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कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की वैश्विक पहल ‘फर्स्ट मूवर्स कोलिशन’ में शामिल हुआ भारत


भारत कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की वैश्विक पहल ‘फर्स्ट मूवर्स कोलिशन’ (First Movers Coalition) में शामिल हुआ है. यह पहल अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाईडेन और विश्व आर्थिक फोरम (WEF) द्वारा COP26 में शुरू की गई थी.

फर्स्ट मूवर्स कोलिशन: मुख्य बिंदु

  • इस पहल का उद्देश्य भारी उद्योगों और लंबी दूरी वाले परिवहन क्षेत्रों में कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना है. इस पहल के लक्षित क्षेत्रों में एल्यूमीनियम, विमानन, रसायन, कंक्रीट, शिपिंग, स्टील और ट्रकिंग शामिल हैं.
  • वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन में भारी उद्योगों और लंबी दूरी के परिवहन क्षेत्रों की भागीदारी 30 प्रतिशत है. इन क्षेत्रों में उत्सर्जन मध्य शताब्दी तक लगभग 50% तक बढ़ जाने की उम्मीद है.
  • भारत के अलावा, डेनमार्क, इटली, जापान, नॉर्वे, सिंगापुर, स्वीडन और यूके इस गठबंधन में शामिल हुए हैं.

अमरीका ने समृद्धि के लिए हिंद-प्रशांत आर्थिक रूपरेखा का शुभारम्‍भ किया

अमरीका के राष्‍ट्रपति जो बाइडेन ने समृद्धि के लिए हिंद-प्रशांत आर्थिक रूपरेखा (IPEF) का शुभारम्‍भ किया है. इसका शुभारम्भ क्वाड शिखर सम्मेलन 2022 के दौरान 24 मई को किया गया. यह सम्मेलन जापान के तोक्यो में आयोजित किया गया था.

मुख्य बिंदु

  • आरम्भ में इस आर्थिक रूपरेखा में अमरीका के अलावा 12 अन्‍य देश – भारत, ऑस्‍ट्रेलिया, जापान, ब्रनेई, इंडोनेशिया, कोरिया, मलेशिया, न्‍यूजीलैंड, फिलीपिंस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं. ये देश विश्‍व के सकल घरेलू उत्पाद के चालीस प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं.
  • IPEF का उद्देश्‍य हिंद-प्रशांत क्षेत्र (Indo Pacific Region) में आने वाले दशकों में प्रौद्योगिकी नवाचार और वैश्विक अर्थव्यवस्था के संबंधों को मजबूत करना और इस क्षेत्र में चीन के आक्रामक विस्तार का मुकाबला करना है.
  • भारत के दक्षिण में समुद्री क्षेत्र से लेकर ऑस्ट्रेलिया से आगे तक का विशाल जलक्षेत्र बिजनस और अर्थव्यवस्था के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है. इसे ही हिंद-प्रशांत क्षेत्र कहते हैं.
  • यह सीधे तौर पर अमेरिका की पहल है. IPEF में 12 देश अमेरिका के साथ जिनमें 7 आसियान देश हैं, लेकिन कंबोडिया, लाओस जैसे देश इससे दूर रहे जिन्हें चीन का करीबी माना जाता है. अमेरिका ने फिलहाल ताइवान को IPEF से दूर रखा है.
  • IPEF के माध्यम से अमेरिका, सीधे तौर पर चीन को चुनौती देना चाहता है. दरअसल, चीन सहित 15 सदस्य देश रीजनल कंप्रेहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (RCEP) व्यापर समझौता में शामिल है. इसमें जापान और दक्षिण कोरिया और 10 एशियाई देश हैं. हालांकि अमेरिका ने साफ किया है कि यह पहल कोई मुक्त व्यापर समझौता नहीं है और न ही सुरक्षा व्यवस्था है.

अमेरिका ने भारत सहित सात देशों को अपनी USTR’s निगरानी सूची में बरकरार रखा

संयुक्त राज्य व्यापार प्रतिनिधि (USTR) ने भारत सहित सात देशों को बौद्धिक संपदा संरक्षण (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टीज) के लिए अपनी प्राथमिकता निगरानी सूची (Priority Watch List) में बरकरार रखा है. भारत के अलाबे ये देश हैं- अर्जेंटीना, चिली, चीन, इंडोनेशिया, रूस और वेनेजुएला. इस वर्ष की सूची के शामिल सातों देश पिछले वर्ष की सूची में भी शामिल थे.

अमरीका ने आरोप लगाते हुए यह कदम उठाया है कि इन देशों में बौद्धिक संपदाओं और उनके प्रवर्तन ने अमरीकियों की न्यायोचित बाजार पहुंच को हानि पहुंचाई है.

अमेरिका के अनुसार, भारत में बौद्धिक संपदा चुनौतियों ने अमरीकी व्यापारियों के लिए इस देश में पेटेंट हासिल करना, कायम रखना और उसे लागू करना मुश्किल कर दिया है.

बौद्धिक संपदा

विश्व बौद्धिक संपदा अधिकार संगठन के अनुसार, बौद्धिक संपदा में साहित्यिक और कलात्मक कार्यों, प्रतीकों, नामों और छवियों का निर्माण शामिल है. चार प्रमुख बौद्धिक संपदा अधिकारों में अविष्कार, भौगोलिक संकेत, ट्रेडमार्क और औद्योगिक डिजाइन शामिल हैं.

अमेरिका ने कतर को एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी के रूप का दर्जा दिया

अमेरिका ने कतर को एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी के रूप का दर्जा दिया है. अमरीका के राष्ट्रपति जो बिडेन ने 12 मार्च को विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन को भेजे एक ज्ञापन में कतर को अमरीका के एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी के रूप में नामित किया.

अमेरिका उन देशों को प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी का दर्जा देती है जो उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) के सदस्य नहीं हैं, लेकिन अमेरिका के सशस्त्र बलों के साथ रणनीतिक संबंध रखते हैं. अमेरिका ने इससे पहले ऑस्ट्रेलिया, मिस्र, इज़रायल, जापान और दक्षिण कोरिया को प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी का दर्जा दिया था.

उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन (NATO) क्या है?

नाटो या NATO, North Atlantic Treaty Organization (उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन) का संक्षिप्त रूप है. यह 30 यूरोपीय और उत्तरी अमरीकी देशों का एक सैन्य गठबन्धन है जो रूसी आक्रमण के खिलाफ दूसरे विश्वयुद्ध के बाद 1949 में बनाया गया था. इसका मुख्यालय ब्रुसेल्स (बेल्जियम) में है. नाटो सदस्य देशों ने सामूहिक सुरक्षा की व्यवस्था बनाई है, जिसके तहत बाहरी हमले की स्थिति में सदस्य देश सहयोग करते हैं.

नाटो के सदस्य देश

मूल रूप से नाटो में 12 सदस्य (फ्रांस, बेल्जियम, लक्जमर्ग, ब्रिटेन, नीदरलैंड, कनाडा, डेनमार्क, आइसलैण्ड, इटली, नार्वे, पुर्तगाल और संयुक्त राज्य अमेरिका) थे जो अब बढ़कर 30 हो गए हैं. सबसे हालिया सदस्य उत्तर मैसेडोनिया है जिसे 2020 में संगठन में जोड़ा गया था.

नाटो के अन्य सदस्य देश: ग्रीस, तुर्की, जर्मनी, स्पेन, चेक गणराज्य, हंगरी, पोलैंड, बुल्गारिया, एस्टोनिया, लातविया, लिथुआनिया, रोमानिया, स्लोवाकिया और स्लोवेनिया, अल्बानिया और क्रोएशिया, मोंटेनेग्रो और उत्तर मैसेडोनिया.

अमेरिका ने बहुप्रतीक्षित हिंद प्रशांत नीति जारी की

अमेरिका ने बहुप्रतीक्षित हिंद प्रशांत नीति जारी कर दी है. यह नीति अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने 10 फरवरी को जारी की थी. इस नीति में हिंद प्रशांत नीति में चीन की हठधर्मिता, महामारी तथा जलवायु परिर्वतन सहित क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक क्षमता निर्माण पर ध्यान दिया गया है. इसमें भारत की भूमिका, अमरीका भारत के रिश्ते का महत्वपूर्ण तत्व है.

अमेरिकी हिंद प्रशांत नीति: मुख्य बिंदु

  • अमरीका ऐसा हिंद प्रशांत क्षेत्र चाहता है जो मुक्त, खुला, जुड़ा हुआ, खुशहाल, सुरक्षित तथा हर परिस्थितियों से निपटने में सक्षम हो.
  • अमरीका भारत के उत्थान और क्षेत्रीय नेतृत्व को समर्थन देना तथा विभिन्न मुद्दों पर भारत के साथ परस्पर ढंग से और अन्य  समूहों के जरिए सहयोग करना जारी रखेगा.
  • इसमें भारत को क्वाड समूह में “एक जैसी सोच वाले साझीदार” तथा “संवाहक शक्ति” के रूप में उल्लेखित किया गया है.
  • नीति के अनुसार पिछले प्रशासन की नीतियों को जारी रखा गया है. इसमें चीन से उत्पन्न चुनौतियों, भारत के साथ प्रमुख रक्षा भागीदारी तथा समूचे क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में उसकी भूमिका का समर्थन करना शामिल है.

अमेरिका ने बहुप्रतीक्षित हिंद प्रशांत नीति जारी की

अमेरिका ने बहुप्रतीक्षित हिंद प्रशांत नीति जारी कर दी है. यह नीति अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने 10 फरवरी को जारी की थी. इस नीति में हिंद प्रशांत नीति में चीन की हठधर्मिता, महामारी तथा जलवायु परिर्वतन सहित क्षेत्र की चुनौतियों से निपटने के लिए सामूहिक क्षमता निर्माण पर ध्यान दिया गया है. इसमें भारत की भूमिका, अमरीका भारत के रिश्ते का महत्वपूर्ण तत्व है.

अमेरिकी हिंद प्रशांत नीति: मुख्य बिंदु

  • अमरीका ऐसा हिंद प्रशांत क्षेत्र चाहता है जो मुक्त, खुला, जुड़ा हुआ, खुशहाल, सुरक्षित तथा हर परिस्थितियों से निपटने में सक्षम हो.
  • अमरीका भारत के उत्थान और क्षेत्रीय नेतृत्व को समर्थन देना तथा विभिन्न मुद्दों पर भारत के साथ परस्पर ढंग से और अन्य  समूहों के जरिए सहयोग करना जारी रखेगा.
  • इसमें भारत को क्वाड समूह में “एक जैसी सोच वाले साझीदार” तथा “संवाहक शक्ति” के रूप में उल्लेखित किया गया है.
  • नीति के अनुसार पिछले प्रशासन की नीतियों को जारी रखा गया है. इसमें चीन से उत्पन्न चुनौतियों, भारत के साथ प्रमुख रक्षा भागीदारी तथा समूचे क्षेत्र में सुरक्षा प्रदाता के रूप में उसकी भूमिका का समर्थन करना शामिल है.

फ्रांस-अमेरिका गतिरोध, फ्रांस ने अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में अपने राजदूतों को वापस बुलाया

फ्रांस ने ‘ऑकस’ (AUKUS) सुरक्षा समझौते के विरोध में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में अपने राजदूतों को वापस बुला लिया है. यह निर्णय हाल ही में ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच हुए त्रिपक्षीय सुरक्षा साझेदारी ‘ऑकस’ (AUKUS) के विरोध में लिया गया है.

क्या है मामला?

ऑस्ट्रेलिया ने फ्रांस के साथ अरबों डॉलर की डील खत्म करके AUKUS-गठबंधन के तहत परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियों के लिए नई डील की है. ऑस्ट्रेलिया ने फ्रांस के साथ ये डील डीजल चालित पनडुब्बियों के लिए की थी. दरअसल चीन से टक्कर लेने को ऑस्ट्रेलिया ने परमाणु- पनडुब्बियों के लिए, अमेरिका के साथ डील की है.

ऑकस-गठबंधन के तहत ऑस्‍ट्रेलिया को परमाणु चालित पनडुब्‍बी बनाने की टेक्‍नॉलोजी उपलब्ध कराई जानी है. फ्रांस की सरकार का कहना है कि ऑस्ट्रेलिया ने उसके साथ अरबों डॉलर की डील खत्म करके उसे धोखा दिया है.

ऑकस (AUKUS) क्या है?

‘ऑकस’ (AUKUS) ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच त्रिपक्षीय सुरक्षा साझेदारी है. अमरीकी राष्‍ट्रपति जो बाइडेन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और ऑस्‍ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्‍कॉट मॉरीसन ने इसकी घोषणा हाल ही में की थी. ऑकस संधि मोटे तौर पर दक्षिण चीन सागर में चीन का प्रभाव रोकने के उद्देश्‍य से की गई है.

अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच हुए इस समझौते से फ्रांस बेहद नराज है. फ्रांस को उम्मीद थी कि समझौते के साथ ही ऑस्ट्रेलिया के साथ उसकी नजदीकी बढ़ेगी.

परमाणु और डीजल पनडुब्बी क्या है?

प्रत्येक परमाणु पनडुब्बी में एक छोटा न्यूक्लियर रिएक्टर होता है. जिसमें ईंधन के रूप में अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम का उपयोग करते हुए बिजली पैदा की जाती है. इससे पूरी पनडुब्बी को पावर की सप्लाई की जाती है.

पारंपरिक या डीजल पनडुब्बी में पावर की सप्लाई बैटरी से की जाती है जिसे चार्ज करने के लिए डीजल जनरेटर का उपयोग किया जाता है. किसी दूसरी बैटरी की तरह इसे रीचार्ज करने के लिए पनडुब्बियों को सतह पर आना पड़ता है. ऐसे में दुश्मन देश के पनडुब्बी खोजी विमान या युद्धपोत उन्हें आसानी से देख सकते हैं.

ऑस्ट्रेलिया, यूके और अमेरिका में त्रिपक्षीय सुरक्षा साझेदारी ‘ऑकस’ की घोषणा

ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका ने ‘ऑकस’ (AUKUS) त्रिपक्षीय सुरक्षा साझेदारी की घोषणा की है. ऑकस की औपचारिक रूप से घोषणा ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन, ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन ने एक सुरक्षित और अधिक सुरक्षित इंडो-पैसिफिक के दृष्टिकोण के साथ की है.

AUKUS: मुख्य बिंदु

  • ऑकस (AUKUS) साझेदारी द्वारा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऑस्ट्रेलिया की ताकत बढ़ाया जायेगा. ऑस्ट्रेलिया को अपनी सेना के लिए लंबी दूरी की मिसाइलें मिलेंगी.
  • ऑकस ऑस्ट्रेलिया को पहली बार परमाणु पनडुब्बी देगा, इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन हो सकेगा. यह ऑस्ट्रेलिया की रक्षा क्षमताओं को बढ़ाएगा, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत का करीबी रणनीतिक साझेदार बन चुका है.
  • अमेरिका ऑस्‍ट्रेलिया को बेहद घातक परमाणु पनडुब्‍बी और अमेरिकी ब्रह्मास्‍त्र कहे जाने वाली टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें देने को तैयार हो गया है. खास बात यह है कि ब्रिटेन के बाद ऑस्‍ट्रेलिया दुनिया का ऐसा देश है जिसे ये महाविनाशकारी हथियार मिलेंगे.
  • यह साझेदारी चीन की विस्तारवादी नीतियों पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से की गयी है. इस उद्देश्य से चार बड़े देशों (भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान) का समूह (क्वाड) पहले ही अपनी भूमिका बढ़ा रहा है.

चीन की प्रतिक्रिया

चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया परमाणु ऊर्जा से संचालित पनडुब्बियों में सहयोग कर रहे हैं जो क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को काफी कमजोर कर देगा, हथियारों की होड़ बढ़ा देगा और परमाणु अप्रसार की अंतरराष्ट्रीय कोशिशों को नुकसान पहुंचाएगा.’

4 जुलाई 2021: अमेरिका का 245वां स्वतंत्रता दिवस

अमेरिका प्रत्येक वर्ष 4 जुलाई को अपना स्वतंत्रता दिवस (Independent Day) मनाता है. इस वर्ष अमेरिका का 245वां स्वतंत्रता दिवस मनाया गया. 1776 में इसी दिन संयुक्त राज्य अमेरिका (United State Of America) के राष्‍ट्र निर्माताओं ने स्‍वतंत्रता संबंधी घोषणा-पत्र पर हस्‍ताक्षर किए थे. इसमें 13 अमरीकी उपनिवेशों के ब्रिटिश साम्राज्‍य से मुक्‍त हो जाने की घोषणा की गई. घोषणा-पत्र पर हस्‍ताक्षर करने वालों में थॉमस जैफर्सन और बेंजामिन फ्रैंकलिन शामिल थे.

ब्रिटिश साम्राज्‍य का हिस्सा था

भारत की ही तरह अमेरिका भी ब्रिटिश साम्राज्‍य का एक हिस्सा था. 4 जुलाई 1776 को अमेरिका को ब्रिटिश साम्राज्य से पूर्ण स्वतंत्रता मिली थी. जॉर्ज वॉशिंगटन देश के पहले राष्ट्रपति बने थे. इसके बाद 1789 में यहाँ दुनिया का पहला लिखित संविधान लागू हुआ था. अमेरिका विश्‍व का पहला देश बना, जिसने व्यक्ति की समानता और मौलिक अधिकारों की घोषणा की.

अमेरिकी स्‍वतंत्रता संग्राम का आंदोलन 1765 से 1783 तक चला था. तत्कालीन ब्रिटिश-अमेरिका के 13 उपनिवेशों ने 4 जुलाई 1776 को स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर दिया था. इन उपनिवेशों ने यूनाइटेड स्‍टेट्स ऑफ अमेरिका की स्‍थापना की. जिसके बाद से ही हर साल 4 जुलाई को अमेरिका में राष्ट्रीय अवकाश रहता है.

अमेरिका और ब्रिटेन ने नए अटलांटिक चार्टर पर हस्ताक्षर किए

अमेरिका और ब्रिटेन ने एक नए अटलांटिक चार्टर (New Atlantic Charter) पर हस्ताक्षर किए हैं. ये हस्ताक्षर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने अपनी पहली व्यक्तिगत बैठक के दौरान किये. इसका उद्देश्य वैश्विक चुनौतियों पर एक साथ काम करने है.

जी-7 लीडर्स समिट

अमेरिका और ब्रिटेन के शीर्ष नेताओं की यह बैठक ‘जी-7 लीडर्स समिट’ की पूर्व संध्या पर 10 जून को ब्रिटेन में कॉर्नवाल के कार्बिस बे के समुद्र तटीय रिसॉर्ट में हुई थी. जनवरी 2021 में सत्ता में आने के बाद बाइडन की यह पहली विदेश यात्रा थी.

नया अटलांटिक चार्टर

नए चार्टर में अवैध वित्त, हिंसक संघर्ष और उग्रवाद, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य संकट जैसे कोविड-19 महामारी सहित आधुनिक समय के खतरों को रेखांकित किया गया है.

अटलांटिक चार्टर क्या है?

मूल अटलांटिक चार्टर पर 1941 में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूजवेल्ट द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था. इस चार्टर का मुख्य उद्देश्य मुक्त व्यापार, निरस्त्रीकरण आदि था. इस चार्टर पर 26 मित्र देशों के एक समूह ने अपना समर्थन दिया था.

इस चार्टर को 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता है. इस चार्टर ने ब्रिटिश साम्राज्य को समाप्त कर दिया और नाटो और टैरिफ एंड ट्रेड पर सामान्य समझौता (General Agreement on Tariffs and Trade – GATT) का गठन किया.

जो बाइडेन ने अमेरिका के राष्‍ट्रपति और कमला हैरिस ने उप-राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली

अमरीका के नव निर्वाचित राष्‍ट्रपति जो बाइडेन (Joe Biden) ने 20 जनवरी को देश के 46वें राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली. शपथ ग्रहण समारोह कैपिटल बिल्डिंग में आयोजित किया गया था. 78 वर्षीय बाइडेन ने अपनी 127 वर्ष पुरानी परिवारिक बाइबल के साथ शपथ ग्रहण किये. इस अवसर पर उनकी पत्‍नी डॉक्‍टर जिल बाइडेन भी मौजूद थीं. चुनाव में डेमोकेटिक पार्टी के उम्मीदवार बाइडेन ने मौजूदा राष्ट्रपति और रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप को पराजित किया था.

78 वर्षीय बाइडेन अमेरिकी इतिहास में सबसे ज्यादा उम्र में राष्ट्रपति बने हैं. इससे पहले वे 2009 से 2017 तक 47वें उपराष्ट्रपति रह चुके हैं.

कमला हैरिस ने अमरीका की 49वें उप-राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली

शपथ ग्रहण समारोह में सुश्री कमला हैरिस ने अमरीका की 49वें उप-राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली। सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस सोनिया सोटोमेयर ने हैरिस को शपथ दिलाई। वे अमरीका की पहली महिला उप-राष्‍ट्रपति हैं। इस पद को ग्रहण करने वाली वे दक्षिण एशिया मूल की भी पहली और पहली ही अश्‍वेत महिला भी होंगी। कमला हैरिस ने माइक पेंस की जगह ली है.

कमला हैरिस भारतीय मूल की पहली अमरीकी सीनेटर रह चुकी हैं. वह ‘फीमेल ओबामा’ के रूप में मशहूर हैं. कैलिफोर्निया के ओकलैंड में जन्मीं कमला भारत की रहने वाली श्यामला गोपालन और जमैका मूल के अमरीकी नागरिक डोनाल्ड हैरिस की संतान हैं. कमला की मां श्यामला गोपालन 1960 में चेन्नई से अमरीका प्रवास कर गई थीं. श्यामला गोपालन भारत की एक कैंसर शोधकर्ता और ऐक्टिविस्ट थीं.

अमेरिका में राष्ट्रपति को पद से हटाने की मांग, जानिए क्या है अमेरिकी संविधान का 25वां संशोधन

अमेरिका में हाल के कैपिटल विरोध प्रदर्शन के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को पद से हटाने की मांग चर्चा में रहा है. यह मांग अमेरिकी संविधान के 25वें संशोधन के तहत की जा रही है.

क्या है अमेरिका का 25वां संविधान संशोधन?

साल 1967 में अमेरिकी संविधान में 25वें संशोधन को लागू किया गया था. इसके तहत, ये व्यवस्था की गई कि अगर राष्ट्रपति शासन करने में अक्षम है या उसका निधन हो जाता है तो उप-राष्ट्रपति को स्थायी रूप से सत्ता सौंपी जा सकती है.
अमेरिका के उप-राष्ट्रपति की सहमति और कैबिनेट के बहुमत से ये घोषित किया जा सकता है कि राष्ट्रपति अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने में अक्षम हैं. अगर राष्ट्रपति इसका विरोध करता है तो दोनों सदनों में उप-राष्ट्रपति को सत्ता सौंपने के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी होगा.