अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने राष्‍ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाये गये टैरिफ आदेशों को रद्द किया

अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा दुनिया भर के देशों पर लगाए गए ‘ग्लोबल टैरिफ’ (आयात शुल्क) को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है. कोर्ट ने यह 20 फरवरी 2026 को 6-3 के बहुमत से यह फैसला सुनाया.

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुख्य बिन्दु

  • राष्ट्रपति ट्रम्प ने ये टैरिफ 1977 के एक आपातकालीन कानून ‘IEEPA’ (इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पॉवर्स एक्ट) का उपयोग करके लगाए थे. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कानून राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान वाणिज्य को नियंत्रित करने का अधिकार देता है, लेकिन नए ‘टैरिफ’ या ‘टैक्स’ लगाने का नहीं.
  • अमेरिकी संविधान के अनुसार, कोई भी टैक्स या टैरिफ लगाने का अंतिम अधिकार केवल अमेरिकी संसद (Congress) के पास है, कार्यपालिका (राष्ट्रपति) के पास नहीं.
  • इस फैसले के कारण ट्रम्प के ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ (Reciprocal Tariffs) और कुछ अन्य बड़े आयात शुल्क पूरी तरह से अमान्य हो गए हैं.
  • जो शुल्क ‘धारा 232’ (Section 232) के तहत राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर लगाए गए थे (जैसे- स्टील और एल्युमीनियम पर भारी ड्यूटी), वे अभी भी लागू रहेंगे क्योंकि कोर्ट का यह फैसला केवल IEEPA कानून तक सीमित था.

राष्ट्रपति ट्रम्प की प्रतिक्रिया

  • ट्रम्प ने इस फैसले पर तीखी नाराजगी जताते हुए इसे ‘बेहद निराशाजनक’ बताया. उन्होंने 1974 के व्यापार अधिनियम की धारा 122 का इस्तेमाल करते हुए सभी देशों पर 150 दिनों के लिए 15% का एक नया ‘अस्थायी आयात सरचार्ज’ लगा दिया है.

भारत पर इसका असर

  • भारत के लिए यह एक बहुत बड़ी आर्थिक जीत है. एक अनुमान के अनुसार, इस फैसले से भारत के अमेरिका जाने वाले लगभग 55% निर्यात (विशेष रूप से केमिकल, कपड़े और ऑर्गेनिक उत्पाद) ट्रम्प द्वारा लगाए गए 18% ‘रेसिप्रोकल टैरिफ’ से मुक्त हो जाएंगे.
  • अब चूँकि ट्रम्प ने नया 15% का अस्थायी टैरिफ ‘सभी’ देशों पर समान रूप से लागू किया है, इससे भारत को चीन और वियतनाम जैसे देशों के मुकाबले अमेरिकी बाजार में अधिक बराबरी का मौका मिलेगा.

वसूले गए शुल्क वापस करने पड़ेंगे?

  • अमेरिकी सीमा शुल्क विभाग (CBP) ने 24 फरवरी से इन अवैध टैरिफ की वसूली बंद कर दी है. अब सवाल यह है कि क्या अमेरिकी सरकार को आयातक कंपनियों से वसूले गए लगभग $130 बिलियन से $175 बिलियन वापस करने पड़ेंगे? सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला निचली अदालतों पर छोड़ दिया है.