सर्वोच्च न्यायालय ने मासिक धर्म स्‍वास्‍थ्‍य को मौलिक अधिकार बताया

सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में अपने विभिन्न ऐतिहासिक निर्णयों के माध्यम से मासिक धर्म स्‍वास्‍थ्‍य (Menstrual Health) को संविधान के तहत मौलिक अधिकार माना है.

मुख्य बिन्दु

न्यायालय ने मासिक धर्म स्वास्थ्य को केवल एक जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि महिलाओं की गरिमा (Dignity), समानता (Equality) और स्वास्थ्य के अधिकार से जोड़ा है. संविधान के तहत, इसे मुख्य रूप से अनुच्छेद 14, 15, 17 और 21 के दायरे में देखा गया है.

मुख्य निर्णय और संवैधानिक पहलुओं का विवरण

इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन बनाम केरल राज्य 2018:

  • कोर्ट ने 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं (मासिक धर्म वाली आयु) के प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को असंवैधानिक घोषित किया.
  • जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपने ऐतिहासिक मत में कहा कि मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं को रोकना ‘अस्पृश्यता’ (Untouchability) का एक रूप है, जो संविधान के अनुच्छेद 17 का उल्लंघन है.
  • कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जैविक कारणों के आधार पर भेदभाव करना महिलाओं की गरिमा के खिलाफ है.

जया ठाकुर बनाम भारत संघ 2023-24:

  • कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह देश भर के स्कूलों में छात्राओं के लिए सैनिटरी पैड वितरण, अलग शौचालय और कचरा निपटान की व्यवस्था के लिए एक ‘राष्ट्रीय मासिक धर्म स्वच्छता नीति’ (National Menstrual Hygiene Policy) तैयार करे.
  • कोर्ट ने माना कि मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता सुविधाओं की कमी लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, जो उनके गरिमामय जीवन जीने के अधिकार (अनुच्छेद 21) का उल्लंघन है.

मासिक धर्म अवकाश:

कोर्ट ने चिंता जताई कि यदि इसे अनिवार्य किया गया, तो भविष्य में नियोक्ताओं (Employers) द्वारा महिलाओं को काम पर रखने में हिचकिचाहट हो सकती है, जो उनके रोजगार के अधिकार के विपरीत होगा.

संबंधित संवैधानिक अनुच्छेद

अनुच्छेदसंबंध
अनुच्छेद 14कानून के समक्ष समानता; जैविक आधार पर भेदभाव की मनाही.
अनुच्छेद 15लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध.
अनुच्छेद 17मासिक धर्म को ‘अशुद्धता’ मानकर भेदभाव करना अस्पृश्यता के समान है.
अनुच्छेद 21स्वास्थ्य और स्वच्छता के साथ गरिमामय जीवन जीने का अधिकार.