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ISRO का मिशन PSLV-C62 असफल रहा

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने वर्ष 2026 के पहले मिशन PSLV-C62 को 12 जनवरी 2026 को लॉन्च किया था.

यह PSLV की 62वीं उड़ान थी जिसके के तीसरे चरण (PS3) के अंत में तकनीकी खराबी के कारण यह मिशन सफल नहीं रहा. यह प्रक्षेपण सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC), श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) से किया गया था.

मुख्य बिन्दु

  • यह PSLV रॉकेट की लगातार दूसरी विफलता है. इससे पहले मई 2025 में PSLV-C61 मिशन भी तीसरे चरण की समस्या के कारण असफल रहा था.
  • इस मिशन में प्राथमिक उपग्रह ‘EOS-N1’ (Earth Observation Satellite-N1) के साथ 15 अन्य उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षाओं में स्थापित किया जाना था.
  • EOS-N1 को ‘अन्वेषा’ (Anvesha) के नाम से भी जाना जाता है. ‘अन्वेषा’ DRDO द्वारा विकसित एक महत्वपूर्ण निगरानी उपग्रह था, जिसे सीमाओं पर नज़र रखने और दुश्मन के ठिकानों की पहचान करने के लिए डिज़ाइन किया गया था.
  • EOS-N1 को सूर्य-तुल्यकालिक ध्रुवीय कक्षा (SSPO) में लगभग 500-550 किमी की ऊंचाई पर स्थापित किया जाना था.

PSLV-C62 मिशन की असफलता: मुख्य कारण

  • इसरो के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, PSLV-C62 मिशन की असफलता रॉकेट के तीसरे चरण (PS3) के अंत में तकनीकी खराबी से आई.
  • तीसरे चरण के दहन (Combustion) के दौरान चैंबर प्रेशर में अचानक गिरावट आई, जिससे रॉकेट अपने निर्धारित पथ (Trajectory) से भटक गया.

16 उपग्रह निर्धारित कक्षा में स्थापित नहीं हो सके

  • प्राथमिक उपग्रह EOS-N1 (अन्वेषा) और इसके साथ भेजे गए 15 अन्य छोटे उपग्रह (कुल 16 सैटेलाइट) अपनी निर्धारित कक्षा (Orbit) में स्थापित नहीं हो सके और उन्हें खो दिया गया है.

इसरो ने LVM3-M6 के जरिए अमेरिकी उपग्रह BlueBird Block-2 प्रक्षेपित किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अमेरिका के BlueBird Block-2 उपग्रह (सैटेलाइट) को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर इतिहास रच दिया है. यह प्रक्षेपण 24 दिसंबर 2025 को अपने सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3-M6 के जरिए किया गया था.

इस मिशन के मुख्य बिन्दु

  • यह अब तक का सबसे भारी उपग्रह है जिसे भारत से प्रक्षेपित किया गया है. इस उपग्रह का वजन लगभग 6,100 किलोग्राम है.
  • इस उपग्रह का मुख्य उद्देश्य, बिना किसी विशेष हार्डवेयर या डिश के अंतरिक्ष से सीधे सामान्य स्मार्टफोन पर 4G और 5G हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी देना है.
  • यह LVM3 की छठी परिचालन उड़ान थी. इसने उपग्रह को पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit – LEO) में लगभग 520 किमी की ऊंचाई पर सटीक रूप से स्थापित किया.
  • BlueBird Block-2 में लगभग 223 वर्ग मीटर का एक विशाल ‘फेज्ड एरे’ (phased array) एंटीना है, जो इसे LEO में अब तक का सबसे बड़ा कमर्शियल कम्युनिकेशन सैटेलाइट बनाता है.
  • यह मिशन भारत के NewSpace India Limited (NSIL) और अमेरिकी कंपनी के बीच एक पूर्ण वाणिज्यिक समझौते के तहत हुआ.

LVM3 रॉकेट: एक दृष्टि

  • LVM3 का पूरा नाम Launch Vehicle Mark-3 है. इसे पहले GSLV Mk-III के नाम से जाना जाता था. यह इसरो का सबसे शक्तिशाली और भारी रॉकेट है.
  • इसे अक्सर ‘भारत का बाहुबली’ भी कहा जाता है क्योंकि यह भारी उपग्रहों को अंतरिक्ष में ले जाने में सक्षम है.
  • LVM3 एक तीन चरणों वाला (3-Stage) भारी प्रक्षेपण रॉकेट है. इसकी ऊंचाई लगभग 43.5 मीटर, कुल वजन 640 टन के करीब है. इसकी क्षमता लगभग 8 टन LEO (Low Earth Orbit) के लिए और 4 टन GTO (Geostationary Transfer Orbit) है.

रॉकेट की तीन-स्तरीय संरचना

  1. पहला चरण (S200- Solid Boosters): रॉकेट के दोनों तरफ दो बड़े ठोस स्ट्रैप-ऑन मोटर्स होते हैं. ये शुरुआती उड़ान के लिए जबरदस्त ‘थ्रस्ट’ प्रदान करते हैं.
  2. दूसरा चरण (L110- Liquid Core): यह बीच का हिस्सा है जिसमें दो Vikas Engines लगे होते हैं. इसमें तरल ईंधन (UDMH और N2O4) का उपयोग किया जाता है.
  3. तीसरा चरण (C25- Cryogenic Stage): यह सबसे ऊपरी और महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसमें स्वदेशी CE-20 क्रायोजेनिक इंजन लगा है जो तरल हाइड्रोजन और तरल ऑक्सीजन का उपयोग करता है.

BlueBird Block-2 उपग्रह: एक दृष्टि

  • BlueBird Block-2, उपग्रहों की एक ऐसी श्रृंखला है जो दूरसंचार की दुनिया में क्रांति लाने के लिए डिज़ाइन की गई है. इसे अमेरिकी कंपनी AST SpaceMobile ने विकसित किया है.
  • इसका मुख्य उद्देश्य ‘Space-based Cellular Broadband’ प्रदान करना है. आमतौर पर सैटेलाइट फोन के लिए विशेष उपकरणों की जरूरत होती है, लेकिन BlueBird तकनीक के जरिए आपका साधारण स्मार्टफोन (4G/5G) सीधे अंतरिक्ष से सिग्नल प्राप्त कर सकेगा.
  • यह उन ग्रामीण, पहाड़ी या समुद्री इलाकों में इंटरनेट और कॉलिंग की सुविधा देगा जहाँ मोबाइल टॉवर लगाना संभव नहीं है.

भारत के सबसे भारी संचार उपग्रह ‘CMS-03’ का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने 2 नवंबर को भारत के सबसे भारी संचार उपग्रह ‘CMS-03’ का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया. यह प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से इसरो के सबसे शक्तिशाली रॉकेट LVM3-M5 के माध्यम से किया गया.

इसरो ने इस उपग्रह को सफलतापूर्वक अलग कर भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट) में स्थापित किया.

उपग्रह CMS-03 का विवरण

  • उपग्रह CMS-03 का वजन लगभग 4,410 किलोग्राम है. यह भारतीय धरती से भू-समकालिक स्थानांतरण कक्षा (GTO) में प्रक्षेपित होने वाला सबसे भारी उपग्रह है.
  • यह एक मल्टी-बैंड संचार उपग्रह है, जिसे जीसैट-7आर (GSAT-7R) के नाम से भी जाना जाता है.
  • इसे मुख्य रूप से भारतीय नौसेना की संचार क्षमताओं को मजबूत करने के लिए डिजाइन किया गया है. यह हिंद महासागर क्षेत्र में नौसेना के जहाजों, पनडुब्बियों और विमानों के बीच सुरक्षित और निर्बाध संचार स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
  • यह उपग्रह सी, एक्सटेंडेड-सी और केयू-बैंड में सेवाएं प्रदान करेगा, जिससे नौसेना की नेटवर्क-केंद्रित युद्ध क्षमताओं में उल्लेखनीय वृद्धि होगी.
  • सीएमएस-03 को लगभग 15 वर्षों तक सेवाएं प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है.

रॉकेट LVM3-M5

  • उपग्रह CMS-03 का प्रक्षेपण स्वदेशी प्रक्षेपण यान LVM3-M5 (लॉन्च व्हीकल मार्क-3) के माध्यम से किया गया. यह इसरो का सबसे शक्तिशाली रॉकेट है.
  • LVM3-M5 को इसकी विशाल भार उठाने की क्षमता के कारण लोकप्रिय रूप से ‘बाहुबली’ (Baahubali) उपनाम दिया गया है.
  • LVM3-M5 की ऊँचाई 43.5 मीटर और वजन लगभग 642 टन है. यह तीन-चरण वाला रॉकेट है:
  1. S200: दो सॉलिड रॉकेट बूस्टर (पहले चरण में)
  2. L110: एक लिक्विड प्रोपेलेंट कोर स्टेज (दूसरा चरण)
  3. C25: एक क्रायोजेनिक अपर स्टेज (अंतिम और सबसे शक्तिशाली चरण)

भारत के ऐतिहासिक चंद्रयान-3 मिशन को इसी LVM3 रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया था. LVM3 को ही भारत के पहले मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन (गगनयान) के लिए चुना गया है.

ISRO ने SSLV तकनीक HAL को हस्तांतरित करने के लिए समझौता किया

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV) तकनीक हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को हस्तांतरित करने के लिए 10 सितंबर 2025 को एक समझौता किया है.

  • यह समझौता भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO), न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL), भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) के बीच हुआ है.
  • इस समझौते के तहत, HAL को SSLV की संपूर्ण तकनीक का लाइसेंस मिलेगा.
  • HAL अगले दो वर्षों में ISRO की मदद से प्रशिक्षण प्राप्त करेगा और उसके बाद 10 वर्षों तक SSLV का बड़े पैमाने पर उत्पादन करेगा.
  • इस समझौते से भारत के आत्मनिर्भर अंतरिक्ष पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूती मिलेगी. इससे भारत छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण सेवा बाजार में विश्वसनीय और लागत-प्रतिस्पर्धी प्रदाता के रूप में उभरेगा.
  • इसका उद्देश्य छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण के वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना है.

लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV)  क्या है?

  • लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV),  इसरो द्वारा विकसित, तीन-चरणीय रॉकेट है जिसे 500 किलोग्राम से कम वजन वाले उपग्रहों को पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) में प्रक्षेपित करने के लिए डिजाइन किया गया है.
  • SSLV को एक त्वरित, प्रक्षेपण यान के रूप में डिज़ाइन किया गया है जिसका औद्योगिक उत्पादन के लिए विस्तार किया जा सकता है.

न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL)

  • न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की वाणिज्यिक शाखा है, जो भारत सरकार की एक पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है. यह कंपनी अंतरिक्ष विभाग (DoS) के प्रशासनिक नियंत्रण में है.
  • इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय उद्योगों को उच्च-प्रौद्योगिकी अंतरिक्ष गतिविधियों में शामिल करना, अंतरिक्ष कार्यक्रमों के उत्पादों और सेवाओं को बढ़ावा देना तथा उनका व्यावसायिक रूप से लाभ उठाना है.

भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe)

  • भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन एवं प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित एक स्वतंत्र एजेंसी है, जिसका पर्यवेक्षण अंतरिक्ष विभाग (DoS) द्वारा किया जाता है.
  • इसकी प्राथमिक भूमिका भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और भारत में निजी अंतरिक्ष संस्थाओं के बीच एक सेतु का काम करना है.

इसरो ने पृथ्वी अवलोकन उपग्रह ‘निसार’ सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 30 जुलाई को ‘निसार’ उपग्रह का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया.
  • यह प्रक्षेपण 30 जुलाई को श्री हरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्‍द्र से GSLV-F16 रॉकेट के माध्यम से किया गया.
  • प्रक्षेपण में निसार उपग्रह को 747 किलोमीटर लंबी सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षा (Sun-synchronous orbit या SSO) में स्थापित किया गया. सूर्य-समकालिक ध्रुवीय कक्षा में उपग्रह सूर्य के सापेक्ष एक ही स्थिति में रहता है.

निसार उपग्रह (NISAR Satellite)

  • निसार (NISAR) का पूरा नाम नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar Mission) है. यह एक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह है. 2,393 किलोग्राम वजनी निसार मिशन का जीवनकाल पांच वर्ष है.
  • इसरो और नासा की संयुक्त पहल
  • निसार उपग्रह, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा (NASA) का संयुक्त उपग्रह मिशन है.
  • दोनों अंतरिक्ष एजेंसियों का यह पहल संयुक्त मिशन है जिसे संयुक्त रूप से विकसित किया है. इस मिशन की अनुमानित लागत 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 1.31 खरब रुपये) है.
  • यह दुनिया का पहला द्वि-आवृत्ति सिंथेटिक अपर्चर रडार उपग्रह है. इसमें एल-बैंड और एस-बैंड, दोनों सिंथेटिक अपर्चर रडार लगे हुए हैं. एल-बैंड, नासा का और एस-बैंड, इसरो का है.

निसार उपग्रह की उपयोगिता

  • निसार सभी मौसम में दिन और रात काम करने वाला उपग्रह है, जो 12 दिनों के अंतराल में पूरी पृथ्वी को अवलोकन करेगा.
  • यह उपग्रह धरती की भूमि और बर्फ का 3D दृश्य उपलब्ध कराएगा. उपग्रह से प्राप्त डेटा भूकंप और भूस्खलन संभावित क्षेत्रों पर लगातार नजर रखने में मदद करेगा.
  • हिमालय और अंटार्कटिका जैसे क्षेत्रों में वनों में होने वाले बदलाव, पर्वतों की स्थिति या स्थान में बदलाव और हिमनद की गतिविधियों सहित मौसमी परिवर्तनों का अध्ययन किया जा सकेगा.
  • निसार चक्रवात और बाढ़ जैसी आपदाओं के सटीक प्रबंधन में सहायता करेगा.

GSLV-F16

  • निसार उपग्रह को GSLV-F16 MK-II प्रक्षेपण यान (रॉकेट) के माध्यम से प्रक्षेपित किया गया था. इस रॉकेट की लंबाई 51.7 मीटर है. इसे इसरो ने विकसित किया है.
  • GSLV का पूरा नाम भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (Geosynchronous Satellite Launch Vehicle) है. GSLV-F16 MK-II रॉकेट भारी उपग्रहों को भू-स्थिर कक्षाओं में स्थापित करने में सक्षम है.

शुभांशु शुक्ला अन्‍तर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्‍टेशन पर पहुंचने वाले पहले भारतीय बने

भारत की अंतरिक्ष यात्रा में 26 जून को ऐतिहासिक क्षण जुड गया, जब भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला अन्‍तर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुंचने वाले पहले भारतीय बनने का गौरव प्राप्त किया.

एक्सिओम-4 (Axiom-4) मिशन

  • भारत के शुभांशु शुक्ला और तीन अन्य अंतरिक्ष यात्रियों को अन्‍तर्राष्‍ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) भेजेने के लिए एक्सिओम-4 मिशन लॉन्च किया गया था.
  • इस मिशन के माध्यम से अमरीका, भारत, पोलैंड और हंगरी के चार लोगों को वैज्ञानिक प्रयोगों और अनुसंधान के लिए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केन्द्र में भेजा गया है.
  • एक्सिओम-4 मिशन को 25 जून को अमरीका में फ्लोरिडा के कैनेडी अंतरिक्ष केन्द्र से प्रक्षेपित किया गया था. 28 घंटे की यात्रा के बाद यह मिशन 26 जून को अंतरराष्‍ट्रीय अंतरिक्ष केन्‍द्र पहुंचा.
  • एक्सियम-4 मिशन में भारत के शुभांशु शुक्‍ला, पोलैंड के स्‍लावोस उजानान्‍स्‍की, हंगरी के तिबोर कापू और अमरीका के पेगी ह्विस्‍टन शामिल हैं. शुभांशु शुक्ला इस मिशन के चालक हैं. पेगी ह्विस्‍टन नासा के पूर्व अंतरिक्ष यात्री हैं जो मिशन कमांडर हैं.
  • एक्सिओम मिशन अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और भारत की इसरो की एक संयुक्त पहल है. इस मिशन को निजी अमेरिकी कंपनी एक्सिओम स्पेस इंक द्वारा प्रक्षेपित किया गया है.
  • ये अंतरिक्ष यात्री 14 दिनों तक अंतरराष्‍ट्रीय अंतरिक्ष केन्‍द्र पर रहेंगे और पृथ्‍वी की निचली कक्षा में कई प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोग तथा अनुसंधान करेंगे. इनमें, सूक्ष्‍म गुरुत्‍व से संबंधित शोध, प्रौद्योगिकी से संबंधित प्रदर्शन और अन्य प्रयोग शामिल हैं.

स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्षयान

  • चारों अन्तरिक्ष यात्री, स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्षयान (क्रू ड्रैगन) में सवार हो कर फाल्कन 9 रॉकेट के द्वारा अन्तरिक्ष में प्रक्षेपित किया गया. इस अंतरिक्षयान को 26 जून को अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से डॉक यानि जोडा गया.
  • स्पेसएक्स ड्रैगन अंतरिक्षयान जिसे ड्रैगन कैप्सूल भी कहा जाता है, एक पुनः प्रयोज्य अंतरिक्ष यान है जिसे स्पेसएक्स द्वारा विकसित किया गया है.
  • यह अंतरिक्ष यात्रियों और कार्गो को पृथ्वी से अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) तक ले जाने और वापस लाने के लिए डिज़ाइन किया गया है.
  • यह पहला निजी अंतरिक्ष यान है जिसने इंसानों को आईएसएस तक पहुंचाया है. स्पेसएक्स कंपनी के मालिक अमेरिकी उद्योगपति एलोन मस्क हैं.

अंतरराष्‍ट्रीय अंतरिक्ष केन्‍द्र पहुंचने वाले पहले भारतीय

  • ग्रुप कैप्‍टन शुभांशु शुक्‍ला अंतरराष्‍ट्रीय अंतरिक्ष केन्‍द्र (ISS) पहुंचने के साथ ही इस केन्‍द्र में पहुंचने वाले पहले भारतीय बन गए हैं.
  • राकेश शर्मा के बाद शुभांशु शुक्‍ला अंतरिक्ष में जाने वाले दूसरे भारतीय बन गए हैं. राकेश शर्मा 1984 में सोवियत संघ के इंटरकोस्मोस कार्यक्रम के तहत सोयुज टी-11 यान से अंतरिक्ष गए थे.

शुभांशु शुक्ला

शुभांशु शुक्ला भारतीय वायुसेना के ग्रुप कैप्टन के पद पर है. वह भारत के गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए चयनित अंतरिक्ष यात्री भी हैं.

अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन क्या है?

  • अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन (ISS) बाहरी अन्तरिक्ष में पृथ्वी की परिक्रमा करने वाला मानव निर्मित उपग्रह है. इसे अनुसंधान और शोध के लिए बनाया गया है. इसे पृथ्वी की निकटवर्ती कक्षा में स्थापित किया गया है.
  • ISS विश्व की कई स्पेस एजेंसियों का संयुक्त उपक्रम है. इसे बनाने में संयुक्त राज्य अमेरिका की नासा के साथ रूस की रशियन फेडरल स्पेस एजेंसी (RKA), जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी (JAXA), कनाडा की कनेडियन स्पेस एजेंसी (CSA) और यूरोपीय देशों की संयुक्त यूरोपीयन स्पेस एजेंसी (ESA) काम कर रही हैं.
  • यह 109 मीटर लंबा और 51 मीटर चौड़ा है. यह पृथ्वी से 370-460 किमी की ऊँचाई (पृथ्‍वी की निचली कक्षा में) पर पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है. यह हर 90 मिनट में पृथ्वी का एक चक्कर लगाता है. इसकी गति 28,000 किमी/घंटा है.

इसरो का पीएसएलवी-सी61 मिशन तकनीकी कारणों से असफल रहा

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का PSLV-C61 मिशन तकनीकी कारणों से सफल नहीं हो सका.
  • इसरो ने 18 मई को PSLV-C61 रॉकेट के माध्यम से पृथ्वी अवलोकन उपग्रह (सैटेलाइट) ‘EOS-09’ को प्रक्षेपित किया था.
  • यह प्रक्षेपण आंध्र प्रदेश के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा से किया गया था. PSLV-C61 रॉकेट में खराबी आने के कारण यह प्रक्षेपण विफल रहा. यह PSLV रॉकेट का 63वां मिशन था.
  • इस मिशन का उद्देश्य EOS-09 को सूर्य समकालिक ध्रुवीय कक्षा में स्थापित करना था. इस उपग्रह से कृषि, वानिकी निगरानी, आपदा प्रबंधन, शहरी नियोजन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनुप्रयोगों के लिए महत्वपूर्ण साबित होती.
  • इसरो के अनुसार शुरूआती दो चरणों में सब कुछ सामान्य था. रॉकेट के तीसरे चरण में ठोस ईंधन से चलने वाला मोटर चालू तो हुआ, लेकिन उसके दबाव में गिरावट आ गई. इसी कारण मिशन को पूरा नहीं किया जा सका.

पीएसएलवी रॉकेट के चरण कैसे काम करते हैं?

पीएसएलवी (Polar Satellite Launch Vehicle) एक चार-चरणीय रॉकेट होता है:

  1. पहला और तीसरा चरण – ठोस ईंधन से चलते हैं
  2. दूसरा और चौथा चरण – तरल ईंधन से चलते हैं
  3. तीसरा चरण सैटेलाइट को ऊपरी वायुमंडल में सही कक्षा की दिशा में ले जाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है. इसी चरण में गड़बड़ी आई और उपग्रह तय कक्षा तक नहीं पहुंच पाया.

विफलता की जांच

इसरो ने ‘EOS-09 को इच्छित कक्षा में स्थापित करने में PSLV रॉकेट की विफलता की जांच शुरू कर दी है. इस घटना की जांच के लिए समिति गठित की गई है.

इसरो ने उपग्रह प्रक्षेपण से 14.30 करोड डॉलर के विदेशी राजस्‍व का सजृन किया

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने उपग्रह प्रक्षेपण के माध्यम से लगभग 14.30 करोड अमरीकी डॉलर के विदेशी राजस्‍व का सजृन किया है.
  • पिछले दस वर्षों के दौरान इसरो ने कुल 393 विदेशी और 3 भारतीय उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है. इसरो ने अमरीका, ब्रिटेन, सिंगापुर और अनेक विकसित देशों सहित 34 देशों के उपग्रह प्रक्षेपित किए हैं.
  • जनवरी 2015 और दिसम्‍बर 2024 के बीच यह सभी उपग्रह इसरो के पीएसएलवी, एलवीएम-3 और एसएसएलवी प्रक्षेपण वाहनों से इन उपग्रहों का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया गया.

इसरो के SpaDeX मिशन ने ऐतिहासिक डॉकिंग सफलता हासिल की

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SpaDeX) मिशन ने 16 जनवरी 2025 को ऐतिहासिक डॉकिंग सफलता हासिल की. डॉकिंग के बाद एक ही अंतरिक्षयान के रूप में दो उपग्रहों का नियंत्रण सफल रहा.

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 30 दिसंबर 2024 को स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SpaDeX) मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च किया था.
  • SpaDeX मिशन को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लांच किया गया. इसे PSLV-C60 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया किया गया था.
  • इस मिशन के तहत PSLV-C60 के जरिए दो छोटे अंतरिक्ष यान ‘चेजर’ (SDX01) और ‘टारगेट’ (SDX02) भेजे गए थे. इनमें से प्रत्येक का वजन 220 किलोग्राम है.
  • प्रक्षेपण के कुछ ही मिनटों बाद दोनों अंतरिक्ष यान, रॉकेट से सफलतापूर्वक अलग होकर करीब 470 किलोमीटर की निचली कक्षा में स्थापित हुए थे.
  • इसरो ने 16 जनवरी 2025 को पहली बार अंतरिक्ष में दोनों उपग्रह ‘चेजर’ और ‘टारगेट’  की सफल डॉकिंग कराकर ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की. इसरो आने वाले दिनों में अनडॉकिंग और पावर ट्रांसफर की जांच करेगा.
  • लगातार तीन वर्ष से इसरो एक के बाद एक इतिहास रच रहा है. भारत ने 2023 में चंद्रयान मिशन में कामयाबी के साथ ही चंद्रमा की सतह पर अपने लैंडर उतारने वाला अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथा देश बना. 2024 में आदित्य एल1 मिशन में सफलता हासिल की थी.

SpaDeX (स्पैडेक्स) डाकिंग क्या है?

  • SpaDeX का अर्थ होता है ‘स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट’ यानी अंतरिक्ष में यानों को ‘डॉक’ और ‘अनडॉक’ करना.
  • बिना किसी बाहरी सहायता के एक अंतरिक्षयान से दूसरे अंतरिक्षयान के जुड़ने को डाकिंग, जबकि अंतरिक्ष में एक दूसरे से जुड़े दो अंतरिक्ष यानों के अलग होने को अनडाकिंग कहते हैं.
  • अंतरिक्ष में देश के महत्वाकांक्षी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए डॉकिंग क्षमता बेहद जरूरी है. इन लक्ष्यों में चंद्रमा से नमूने लाना, भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (बीएसएस) का निर्माण शामिल है.

‘इन-स्पेस डॉकिंग’ तकनीक के उपयोग

  • ‘इन-स्पेस डॉकिंग’ तकनीक की जरूरत उस समय होती है, जब एक कॉमन मिशन को अंजाम देने के लिए कई अंतरिक्षयानों को लॉन्च करने की जरूरत पड़ती है.
  • यह चंद्रयान-4 जैसे मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए भी अहम साबित होगा. साथ ही वहां से सैंपल लाने के साथ-साथ 2035 तक भारत के अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने जैसी योजनाओं के लिए बेहद अहम साबित होगा.

भारत दुनिया का चौथा देश बना

  • इस सफलता के साथ ही भारत दुनिया का चौथा देश बन गया जिसके पास अपनी स्पेस डॉकिंग जटिल तकनीक है. इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन ही ऐसा करने में सफल रहे हैं.
  • 1966 में जेमिनी आठ अंतरिक्षयान और एजेना टार्गेट व्हीकल की डॉकिंग प्रक्रिया पूरी कर अमेरिका डॉकिंग क्षमता को प्रदर्शित करने वाला दुनिया का पहला देश बना था.
  • तत्कालीन सोवियत संघ ने 1967 में कोसमोस 186 और कोसमोस 188 अंतरिक्ष यान को डॉक कर स्वचालित डॉकिंग का प्रदर्शन किया था.
  • चीन ने पहली बार 2011 में डॉकिेग क्षमता का प्रदर्शन किया, जब मानव रहित शेनझोउ-8 अंतरिक्षयान तियांगोंग-1 अंतरिक्ष लैब के साथ डाक किया गया था.

इसरो ने स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SpaDeX) मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 30 दिसंबर 2024 को स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट (SpaDeX) मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च किया था.
  • SpaDeX मिशन को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लांच किया गया. इसे PSLV-C60 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया किया गया.
  • इस मिशन के तहत PSLV-C60 के जरिए दो छोटे अंतरिक्ष यान चेजर (SDX01) और टारगेट (SDX02) भेजे गए हैं. इनमें से प्रत्येक का वजन 220 किलोग्राम है.
  • प्रक्षेपण के कुछ ही मिनटों बाद दोनों अंतरिक्ष यान, रॉकेट से सफलतापूर्वक अलग होकर करीब 470 किलोमीटर की निचली कक्षा में स्थापित हो चुके हैं.
  • आने वाले दिनों में इसरो के वैज्ञानिक दोनों यानों की बीच की दूरी कम कर उन्हें डॉक करने यानी जोड़ने की कोशिश करेंगे.

SpaDeX (स्पैडेक्स) क्या है?

  • SpaDeX का अर्थ होता है ‘स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट’ यानी अंतरिक्ष में यानों को ‘डॉक’ और ‘अनडॉक’ करना.
  • बिना किसी बाहरी सहायता के एक अंतरिक्षयान से दूसरे अंतरिक्षयान के जुड़ने को डाकिंग, जबकि अंतरिक्ष में एक दूसरे से जुड़े दो अंतरिक्ष यानों के अलग होने को अनडाकिंग कहते हैं.
  • डॉकिंग तकनीक के जरिए इसरो अंतरिक्ष में दो स्पेसक्राफ्ट को आपस में जोड़ेगा. अंतरिक्ष में ये काम अब तक रूस, अमेरिका और चीन ही कर पाए हैं.

‘इन-स्पेस डॉकिंग’ तकनीक के उपयोग

  • ‘इन-स्पेस डॉकिंग’ तकनीक की जरूरत उस समय होती है, जब एक कॉमन मिशन को अंजाम देने के लिए कई अंतरिक्षयानों को लॉन्च करने की जरूरत पड़ती है.
  • यह चंद्रयान-4 जैसे मानव अंतरिक्ष मिशन के लिए भी अहम साबित होगा. साथ ही वहां से सैंपल लाने के साथ-साथ 2035 तक भारत के अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने जैसी योजनाओं के लिए बेहद अहम साबित होगा.

भारत दुनिया का चौथा देश बना

  • इस सफलता के साथ ही भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बन जाएगा, जिसके पास अपनी स्पेस डॉकिंग जटिल तकनीक है. इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन ही ऐसा करने में सफल रहे हैं.
  • संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सबसे पहले 1960 के दशक में दो अंतरिक्ष यान को सफलतापूर्वक डॉक किया था, जिसने अपोलो प्रोग्राम के जरिए मून मिशनों के लिए मार्ग प्रशस्त किया.

इसरो के GSAT-N2 उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया

  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के GSAT-N2 सैटेलाइट (कृत्रिम उपग्रह) को 19 नवंबर 2024 को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया.
  • यह प्रक्षेपण अमेरिका में फ्लोरिडा के केप कैनावेरल से ‘फाल्कन 9′ रॉकेट (अंतरिक्ष यान) के माध्यम से किया गया. यह रॉकेट एलन मस्क के स्वामित्व वाली स्पेसएक्स का है.
  • GSAT-N2 एक संचार उपग्रह है. इसे GSAT-20 भी कहा जाता है. इसका विकास इसरो के सैटेलाइट सेंटर तथा लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर ने किया है.
  • 4700 किलोग्राम वजनी GSAT-N2 को भूस्थिर कक्षा (35,786 किलोमीटर की ऊँचाई पर) में प्रक्षेपित किया गया है. इसका जीवन काल 14 वर्ष है.
  • इसका उद्देश्य भारत की बढ़ती कनेक्टिविटी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है.

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने चंद्रयान-4 मिशन और वीनस ऑर्बिटर मिशन को स्‍वीकृति दी

केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने 18 सितम्बर को चंद्रयान-4 मिशन को स्‍वीकृति दी. मंत्रिमंडल ने वीनस ऑर्बिटर मिशन और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS) की स्थापना को भी मंजूरी दी. दोनों मिशन को साल 2028 तक लॉन्च करने का प्लान बनाया गया है.

चंद्रयान-4 मिशन:

  • चंद्रयान-4 मिशन का उद्देश्य स्पेसक्राफ्ट को चंद्रमा पर उतारना, वहाँ की सतह से मिट्टी और अन्य नमूने को एकत्र करना और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है. इस मिशन पर 2104 करोड़ रुपए का खर्च आएगा.
  • हैवी-लिफ्टर LVM-3 और ISRO का रिलायबल वर्कहॉर्स PSLV अलग-अलग पेलोड लेकर जाएंगे.
  • केवल तीन देश-संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन-चंद्रमा की मिट्टी को पृथ्वी पर वापस लाने में सफल रहे हैं.

वीनस ऑर्बिटर मिशन (VOM):

  • VOM पर 1,236 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है. इसे मार्च 2028 में लॉन्च किया जाना है. VOM का मुख्य उद्देश्य शुक्र की सतह और वायुमंडल के साथ-साथ शुक्र के वायुमंडल पर सूर्य के प्रभाव के बारे में हमारी समझ को बढ़ाना है.
  • वीनस पृथ्वी का सबसे करीबी ग्रह है. शुक्र के पास ऐसी कई सारी जानकारी हैं जो हमें पृथ्वी और एक्सोप्लैनेट को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकती हैं.

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS):

  • मंत्रिमंडल ने रिवाइज्ड गगनयान प्रोग्राम को मंजूरी दी है. इसके तहत गगनयान मिशन का दायरा बढ़ाकर भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS-1) के पहले मॉड्यूल का विकास किया जाएगा. इस मिशन में BAS-1 यूनिट सहित आठ मिशन शामिल हैं. इसे दिसंबर 2028 तक पूरा किया जाना है.
  • गगनयान मिशन पर रखे गए बजट को 11,170 करोड़ रुपए बढ़ाकर 20,193 करोड़ रुपए कर दिया गया है.
  • गगनयान मिशन  में 3 गगनयात्री को 400 KM ऊपर पृथ्वी की कक्षा में भेजा जाएगा. इसके बाद क्रू मॉड्यूल को सुरक्षित रूप से समुद्र में लैंड कराया जाएगा.
  • भारत अपने मिशन में कामयाब रहा तो वो ऐसा करने वाला चौथा देश बन जाएगा. इसे पहले अमेरिका, चीन और रूस ऐसा कर चुके हैं.
  • 12 अप्रैल 1961 को सोवियत रूस के यूरी गागरिन 108 मिनट तक स्पेस में रहे. 5 मई 1961 को अमेरिका के एलन शेफर्ड 15 मिनट स्पेस में रहे. 15 अक्टूबर 2003 को चीन के यांग लिवेड 21 घंटे स्पेस में रहे.