-राज्य संबंधों के सभी लंबित मुद्दों पर विचार किया जाता है. परिषद की एक वर्ष में कम-से-कम तीन बार बैठक हो सकती है.
  • अंतर्राज्यीय परिषद का एक स्थायी समिति भी होता है. स्थायी समिति की स्थापना वर्ष 1996 में परिषद के विचारार्थ मामलों के निरंतर परामर्श और प्रसंस्करण के लिये की गई थी. इसमें केंद्रीय गृह मंत्री अध्यक्ष और पांच केन्द्रीय मंत्री सदस्य होते हैं.
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भारतीय संविधान के 105वें संशोधन अधिनियम को मंजूरी दी गयी

August 23, 2021/by Team EduDose

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 105वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2021 को अपनी स्वीकृति दे दी. यह अधिनियम सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की पहचान उल्लिखित करने के लिए राज्य सरकारों की शक्ति को बहाल करता है. कानून और न्याय मंत्रालय ने इस आशय की अधिसूचना जारी की थी.

भारतीय संविधान का 105वां संशोधन

संसद के दोनों सदनों ने अगस्त 2021 के मानसून सत्र में इससे संबंधित 127वें संविधान संशोधन विधेयक 2021 को सर्वसम्मति से पारित किया था. राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद इस विधेयक ने भारतीय संविधान के 105वें संशोधन अधिनियम का रूप लिया है.

इस अधिनियम राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को अन्य पिछड़े वर्गों की सूची स्वयं बनाने का अधिकार बहाल करने का प्रावधान है. यह विधेयक अनुच्छेद 342A के खंड 1 और 2 में संशोधन करेगा.

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संविधान के रक्षक संत केशवानंद भारती का निधन

September 7, 2020/by Team EduDose

संविधान के मूल ढांचे का सिद्धांत दिलाने वाले संत केशवानंद भारती का 6 सितम्बर को केरल के इडनीर मठ में निधन हो गया. वे 79 साल के थे.

1973 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल’ मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था. इस निर्णय के अनुसार, संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे को बदला नहीं जा सकता. इस निर्णय के कारण केशवानंद भारती को ‘संविधान का रक्षक’ भी कहा जाता है, क्‍योंकि इसी याचिका पर फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्‍यवस्‍था दी कि उसे संविधान के किसी भी संशोधन की समीक्षा का अधिकार है.

संविधान के मूल ढांचे में संशोधन नहीं किया जा सकता

23 मार्च 1973 को केशवानंद भारती मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने संविधान में संशोधन की संसद की शक्तियों पर निर्णय सुनाया था. इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद के पास संविधान के अनुच्‍छेद 368 के तहत संशोधन का अधिकार तो है, लेकिन संविधान के मूल ढांचे में से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती.

कोर्ट ने कहा कि संविधान के हर हिस्‍से में संशोधन हो सकता है, लेकिन उसकी न्‍यायिक समीक्षा होगी ताकि यह तय हो सके कि संविधान का आधार और मूल ढांचा बरकरार है. कोर्ट ने मूल संरचना को परिभाषित नहीं किया. इसने केवल कुछ सिद्धांतों को सूचीबद्ध किया जैसे कि धर्मनिरपेक्षता, संघवाद और लोकतंत्र.

भारती का केस जाने-माने वकील नानी पालकीवाला ने लड़ा था. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी व्‍यवस्‍था दी थी कि न्‍यायपालिका की स्‍वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का हिस्‍सा है, इसलिए उससे छेड़छाड़ नहीं की जा सकती.

अब तक का सबसे बड़ी पीठ ने सुनवाई की थी

यह फैसला शीर्ष अदालत की अब तक सबसे बड़ी पीठ ने दिया था. चीफ जस्टिस एसएम सीकरी और जस्टिस एचआर खन्‍ना की अगुवाई वाली 13 जजों की पीठ ने 7:6 से यह फैसला दिया था. इस मामले की सुनवाई 31 अक्टूबर 1972 को शुरू हुई और 23 मार्च 1973 को सुनवाई पूरी हुई थी.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका का आधार

केशवानंद भारती केरल में कासरगोड़ जिले के इडनीर मठ के उत्‍तराधिकारी थे. केरल सरकार ने भूमि सुधार कानून बनाए थे जिसके जरिए धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन पर नियंत्रण किया जाना था. इस कानून को संविधान की नौंवी सूची में रखा गया था ताकि न्‍यायपालिका उसकी समीक्षा न कर सके. साल 1970 में केशवानंद ने इसी भूमि सुधार कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.

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भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को एक वर्ष का सेवा विस्तार दिया गया

June 30, 2020/by Team EduDose

भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को एक वर्ष का सेवा विस्तार दिया गया है। वेणुगोपाल का मौजूदा तीन साल का कार्यकाल 30 जून 2020 को समाप्त हो रहा था।

केके वेणुगोपाल देश के एक प्रमुख अधिवक्ता हैं, उन्हें 30 जून 2017 को देश के 15वें अटॉर्नी जनरल यानी महान्यायवादी के रूप में नियुक्त किया गया था. पद्मभूषण और पद्मविभूषण से अलंकृत संविधान विशेषज्ञ वेणुगोपाल ने मोरारजी देसाई की सरकार में भी करीब ढाई साल तक अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के रूप में काम किया था.

भारत के महान्ययवादी (Attorney General): एक दृष्टि

  • भारतीय संविधान के अनुछेद 76 के अनुसार भारत के महान्ययवादी (अटॉर्नी जनरल) की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है. उच्चतम न्यायालय का न्यायधीश बनने की योग्यता रखने वाले किसी व्यक्ति को राष्ट्रपति महान्यायवादी के पद पर नियुक्त कर सकते हैं.
  • देश के महान्यायवादी का कर्तव्य कानूनी मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देना और कानूनी प्रकिया की उन जिम्मेदारियों को निभाना है जो राष्ट्रपति की ओर से उनके पास भेजे जाते हैं. इसके अतिरिक्त संविधान और किसी अन्य कानून के अंतर्गत उनका जो काम निर्धारित है, उनका भी पालन उन्हें पूरा करना होता है.
  • अपने कर्तव्य के निर्वहन के दौरान उन्हें देश के किसी भी न्यायालय में उपस्थित होने का अधिकार है. उन्हें संसद की कार्यवाही में भी भाग लेने का अधिकार है, हालांकि उनके पास मतदान का अधिकार नहीं होता. उनके कामकाज में सहायता के लिए सॉलिसिटर जनरल और अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल होते हैं.
  • भारत के लिए पहले महान्ययवादी एमसी सीतलवाड हैं.
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संजय कोठारी ने मुख्य सतर्कता आयुक्त के रूप में शपथ ली

April 25, 2020/by Team EduDose

संजय कोठारी ने 25 अप्रैल को मुख्य सतर्कता आयुक्त (CVC) के रूप में शपथ ली. राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में उन्‍हें पद की शपथ दिलाई. कोठारी का कार्यकाल जून 2021 तक होगा. CVC का पद जून 2019 में केवी चौधरी के सेवानिवृति के बाद से खाली था. कोठारी के नाम की सिफारिश प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता वाली चयन समिति ने की थी.

संजय कोठारी हरियाणा कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के वरिष्‍ठ अधिकारी थे. 2016 में वे डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग के सचिव पद से सेवानिवृत हुए थे. जुलाई 2017 में उन्हें राष्ट्रपति का सचिव बनाया गया था.

केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC)

  • केन्द्रीय सतर्कता आयोग (Central Vigilance Commission) भारत सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों/कर्मचारियों से सम्बन्धित भ्रष्टाचार नियंत्रण की सर्वोच्च संस्था है. यह सांविधिक दर्जा (statutory status) प्राप्त एक बहु-सदस्यीय संस्था है.
  • इस आयोग की स्थापना सन् 1964 में की गयी थी. इसका गठन संथानम समिति की सिफारिश पर की गयी थी, जिसे भ्रष्टाचार रोकने से सम्बन्धित सुझाव देने के लिए गठित किया गया था.
  • संसद ने 2003 में केन्द्रीय सतर्कता आयोग विधेयक पारित किया था. इस विधेयक में आयोग को वैधानिक दर्जा देने वाला कानून (सतर्कता आयोग अधिनियम) बनाया गया था. इस अधिनियम में आयोग के अधिकार एवं कार्य का विस्तार से उल्लेख किया गया है.

केंद्रीय सतर्कता आयोग के आयुक्त

  • केंद्रीय सतर्कता आयोग में एक केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त (Chief Vigilance Commissioner- CVC) जो कि अध्यक्ष होता है तथा दो अन्य सतर्कता आयुक्त होते हैं.
  • इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा एक तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर होती है. इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता व केन्द्रीय गृहमंत्री होते हैं.
  • इनका कार्यकाल 4 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु तक (जो भी पहले हो), तक होता है. अवकाश प्राप्ति के बाद आयोग के ये पदाधिकारी केन्द्र अथवा राज्य सरकार के किसी भी पद के योग्य नहीं होते हैं.
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24 अप्रैल: राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस, संबंधित महत्त्वपूर्ण संवैधानिक तथ्य

April 24, 2020/by Team EduDose

प्रत्येक वर्ष 24 अप्रैल को ‘राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस’ (National Panchayati Raj Day) के रूप में मनाया जाता है. यह दिन देश में ज़मीनी स्‍तर पर सत्‍ता के विकेन्‍द्रीकरण के इतिहास में महत्त्वपूर्ण दिन माना जाता है. इसी दिन भारतीय संविधान के 73वें संशोधन अधिनियम 1992 के जरिए 24 अप्रैल 1993 को पंचायती राज व्‍यवस्‍था लागू हुई थी.

पंचायती राज क्या है?

सिर्फ केंद्र या राज्य सरकार ही पूरे देश को चलाने में सक्षम नहीं हो सकती है. इसके लिए स्थानीय स्तर पर भी प्रशासन की व्यवस्थ की गई है. इसी व्यवस्था को पंचायती राज का नाम दिया गया है.

त्रि-स्तरीय ढांचा

भारत में पंचायती राज त्रि-स्तरीय है. पंचायती राज में गांव के स्तर पर ग्राम सभा, ब्लॉक स्तर पर मंडल परिषद और जिला स्तर पर जिला परिषद होता है. इन संस्थानों के लिए सदस्यों का चुनाव होता है जो जमीनी स्तर पर शासन की बागडोर संभालते हैं.

भारत में पंचायती राज का इतिहास

भारत में प्राचीन काल से ही पंचायती राज व्यवस्था आस्तित्व में रही हैं. आधुनिक भारत में पहली बार तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राजस्थान के नागौर जिले के बगदरी गाँव में 2 अक्टूबर 1959 को पंचायती राज व्यवस्था लागू की थी. 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत साल 2010 से हुई थी.

पंचायती राज से संबंधित संवैधानिक तथ्य

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में राज्यों को पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया हैं.
  • भारतीय संविधान के 73वें संशोधन विधेयक से देश में पंचायती राज संस्था को संवैधानिक मान्यता दी गयी है.
  • भारतीय संसद ने 1992 में इस संशोधन विधेयक को पारित किया था. यह संशोधन विधेयक 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ था.
  • 73वें संशोधन के द्वारा संविधान के अनुच्छेद 243 में पंचायतों की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है. इस संशोधन के द्वारा संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गयी, इसमें पंचायत के 29 विषयों को शामिल किया गया है.
  • 73वें संशोधन में एक त्रि-स्तरीय ढांचे की स्थापना (ग्राम पंचायत, पंचायत समिति तथा जिला पंचायत) का प्रावधन किया गया है.

पंचायती राज संस्था अवधारणा के लिए गठित मुख्य समिति और सिफारिशें

  1. बलवंत राय मेहता समिति की सिफारिशें (1957)
  2. अशोक मेहता समिति की सिफारिशें (1977)
  3. पीवीके राव समिति (1985)
  4. डॉ एलऍम सिन्घवी समिति (1986)
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