सर्वोच्च न्यायालय ने देश में पहली बार इच्छा मृत्यु की अनुमति दी

भारत के न्यायिक और चिकित्सा इतिहास में 11 मार्च 2026 को एक बेहद ऐतिहासिक फैसला आया है. सर्वोच्च न्यायालय ने देश में पहली बार किसी मरीज के लिए ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ (Passive Euthanasia) की अनुमति दी है.

यह फैसला 2018 के उस ऐतिहासिक आदेश का पहला व्यावहारिक प्रयोग है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने ‘सम्मान के साथ मरने के अधिकार’ (Right to die with dignity) को मौलिक अधिकार माना था.

क्या था मामला?

  • अगस्त 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के कारण 32 वर्षीय हरीश राणा के सिर में गंभीर चोट आई थी. तब से वह ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) यानी कोमा जैसी स्थिति में थे. उनके ठीक होने की कोई चिकित्सीय उम्मीद नहीं बची थी.
  • 13 साल तक उनकी देखभाल करने के बाद, उनके माता-पिता ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि उनके बेटे को इस कष्टदायक जीवन से मुक्त किया जाए.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

  • यह फैसला जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया.
  • अदालत ने हरीश राणा को दी जा रही ‘क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रिशन एंड हाइड्रेशन’ (CANH) यानी जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति दे दी.
  • कोर्ट ने दिल्ली के एम्स अस्पताल को निर्देश दिया है कि हरीश को ‘पेलिएटिव केयर’ (Palliative Care) विभाग में भर्ती किया जाए, ताकि जीवन रक्षक प्रणाली हटाते समय मरीज को कोई दर्द या तकलीफ न हो और उनकी गरिमा पूरी तरह बनी रहे.

‘सक्रिय’ और ‘निष्क्रिय’ इच्छा मृत्यु में अंतर

  • सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि भारत में सक्रिय इच्छा मृत्यु (Active Euthanasia) आज भी गैरकानूनी और अपराध है.
  • सक्रिय इच्छा मृत्यु में मरीज को मारने के लिए सीधे तौर पर कोई दवा या जहर का इंजेक्शन दिया जाता है.
  • निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में मरीज से कृत्रिम रूप से जिंदा रखने वाली मशीनें (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) हटा ली जाती हैं, जिससे प्राकृतिक रूप से उसकी मृत्यु हो सके.
  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ पर एक स्पष्ट कानून बनाए जाने को कहा है, ताकि मरीजों के परिवारों को लंबी कानूनी लड़ाई न लड़नी पड़े.

संवैधानिक पहलू

  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ को दी गई मंजूरी का कानूनी आधार संविधान के अनुच्छेद 21 और ‘लिविंग विल’ (Living Will)  के आधार पर है.
  • भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को ‘प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण’ (Right to Life and Personal Liberty) देता है.
  • कोर्ट ने माना कि ‘जीने के अधिकार’ का मतलब सिर्फ सांस लेते रहना नहीं है, बल्कि ‘सम्मान और गरिमा के साथ जीना’ है.
  • यदि कोई व्यक्ति को ऐसी बीमारी है, जहां उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है, और मेडिकल मशीनें केवल उसकी पीड़ा को बढ़ा रही हैं, तो उस जीवन में कोई ‘गरिमा’ नहीं बचती.
  • कोर्ट ने फैसला दिया कि जब गरिमापूर्ण जीवन संभव न रहे, तो ‘गरिमापूर्ण मृत्यु’ भी अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार का ही हिस्सा है.