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Tag Archive for: Environment

भारत की नई बाघ और हाथी संरक्षण रिपोर्ट 2026 का मसौदा जारी

March 31, 2026/by Team EduDose

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने 30 मार्च 2026 को  भारत की ‘नई बाघ और हाथी संरक्षण रिपोर्ट 2026’ का मसौदा (Draft) जारी किया था.

यह रिपोर्ट भारत के वन्यजीव इतिहास में बहुत खास है, क्योंकि यह ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ (1973) और ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ (1992) के हालिया ऐतिहासिक विलय (Merger) के बाद जारी की गई पहली संयुक्त निगरानी रिपोर्ट है. अब इन दोनों बड़े कार्यक्रमों को मिलाकर ‘प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलीफेंट डिवीजन’ (PT and E Division) बना दिया गया है.

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु

  • रिपोर्ट में मानव-वन्यजीव संघर्ष (HWC) को कम करने के लिए जंगलों के किनारे और गांवों की सीमाओं पर ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) आधारित थर्मल कैमरों के इस्तेमाल पर सबसे ज्यादा जोर दिया गया है.
  • ये AI कैमरे रात के अंधेरे में भी हाथियों के झुंड या बाघ के इंसानी बस्तियों की तरफ बढ़ने पर वन विभाग और स्थानीय लोगों के मोबाइल पर तुरंत अलर्ट भेज देते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान टाला जा सके.
  • इस रिपोर्ट ने सिर्फ जानवरों की गिनती करने के बजाय रिज़र्व जंगलों की ‘कैरिंग कैपेसिटी’ (यानी एक जंगल अपने संसाधनों के आधार पर अधिकतम कितने बाघों या हाथियों का भरण-पोषण कर सकता है) का आकलन करने पर ध्यान केंद्रित किया है.
  • जानवरों के सुरक्षित आवागमन और जेनेटिक विविधता बनाए रखने के लिए देशभर में पहचाने गए 150 से अधिक ‘एलीफेंट कॉरिडोर’ और टाइगर रिज़र्व को जोड़ने वाले गलियारों को अतिक्रमण मुक्त करने की सख्त रणनीति पेश की गई है.
  • रिपोर्ट मानती है कि जंगलों के बीच से गुजरने वाले हाईवे और रेलवे ट्रैक हाथियों और बाघों की मौत का एक बड़ा कारण हैं. इसे रोकने के लिए भविष्य की सभी विकास परियोजनाओं में ‘एनिमल अंडरपास’ या ‘इको-ब्रिज’ (जानवरों के पुल) बनाना अनिवार्य करने की सिफारिश की गई है.

प्रोजेक्ट टाइगर और प्रोजेक्ट एलीफेंट का विलय

  • भारत सरकार द्वारा ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ और ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ का आधिकारिक रूप से विलय 23 जून 2023 को किया गया था.
  • इन दोनों प्रमुख वन्यजीव संरक्षण कार्यक्रमों को मिलाकर केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के तहत एक नया प्रभाग ‘प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलीफेंट डिवीजन’ (PT&E Division) स्थापित किया गया है.
  • भारत के अधिकांश जंगलों में बाघ और हाथी एक ही प्राकृतिक आवास को साझा करते हैं. इस विलय का मुख्य उद्देश्य दोनों के लिए बजट के आवंटन को सुव्यवस्थित करना, प्रशासनिक कार्यों का दोहराव रोकना और प्रबंधन को अधिक वैज्ञानिक व प्रभावी बनाना है.
  • रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि भारत के अधिकांश (लगभग 60-70%) टाइगर रिज़र्व और एलीफेंट रिज़र्व एक ही भौगोलिक क्षेत्र में आते हैं (जैसे कॉर्बेट, बांदीपुर, काजीरंगा आदि).
  • भारत में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत वर्ष 1973 में हुई थी, जबकि ‘प्रोजेक्ट एलीफेंट’ को वर्ष 1992 में शुरू किया गया था.
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नागोया प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन पर भारत की पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट

March 17, 2026/by Team EduDose

भारत के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने 27 फरवरी 2026 को ‘जैविक विविधता अभिसमय’ (CBD) के सचिवालय को नागोया प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन पर अपनी पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट (First National Report – NR1) सौंपी थी. यह रिपोर्ट राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) के सहयोग से तैयार की गई है. यह रिपोर्ट 1 नवंबर 2017 से 31 दिसंबर 2025 तक की अवधि को कवर करती है.

नागोया प्रोटोकॉल क्या है?

नागोया प्रोटोकॉल 2010 में अपनाया गया एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है. इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब भी दवा कंपनियों या शोधकर्ताओं द्वारा किसी देश के जैविक संसाधनों (Genetic Resources) और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग किया जाए, तो उससे होने वाले मुनाफे का एक उचित हिस्सा उन स्थानीय और मूल समुदायों के साथ साझा किया जाए जो पीढ़ियों से उन संसाधनों की रक्षा कर रहे हैं. इसे बायोपायरेसी रोकने का एक बड़ा कदम माना जाता है.

भारत की पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट (NR1): मुख्य विशेषताएं

  • रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2025 के बीच राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) द्वारा दी गई मंजूरियों के माध्यम से लगभग ₹216.31 करोड़ जुटाए गए हैं. इसके अलावा, राज्य जैव विविधता बोर्डों (SBBs) ने भी लगभग ₹51.96 करोड़ जुटाए हैं.
  • जुटाई गई इस राशि में से ₹139.69 करोड़ सीधे तौर पर स्थानीय समुदायों, किसानों और पारंपरिक ज्ञान रखने वाले लोगों (Benefit Claimers) को बांटे गए हैं.
  • भारत ने ABS क्लीयरिंग हाउस पर 3,556 ‘अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अनुपालन प्रमाण पत्र’ (IRCCs) प्रकाशित किए हैं. यह वैश्विक स्तर पर जारी किए गए कुल प्रमाणपत्रों का लगभग 60% है, जो पारदर्शिता में भारत के वैश्विक नेतृत्व को दर्शाता है.

भारत में इस प्रोटोकॉल को ‘जैव विविधता अधिनियम, 2002’ के तहत एक बेहद मजबूत त्रि-स्तरीय ढांचे के माध्यम से लागू किया जा रहा है:

  1. राष्ट्रीय स्तर पर: राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA).
  2. राज्य स्तर पर: राज्य जैव विविधता बोर्ड (SBBs) और केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदें (UTBCs).
  3. स्थानीय स्तर पर: पूरे देश में 2.76 लाख से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियां (BMCs) स्थापित की गई हैं, जो ग्रासरूट लेवल पर स्थानीय जैव संसाधनों की रक्षा करती हैं.
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भारत के ने हिंद महासागर में दुर्लभ हाइड्रोथर्मल वेंट की खोज की

March 3, 2026/by Team EduDose

भारत ने अपने डीप ओशन मिशन’ (Deep Ocean Mission)  के तहत हिंद महासागर में दुर्लभ हाइड्रोथर्मल वेंट (Hydrothermal Vents) और नई समुद्री प्रजातियों की खोज की है. यह खोज समुद्री विज्ञान, पर्यावरण और भारत की ‘ब्लू इकॉनमी’ (Blue Economy) के लिए एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि है.

खोज से जुड़ी मुख्य जानकारी

  • यह खोज दक्षिणी हिंद महासागर के सेंट्रल और साउथ वेस्ट इंडियन रिज क्षेत्र में की गई है. यह स्थान समुद्र के भीतर लगभग 4,500 मीटर की गहराई में स्थित है.
  • इस खोज के लिए ‘ओशन मिनरल एक्सप्लोरर’ जैसे ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (AUV) का इस्तेमाल किया गया.

हाइड्रोथर्मल वेंट क्या होते हैं?

  • हाइड्रोथर्मल वेंट, समुद्र के तल पर मौजूद ‘गर्म झरने’ (hot springs) होते हैं.
  • समुद्र के तल में जहां टेक्टोनिक प्लेट्स खिसकती हैं, वहां दरारें बन जाती हैं. जब समुद्र का ठंडा पानी इन दरारों से अंदर जाकर पृथ्वी के मैग्मा के संपर्क में आता है, तो वह अत्यधिक गर्म (लगभग 370°C तक) हो जाता है.
  • यह खौलता हुआ पानी अपने साथ भारी मात्रा में खनिजों और गैसों को लेकर समुद्र तल से वापस एक फव्वारे के रूप में बाहर निकलता है.

नई समुद्री प्रजातियां

  • आम तौर पर समुद्र की इतनी गहराई में सूरज की रोशनी बिल्कुल नहीं पहुँचती है, इसलिए वहां जीवन मुश्किल माना जाता है.
  • हालांकि, इन हाइड्रोथर्मल वेंट के आसपास एक बिल्कुल अलग और जीवंत इकोसिस्टम पनपता है. यहाँ पाए जाने वाले जीव और सूक्ष्मजीव (Microbes) प्रकाश संश्लेषण के बजाय कीमोसिंथेसिस (Chemosynthesis) के जरिए जीवित रहते हैं—यानी वे वेंट से निकलने वाले रसायनों का उपयोग करके अपनी ऊर्जा बनाते हैं.
  • इस गहरे और चरम वातावरण में कई दुर्लभ और नई प्रजातियां विकसित होती हैं, जो वैज्ञानिकों के लिए विकासवाद (Evolution) और गहरे समुद्र के जीव विज्ञान को समझने का एक नया रास्ता खोलती हैं.

भारत के लिए इसका महत्व

  • इन वेंट्स के आसपास तांबा, जस्ता (Zinc), सोना, चांदी, कोबाल्ट और निकल जैसे बहुमूल्य धातुओं और सल्फाइड के विशाल भंडार जमा हो जाते हैं, जो भविष्य की तकनीकी जरूरतों (जैसे बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स) के लिए बेहद अहम हैं.
  • यह खोज भारत के ‘समुद्रयान’ मिशन को और मजबूती देती है. इस मिशन के तहत भारत ‘मत्स्य 6000’ (MATSYA 6000) नामक स्वदेशी पनडुब्बी तैयार कर रहा है, जो तीन इंसानों को 6000 मीटर की गहराई तक लेकर जाएगी.
  • इस क्षमता के साथ भारत अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन जैसे देशों के उस ‘एलीट क्लब’ में शामिल हो गया है जिनके पास गहरे समुद्र में सर्वे और खोज करने की उन्नत तकनीक है.
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भारत के दो नई आर्द्रभूमियों को रामसर स्थल का दर्जा दिया गया

February 8, 2026/by Team EduDose

रामसर कन्वेंशन (Ramsar Convention) के तहत भारत के दो और आर्द्रभूमि स्थलों को रामसर धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया गया है. ये रामसर स्थल हैं- पटना पक्षी अभयारण्य (उत्तर प्रदेश) और छारी-ढांड (गुजरात). इसके साथ ही भारत में रामसर स्थलों की कुल संख्या अब 98 हो गई है.

पटना पक्षी अभयारण्य: यह उत्तर प्रदेश के एटा जिले में स्थित है. यह उत्तर प्रदेश का सबसे छोटा संरक्षित पक्षी अभयारण्य है, जो लगभग 1 वर्ग किलोमीटर (108.8 हेक्टेयर) में फैला हुआ है. यह एक ‘इम्पॉर्टेंट बर्ड एरिया’ (IBA) है. इसके शामिल होने से उत्तर प्रदेश में रामसर स्थलों की संख्या बढ़कर 11 हो गई है (तमिलनाडु के बाद दूसरा सर्वाधिक).

छारी-ढांड: यह गुजरात के कच्छ जिले में स्थित एक अद्वितीय इकोसिस्टम है. यह ‘बन्नी घास के मैदानों’ के पास स्थित है और लगभग 22,700 हेक्टेयर में फैला हुआ है. यह एक मौसमी खारी आर्द्रभूमि है. यह गुजरात का 5वां और कच्छ क्षेत्र का पहला रामसर स्थल है.

रामसर स्थल का दर्जा

  • रामसर स्थल का दर्जा उन आर्द्रभूमियों को दिया जाता है जो रामसर कन्वेंशन (Ramsar Convention) के मानकों को पूरा करते हैं.
  • रामसर कन्वेंशन आर्द्रभूमि के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि है. यह आर्द्रभूमि एवं उनके संसाधनों के संरक्षण तथा उचित उपयोग हेतु राष्ट्रीय कार्रवाई और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिये रूपरेखा प्रदान करती है.
  • रामसर स्थल नाम कैस्पियन सागर पर स्थित ईरानी शहर रामसर के नाम पर रखा गया है क्योंकि यहीं 02 फरवरी 1971 को रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए गए थे. भारत ने इस संधि पर 1 फरवरी 1982 को हस्ताक्षर किये थे.
  • रामसर स्थलों की सूची रामसर सम्मेलन के सचिवालय द्वारा रखी जाती है, जो स्विट्जरलैंड के ग्लैंड में स्थित अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) मुख्यालय में स्थित है.
  • रामसर साइट का दर्जा प्राप्त आर्द्रभूमि अंतरराष्ट्रीय महत्व रखते हैं और उनके संरक्षण और उनके संसाधनों के इस्तेमाल के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त होता है.
  • दुनिया भर में रामसर साइट की संख्या 2,500 से ज्यादा है, जो करीब 25 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा के क्षेत्र में फैले हैं.

भारत और विश्व में रामसर स्थल

  • भारत में अब कुल 98 रामसर स्थल हैं जो देश की कुल भूमि का लगभग 5% है. ये क्षेत्र देश के 13.58 लाख हैक्‍टेयर भूमि में फैले हैं.
  • प्रथम भारतीय रामसर स्थल- केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान) और चिल्का झील (ओडिशा) है, जिसे 1981 में शामिल किया गया था.
  • भारत में सबसे बड़ा रामसर स्थल पश्चिम बंगाल का सुंदरबन और सबसे छोटा रामसर हिमाचल प्रदेश में रेणुका है.
  • भारत के इंदौर और उदयपुर को ‘वेटलैंड (आर्द्र भूमि) सिटी’ का दर्जा दिया गया है. यह उपलब्धि हासिल करने वाले ये भारत के पहले शहर हैं. दुनिया भर में कुल 31 शहरों को ‘वेटलैंड सिटी’ का दर्जा प्राप्त है.
  • रामसर सूची के अनुसार, सबसे अधिक रामसर स्थलों वाले देश यूनाइटेड किंगडम (175) और मेंक्सिको (144) हैं.
  • विश्व में अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमि का क्षेत्रफल 150,000 वर्ग किमी से अधिक है. विश्व में सबसे बड़ा आर्द्रभूमि का क्षेत्र ब्राजील का है, जिसका 267,000 वर्ग किमी क्षेत्र आता है.
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अरावली पर्वतमाला मामले में सर्वोच्च न्यायालय का आदेश

December 23, 2025/by Team EduDose

अरावली पर्वतमाला को लेकर 20 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया. इस आदेश के माध्यम से न्यायालय ने अरावली के संरक्षण और वहां होने वाले खनन के लिए एक समान परिभाषा (Uniform Definition) को मंजूरी दी है.

कोर्ट का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों (हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, दिल्ली) में अरावली की अलग परिभाषा होने से अवैध खनन और कानूनी जटिलताएं बढ़ रही थीं.

आदेश के मुख्य बिंदु

अरावली की नई ‘कानूनी परिभाषा’

  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की समिति द्वारा प्रस्तावित परिभाषा को स्वीकार कर लिया है:
  • अब केवल उन्हीं भू-आकृतियों (landforms) को ‘अरावली पहाड़ी’ माना जाएगा जिनकी ऊंचाई आसपास की जमीन से 100 मीटर या उससे अधिक है.
  • यदि ऐसी दो या दो से अधिक पहाड़ियां एक-दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हैं, तो उन्हें ‘अरावली रेंज’ माना जाएगा.

खनन पर ताजा स्थिति

  • कोर्ट ने आदेश दिया है कि जब तक ‘मैनेजमेंट प्लान फॉर सस्टेनेबल माइनिंग’ (MPSM) तैयार नहीं हो जाता, तब तक अरावली क्षेत्र में कोई भी नया खनन पट्टा (Mining Lease) जारी नहीं किया जाएगा.
  • मौजूदा कानूनी खनन गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है, क्योंकि कोर्ट का मानना है कि पूर्ण प्रतिबंध से ‘माफिया राज’ और अवैध खनन को बढ़ावा मिलता है.
  • वन्यजीव अभयारण्य, टाइगर कॉरिडोर और वेटलैंड्स जैसे संवेदनशील इलाकों में खनन पर पूरी तरह रोक रहेगी.

फैसले पर पर्यावरणविदों की चिंता

  • फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, 12,000 से अधिक पहाड़ियों में से केवल 1,000 के करीब ही 100 मीटर के बेंचमार्क को पूरा करती हैं. इसका मतलब है कि अरावली का लगभग 90% हिस्सा कानूनी सुरक्षा से बाहर हो सकता है.
  • छोटी पहाड़ियों और टीलों को संरक्षण न मिलने से थार रेगिस्तान के दिल्ली-NCR की ओर बढ़ने का खतरा बढ़ जाएगा और भूजल स्तर (Groundwater level) और गिर सकता है.

फैसले के खिलाफ दायर याचिका

  • विवाद बढ़ने के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने इस 100 मीटर के पैमाने के खिलाफ दायर याचिका को स्वीकार कर लिया है. कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है.
  • इसी बीच, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जब तक नई नीति लागू नहीं होती, तब तक राज्यों को नए खनन पट्टे न देने के सख्त निर्देश दिए गए हैं.
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महाराष्ट्र के पाँच समुद्र तटों को प्रतिष्ठित ‘ब्लू फ्लैग’ सर्टिफिकेशन प्रदान किया गया

October 25, 2025/by Team EduDose

महाराष्ट्र के पाँच समुद्र तटों को हाल ही में प्रतिष्ठित ‘ब्लू फ्लैग’ सर्टिफिकेशन प्रदान किया गया है. ये समुद्र तट हैं:

  1. श्रीवर्धन (रायगढ़ जिला)
  2. नागांव (रायगढ़ जिला)
  3. परनाका (पालघर जिला)
  4. गुहागर (रत्नागिरी जिला)
  5. लाडघर (रत्नागिरी जिला)
  • इन पाँच समुद्र तटों को यह सर्टिफिकेशन मिलना इस बात का प्रमाण है कि वे पर्यटन के लिए विश्व स्तर के साफ, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल गंतव्य हैं.
  • ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन क्या है?
  • ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन एक अंतर्राष्ट्रीय इको-लेबल है जो फाउंडेशन फॉर एनवायर्नमेंटल एजुकेशन (FEE) डेनमार्क द्वारा दिया जाता है.
  • यह दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित स्वैच्छिक पुरस्कारों में से एक है जो किसी समुद्र तट, मरीना या टिकाऊ नौका पर्यटन ऑपरेटर को प्रदान किया जाता है.

ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन प्राप्त करने के लिए मानदंड

यह सर्टिफिकेशन प्राप्त करने के लिए समुद्र तटों को 33 कठोर मानदंडों को पूरा करना होता है, जो चार मुख्य श्रेणियों में आते हैं:

  1. पर्यावरण शिक्षा और सूचना
  2. जल गुणवत्ता
  3. पर्यावरण प्रबंधन
  4. सुरक्षा और सेवाएँ

यह सर्टिफिकेशन हर साल दिया जाता है, और यदि कोई समुद्र तट इन मानकों का उल्लंघन करता है, तो उसका ब्लू फ्लैग दर्जा वापस ले लिया जाता है.

भारत में ब्लू फ्लैग सर्टिफाइड समुद्र तटों की सूची

इन पाँच समुद्र तटों के साथ वर्तमान में भारत में ब्लू फ्लैग सर्टिफाइड समुद्र तटों की कुल संख्या बढ़कर 18 हो गई है.

पहले के 13 समुद्र तट

  1. गोल्डन बीच, ओडिशा
  2. शिवराजपुर बीच, गुजरात
  3. घोघला बीच, दीव (दमन और दीव)
  4. कप्पड बीच, केरल
  5. राधानगर बीच, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह
  6. कासरकोड बीच, कर्नाटक
  7. पदुबिद्री बीच, कर्नाटक
  8. रुशिकोंडा बीच, आंध्र प्रदेश
  9. कोवलम बीच, तमिलनाडु
  10. ईडन बीच, पुडुचेरी
  11. मिनीकॉय थुंडी बीच, लक्षद्वीप
  12. कदमत बीच, लक्षद्वीप
  13. चाल बीच, केरल

अक्टूबर 2025 में शामिल 5 समुद्र तट

  1. श्रीवर्धन बीच, महाराष्ट्र (रायगढ़ जिला)
  2. नागांव बीच, महाराष्ट्र (रायगढ़ जिला)
  3. परनाका बीच, महाराष्ट्र (पालघर जिला)
  4. गुहागर बीच, महाराष्ट्र (रत्नागिरी जिला)
  5. लाडघर बीच, महाराष्ट्र (रत्नागिरी जिला)
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स्वच्छ वायु सर्वेक्षण पुरस्कार 2025: इंदौर पहले स्थान पर

September 12, 2025/by Team EduDose

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 9 सितम्बर को नई दिल्ली में स्वच्छ वायु सर्वेक्षण पुरस्कार समारोह का आयोजन किया था. इस समारोह में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेन्‍द्र यादव ने स्वच्छ वायु सर्वेक्षण पुरस्कार 2025 प्रदान किए.

स्वच्छ वायु सर्वेक्षण पुरस्कार 2025

राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के तहत 130 शहरों में आयोजित स्वच्छ वायु सर्वेक्षण 2025 के तहत सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले शहरों को पुरस्कृत किया गया.

  1. श्रेणी 1 (10 लाख से अधिक जनसंख्या वाले शहर): इंदौर पहले, जबलपुर दूसरे और आगरा और सूरत संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर रहा.
  2. श्रेणी 2 (3-10 लाख जनसंख्या वाले शहर): अमरावती पहले, झाँसी और मुरादाबाद संयुक्त रूप से दूसरे और अलवर तीसरे स्थान पर रहा.
  3. श्रेणी 3 (3 लाख से कम जनसंख्या वाले शहर): देवास पहले, परवाणू दूसरे और अंगुल तीसरे स्थान पर रहा.

केन्‍द्रीय मंत्री भूपेन्‍द्र यादव ने राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम के माध्यम से 130 शहरों में से 103 शहरों में PM10 सूक्ष्‍म कणों के स्तर पर वायु गुणवत्ता में हुई प्रगति का उल्लेख किया.

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वित्त वर्ष 2024-25 में भारत की अक्षय ऊर्जा क्षमता में ऐतिहासिक वृद्धि

April 10, 2025/by Team EduDose
  • नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRI) ने वित्त वर्ष 2024-25 के लिए भारत के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में प्रगति से संबंधित रिपोर्ट 10 अप्रैल को जारी की थी.
  • इस रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक देश में कुल स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा (RE) क्षमता 220.10 गीगावॉट तक पहुँच गई है. यह पिछले वित्त वर्ष में 198.75 गीगावॉट थी.
  • सौर ऊर्जा ने सबसे अधिक योगदान दिया है. वित्त वर्ष 2024-25 में 23.83 गीगावाट सौर ऊर्जा की वृद्धि हुई है.  कुल स्थापित सौर क्षमता अब 105.65 गीगावाट है.
  • वर्ष के दौरान पवन ऊर्जा में 4.15 गीगावाट की वृद्धि हुई है. देश की कुल संचयी स्थापित पवन क्षमता अब 50.04 गीगावाट है.
  • जैव ऊर्जा संयंत्रों की कुल क्षमता 11.58 गीगावाट तक पहुंच गई है. लघु पनबिजली परियोजनाओं ने 5.10 गीगावाट की क्षमता प्राप्त कर ली है.
  • अंतर्राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा एजेंसी (आईआरईएनए) के अनुसार, 2024 में चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्राजील के बाद भारत, दुनिया में चौथी सबसे बड़ी अक्षय ऊर्जा क्षमता वाला देश होगा.

अक्षय ऊर्जा क्या है?

  • अक्षय ऊर्जा प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त ऊर्जा है जो लगातार और स्वाभाविक रूप से नवीनीकृत होती रहती है, जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल-विद्युत ऊर्जा, जैव ऊर्जा और भूतापीय ऊर्जा. इसे ‘नवीकरणीय ऊर्जा’ के नाम से भी जाना जाता है.
  • अक्षय ऊर्जा, जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम तेल, प्राकृतिक गैस) जैसे ऊर्जा के गैर-नवीकरणीय स्रोतों से अलग हैं, जो सीमित मात्रा हैं.
  • अक्षय ऊर्जा की तुलना में जीवाश्म ईंधन अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं, जिससे ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारक माना जाता है.
  • प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावॉट गैर-जीवाश्म ईंधन-आधारित क्षमता प्राप्त करने के लक्ष्य रखा है.
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भारत में 4 नए आर्द्रभूमि को रामसर स्थल का दर्जा दिया गया

February 4, 2025/by Team EduDose

रामसर कन्वेंशन (Ramsar Convention) के तहत भारत के 4 नए आर्द्रभूमि को रामसर स्थल (Ramsar Sites) का दर्जा दिया गया है. ये स्थल हैं- झारखंड में उधवा झील (Udhwa Lake), तमिलनाडु में तीरतंगल और सक्काराकोट्टई (Theerthangal and Sakkarakottai) और सिक्किम में खेचियोपालरी (Khecheopalri). 4 नए रामसर स्थल का दर्जा दिए जाने के बाद अब भारत में रामसर स्थलों की कुल संख्‍या 89 हो गई है.

रामसर स्थल: एक दृष्टि

  • अंतर्राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि को रामसर स्थल कहा जाता है. रामसर स्थल पानी में स्थित मौसमी या स्थायी पारिस्थितिक तंत्र हैं. इनमें मैंग्रोव, दलदल, नदियाँ, झीलें, डेल्टा, बाढ़ के मैदान और बाढ़ के जंगल, चावल के खेत, प्रवाल भित्तियाँ, समुद्री क्षेत्र (6 मीटर से कम ऊँचे ज्वार वाले स्थान) के अलावा मानव निर्मित आर्द्रभूमि जैसे- अपशिष्ट जल उपचार तालाब और जलाशय आदि शामिल होते हैं.
  • आर्द्रभूमियां प्राकृतिक पर्यावरण का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं. ये बाढ़ की घटनाओं में कमी लाती हैं, तटीय इलाकों की रक्षा करती हैं, साथ ही प्रदूषकों को अवशोषित कर पानी की गुणवत्ता में सुधार करती हैं.
  • आर्द्रभूमि मानव और पृथ्वी के लिये महत्त्वपूर्ण हैं. 1 बिलियन से अधिक लोग जीवनयापन के लिये उन पर निर्भर हैं और दुनिया की 40% प्रजातियाँ आर्द्रभूमि में रहती हैं तथा प्रजनन करती हैं.

रामसर स्थल का दर्जा

  • रामसर स्थल का दर्जा उन आर्द्रभूमियों को दिया जाता है जो रामसर कन्वेंशन (Ramsar Convention) के मानकों को पूरा करते हैं. रामसर कन्वेंशन एक पर्यावरण संधि है जो आर्द्रभूमि एवं उनके संसाधनों के संरक्षण तथा उचित उपयोग हेतु राष्ट्रीय कार्रवाई और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिये रूपरेखा प्रदान करती है.
  • रामसर स्थल नाम ईरान के रामसर शहर के नाम पर रखा गया है क्योंकि यहीं 02 फरवरी 1971 को रामसर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए गए थे. भारत ने इस संधि पर 1 फरवरी 1982 को हस्ताक्षर किये थे.
  • रामसर स्थलों की सूची रामसर सम्मेलन के सचिवालय द्वारा रखी जाती है, जो स्विट्जरलैंड के ग्लैंड में स्थित अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (आईयूसीएन) मुख्यालय में स्थित है.
  • रामसर साइट का दर्जा प्राप्त वेटलैंड अंतरराष्ट्रीय महत्व रखते हैं और उनके संरक्षण और उनके संसाधनों के इस्तेमाल के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग प्राप्त होता है.
  • दुनिया भर में रामसर साइट की संख्या 2,500 से ज्यादा है, जो करीब 25 लाख वर्ग किलोमीटर से ज्यादा के क्षेत्र में फैले हैं.

भारत और विश्व में रामसर स्थल

  • भारत में अब कुल 89 रामसर स्थल हैं जो देश की कुल भूमि का लगभग 5% है. ये क्षेत्र देश के 13.58 लाख हैक्‍टेयर भूमि में फैले हैं.
  • आर्द्रभूमि के राज्य-वार वितरण में तमिलनाडु (20 रामसर स्थल) पहले और गुजरात दूसरे स्थान पर है (एक लंबी तटरेखा के कारण). इसके बाद आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल का स्थान है.
  • प्रथम भारतीय रामसर स्थल- केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान) और चिल्का झील (ओडिशा) है, जिसे 1981 में शामिल किया गया था.
  • भारत में सबसे बड़ा रामसर स्थल पश्चिम बंगाल का सुंदरबन और सबसे छोटा रामसर हिमाचल प्रदेश में रेणुका है.
  • रामसर सूची के अनुसार, सबसे अधिक रामसर स्थलों वाले देश यूनाइटेड किंगडम (175) और मेंक्सिको (142) हैं. अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्द्रभूमि का क्षेत्रफल (148,000 वर्ग किमी) सबसे अधिक बोलीविया में है.

इंदौर और उदयपुर को भारत की पहली ‘वेटलैंड सिटी’ का दर्जा दिया गया…»

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इंदौर और उदयपुर को भारत की पहली ‘वेटलैंड सिटी’ का दर्जा दिया गया

January 31, 2025/by Team EduDose
  • भारत के इंदौर और उदयपुर को ‘वेटलैंड (आर्द्र भूमि) सिटी’ का दर्जा दिया गया है. यह उपलब्धि हासिल करने वाले ये भारत के पहले शहर बन गए हैं. दुनिया भर में कुल 31 शहरों को ‘वेटलैंड सिटी’ का दर्जा प्राप्त है.
  • पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वेटलैंड सिटी प्रमाणन (WCA) हासिल करने के लिए भारत के तीन शहरों –  इंदौर (मध्य प्रदेश), भोपाल (मध्य प्रदेश), और उदयपुर (राजस्थान) के नामांकन भेजे थे. जिनमें से इंदौर और उदयपुर को यह दर्ज दिया गया.
  • वेटलैंड सिटी मान्यता, एक तरह का प्रमाण पत्र है जिसे रामसर कन्वेंशन के तहत कॉप-12 सम्मेलन के दौरान उन शहरों के लिए बनाया गया था, जो शहरों में मौजूद वेटलैंड की सुरक्षा, संरक्षण और उसके सतत प्रबंधन के लिए प्रतिबद्ध हैं. इसका उद्देश्य शहरी विकास और पारिस्थितिकी के बीच संतुलन बनाए रखना है.
  • वेटलैंड या आर्द्र भूमि से आशय नमी वाले उन इलाकों से है, जहां साल भर या कुछ महीने पानी भरा रहता है. जैव विविधता और पानी को बचाने के लिए वेटलैंड बेहद जरूरी हैं.
  • मैंग्रोव, दलदल, बाढ़ के मैदान, तालाब, झील, नदियां, पानी से भरे जंगल, धान के खेत ये सभी वेटलैंड के ही उदाहरण हैं.
  • दुनिया भर में मैंग्रोव 1.5 करोड़ से ज्यादा लोगों की रक्षा करते हैं और हर साल बाढ़ से होने वाले करीब 65 अरब डॉलर के नुकसान को बचाते हैं.
  • दलदली जमीन प्राकृतिक स्पंज की तरह काम करती है. बारिश के दौरान ये अपने अंदर पानी जमा करती है और सूखे के समय उसे धीरे-धीरे बाहर निकालती है, जिससे सूखे जैसे संकट के समय मदद मिलती है.
  • धरती की सतह का 70 फीसदी हिस्सा पानी से ढका होने के बाद भी पीने के लिए मात्र 2.7 फीसदी मीठा पानी ही मौजूद है. मीठा पानी का अधिकांश हिस्सा ग्लेशियरों में मौजूद है.
  • मानव तक पहुंचने वाला अधिकांश मीठा पानी वेटलैंड से ही हासिल होता है. वेटलैंड के बिना दुनिया भर में पीने के पानी की समस्या पैदा हो सकती है.
  • वेटलैंड वातावरण में मौजूद कार्बन सोखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. ये पेड़ों की तुलना में ज्यादा कार्बन जमा कर सकते हैं. ये तूफानी लहरों को रोक कर हर साल बाढ़ से होने वाले नुकसान से बचाते हैं.
  • रामसर स्थल और वेटलैंड सिटी में अंतर है. रामसर साइट देश के किसी भी हिस्से में मौजूद हो सकती हैं जबकि वेटलैंड सिटी का दर्जा सिर्फ शहरी इलाकों में मौजूद साइट को ही हासिल हो सकता है.

जानिए क्या है रामसर स्थल, भारत में रामसर स्थलों की संख्‍या 89 हुई…»

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केरल के कप्पड़ और चाल समुद्रतट को  ‘ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन’ दिया गया

January 14, 2025/by Team EduDose

डेनमार्क के फाउंडेशन फॉर एनवायर्नमेंटल एजुकेशन (FEE) ने केरल के कप्पड़ और चाल समुद्रतट को ‘ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन’ प्रदान किया है. कप्पड़ समुद्रतट केरल के कोझिकोड में और चाल समुद्रतट कन्नूर में है.

ब्लू फ्लैग सर्टिफिकेशन (प्रमाणन) समुद्र तटों, मरीनाओं और नौकायन संचालकों को दिया जाता है जो फाउंडेशन फॉर एनवायरनमेंटल एजुकेशन (FEE) द्वारा स्थापित 33 कड़े मानदंडों को पूरा करते हैं.

ब्लू फ्लैग प्रमाणन वाले भारतीय समुद्र तट

भारत का पहला ब्लू फ्लैग प्रमाणित समुद्र तट ओडिशा में स्थित चंद्रभागा समुद्र तट है. भारत में अब 13 ब्लू फ्लैग प्रमाणित समुद्र तट हैं:

  • ओडिशा: गोल्डन समुद्र तट
  • गुजरात: शिवराजपुर समुद्र तट
  • केरल: कप्पड़ समुद्र तट, चाल समुद्र तट
  • दीव: घोघला समुद्र तट
  • अंडमान और निकोबार: राधानगर समुद्र तट
  • कर्नाटक: कसारकोड समुद्र तट, पडुबिद्री समुद्र तट
  • आंध्र प्रदेश: रुशिकोंडा समुद्र तट
  • तमिलनाडु: कोवलम समुद्र तट
  • पुदुचेरी: ईडन समुद्र तट
  • लक्षद्वीप: मिनिकॉय थुंडी समुद्र तट, कदमत समुद्र तट
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वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 जारी

January 2, 2025/by Team EduDose
  • जल शक्ति मंत्री श्री सीआर पाटिल ने 31 दिसंबर 2024 को वार्षिक भूजल गुणवत्ता रिपोर्ट 2024 (Annual Ground Water Quality Report 2024) जारी की थी.
  • यह रिपोर्ट केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) द्वारा तैयार की गई है. भूजल गुणवत्ता का आकलन 15,200 निगरानी स्थलों से प्राप्त डेटा के आधार पर किया गया है.
  • रिपोर्ट के अनुसार भारत के भूजल में कैल्शियम सबसे प्रमुख धनायन (Cations) है, उसके बाद सोडियम और पोटेशियम का स्थान है.
  • भारत के भूजल में बाइकार्बोनेट सबसे अधिक मौजूद ऋण-आयन (Anions) है, उसके बाद क्लोराइड और सल्फेट का स्थान है.
  • नाइट्रेट, फ्लोराइड और आर्सेनिक का असंगत प्रदूषण कुछ क्षेत्रों में देखा गया है.
  • भूजल सैम्पल्स सिंचाई के लिए सुरक्षित सीमाओं के भीतर पाए गए, जो भूजल की कृषि उपयोगिता को अनुकूल दर्शाते हैं.
  • पूर्वोत्तर राज्यों में सभी भूजल सैम्पल्स सिंचाई के लिए उत्कृष्ट श्रेणी में पाए गए.
  • सोडियम अवशोषण अनुपात पानी में कैल्शियम (Ca), और मैग्नीशियम (Mg) की तुलना में सोडियम (Na) मात्रा के अनुपात को मापने का एक मानक है.
  • देश में कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण (ग्राउंड वाटर रिचार्ज) 446.90 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) आंका गया है. देश में भूजल निकासी का औसत स्तर  60.47% है.
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March 25, 2026

विश्व मौसम विज्ञान दिवस: स्टेट ऑफ द ग्लोबल क्लाइमेट 2025 रिपोर्ट

March 22, 2026

देश में औद्योगिक विकास को रफ्तार देने के लिए BHAVYA को मंजूरी

March 19, 2026

60वां ज्ञानपीठ पुरस्कार आर. वैरामुथु को प्रदान किया जाएगा

March 19, 2026

98वें अकादमी पुरस्कार: वन बैटल आफ्टर अनदर को सर्वश्रेष्ठ फिल्म सहित 6 ऑस्कर पुरस्कार

March 18, 2026

एशिया-अफ्रीका एग्री अलायंस की आधिकारिक शुरुआत

March 18, 2026

भारतीय संसद ने ‘विनियोग विधेयक 2026’ सफलतापूर्वक पारित किया

March 17, 2026

नागोया प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन पर भारत की पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट

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