भारत के ने हिंद महासागर में दुर्लभ हाइड्रोथर्मल वेंट की खोज की
भारत ने अपने डीप ओशन मिशन’ (Deep Ocean Mission) के तहत हिंद महासागर में दुर्लभ हाइड्रोथर्मल वेंट (Hydrothermal Vents) और नई समुद्री प्रजातियों की खोज की है. यह खोज समुद्री विज्ञान, पर्यावरण और भारत की ‘ब्लू इकॉनमी’ (Blue Economy) के लिए एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक उपलब्धि है.
खोज से जुड़ी मुख्य जानकारी
- यह खोज दक्षिणी हिंद महासागर के सेंट्रल और साउथ वेस्ट इंडियन रिज क्षेत्र में की गई है. यह स्थान समुद्र के भीतर लगभग 4,500 मीटर की गहराई में स्थित है.
- इस खोज के लिए ‘ओशन मिनरल एक्सप्लोरर’ जैसे ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (AUV) का इस्तेमाल किया गया.
हाइड्रोथर्मल वेंट क्या होते हैं?
- हाइड्रोथर्मल वेंट, समुद्र के तल पर मौजूद ‘गर्म झरने’ (hot springs) होते हैं.
- समुद्र के तल में जहां टेक्टोनिक प्लेट्स खिसकती हैं, वहां दरारें बन जाती हैं. जब समुद्र का ठंडा पानी इन दरारों से अंदर जाकर पृथ्वी के मैग्मा के संपर्क में आता है, तो वह अत्यधिक गर्म (लगभग 370°C तक) हो जाता है.
- यह खौलता हुआ पानी अपने साथ भारी मात्रा में खनिजों और गैसों को लेकर समुद्र तल से वापस एक फव्वारे के रूप में बाहर निकलता है.
नई समुद्री प्रजातियां
- आम तौर पर समुद्र की इतनी गहराई में सूरज की रोशनी बिल्कुल नहीं पहुँचती है, इसलिए वहां जीवन मुश्किल माना जाता है.
- हालांकि, इन हाइड्रोथर्मल वेंट के आसपास एक बिल्कुल अलग और जीवंत इकोसिस्टम पनपता है. यहाँ पाए जाने वाले जीव और सूक्ष्मजीव (Microbes) प्रकाश संश्लेषण के बजाय कीमोसिंथेसिस (Chemosynthesis) के जरिए जीवित रहते हैं—यानी वे वेंट से निकलने वाले रसायनों का उपयोग करके अपनी ऊर्जा बनाते हैं.
- इस गहरे और चरम वातावरण में कई दुर्लभ और नई प्रजातियां विकसित होती हैं, जो वैज्ञानिकों के लिए विकासवाद (Evolution) और गहरे समुद्र के जीव विज्ञान को समझने का एक नया रास्ता खोलती हैं.
भारत के लिए इसका महत्व
- इन वेंट्स के आसपास तांबा, जस्ता (Zinc), सोना, चांदी, कोबाल्ट और निकल जैसे बहुमूल्य धातुओं और सल्फाइड के विशाल भंडार जमा हो जाते हैं, जो भविष्य की तकनीकी जरूरतों (जैसे बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स) के लिए बेहद अहम हैं.
- यह खोज भारत के ‘समुद्रयान’ मिशन को और मजबूती देती है. इस मिशन के तहत भारत ‘मत्स्य 6000’ (MATSYA 6000) नामक स्वदेशी पनडुब्बी तैयार कर रहा है, जो तीन इंसानों को 6000 मीटर की गहराई तक लेकर जाएगी.
- इस क्षमता के साथ भारत अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान और चीन जैसे देशों के उस ‘एलीट क्लब’ में शामिल हो गया है जिनके पास गहरे समुद्र में सर्वे और खोज करने की उन्नत तकनीक है.
