जीडीपी गणना के लिए 2022-23 को नया आधार वर्ष घोषित किया गया

भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) ने 27 फरवरी 2026 को जीडीपी गणना के लिए एक नई सीरीज़ जारी की है. इसके तहत अब जीडीपी का आधार वर्ष 2011-12 से बदलकर 2022-23 कर दिया गया है.

पिछले एक दशक से अधिक समय में भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना में हुए बड़े बदलावों को सटीक रूप से मापने के लिए यह एक बहुत महत्वपूर्ण कदम है.

2022-23 को ही आधार वर्ष क्यों चुना गया?

किसी भी आधार वर्ष को एक ‘सामान्य वर्ष’ होना चाहिए जिसमें कोई बड़ा आर्थिक झटका न लगा हो. 2019 से 2021 के बीच के वर्ष कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन के कारण बुरी तरह प्रभावित थे. महामारी के झटकों के बाद 2022-23 ही वह पहला साल था जब अर्थव्यवस्था पूरी तरह से सामान्य और स्थिर हुई थी.

गणना के तरीके में नए बदलाव

  • पहले केवल उत्पादन (Output) की महंगाई दर को घटाकर वास्तविक जीडीपी निकाली जाती थी. अब कच्चे माल (Inputs) और तैयार माल (Outputs) दोनों की महंगाई को अलग-अलग एडजस्ट किया जाएगा. इससे वास्तविक विकास का एकदम सटीक आंकड़ा मिलेगा.
  • अब जीडीपी की गणना में केवल पुराने सर्वे नहीं, बल्कि हाई-फ्रीक्वेंसी डेटा जैसे—GST कलेक्शन, ई-वाहन पोर्टल का डेटा, और MCA-21 (कंपनियों का डेटाबेस) का इस्तेमाल किया जा रहा है.
  • इस नई गणना में डिजिटल इकॉनमी, गिग वर्कर्स (जैसे डिलीवरी बॉय), और घरों में काम करने वाले वेतनभोगी कर्मचारियों को भी बेहतर तरीके से शामिल किया गया है.

अर्थव्यवस्था के आंकड़ों पर इसका प्रभाव

  • नए आधार वर्ष के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए भारत की वास्तविक विकास दर का अनुमान बढ़ाकर 7.6% कर दिया गया है (जो पुरानी गणना के अनुसार 7.1% था). इसमें विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र का सबसे बड़ा योगदान है.
  • वास्तविक विकास दर बढ़ने के बावजूद, अर्थव्यवस्था का कुल आकार पिछले अनुमानों से लगभग 3% कम हो गया है. इसके कारण भारत की अर्थव्यवस्था अब लगभग $3.9 ट्रिलियन आंकी जा रही है.
  • जीडीपी का कुल आकार कम होने के कारण, सरकार का राजकोषीय घाटा और ऋण-जीडीपी अनुपात (Debt-to-GDP ratio) प्रतिशत के रूप में थोड़ा बढ़ गया है.
  • नई गणना में कृषि और विनिर्माण क्षेत्र का योगदान थोड़ा बढ़ा है, जबकि सेवा क्षेत्र (Services Sector) का प्रतिशत थोड़ा कम हुआ है.