RBI ने कुछ देशों के साथ करेंसी स्वैप समझौतों को सक्रिय किया, जानिए क्या होता है करेंसी स्वैप
अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की मजबूती के लिए RBI द्वारा बड़े पैमाने पर डॉलर बेचने के कारण भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट दर्ज की गई है. साथ ही, RBI ने कुछ एशियाई देशों के साथ ‘करेंसी स्वैप’ समझौतों को भी सक्रिय किया है.
विदेशी मुद्रा भंडार और करेंसी स्वैप (Currency Swap) किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करते हैं. खासकर तब, जब वैश्विक संकट (जैसे युद्ध या कच्चे तेल की महंगाई) के कारण देश की मुद्रा (रुपया) गिरने लगती है.
विदेशी मुद्रा भंडार क्या होता है?
विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves), किसी देश के केंद्रीय बैंक (भारत में RBI) में विदेशी मुद्राओं और अन्य अंतरराष्ट्रीय संपत्तियों के रूप में रखा गया खजाना होता है.
भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में मुख्य रूप से चार चीजें शामिल होती हैं:
- विदेशी मुद्रा संपत्तियां (Foreign Currency Assets – FCA): यह भंडार का सबसे बड़ा हिस्सा होता है. इसमें डॉलर, यूरो, पाउंड और येन जैसी मजबूत विदेशी मुद्राएं और विदेशी सरकारी बांड शामिल होते हैं.
- स्वर्ण (Gold): RBI के पास रखा गया सोने का भारी सुरक्षित भंडार.
- विशेष आहरण अधिकार (Special Drawing Rights – SDR): यह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) द्वारा बनाई गई एक अंतरराष्ट्रीय ‘रिजर्व संपत्ति’ है, जिसे देशों के बीच लेन-देन के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
- IMF में रिज़र्व ट्रेंच (Reserve Tranche in IMF): यह वह आपातकालीन कोटा या पैसा है जो भारत ने IMF के पास जमा कर रखा है और जरूरत पड़ने पर बिना किसी शर्त के निकाल सकता है.
रुपये की मजबूती के लिए RBI द्वारा इस्तेमाल
- हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत अचानक बढ़ जाने के कारण डॉलर की मांग बढ़ गई जिससे रुपये में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई.
- ऐसे समय में RBI अपने ‘विदेशी मुद्रा भंडार’ से बाजार में डॉलर बेचता है. इसके कारण बाजार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ जाती है, जिससे रुपये की गिरावट रुक जाती है.
करेंसी स्वैप क्या होता है?
- करेंसी स्वैप दो देशों के केंद्रीय बैंकों के बीच एक वित्तीय समझौता (Currency Swap Agreement) है. इसमें दोनों देश एक तय समय और पहले से तय ‘एक्सचेंज रेट’ (विनिमय दर) पर अपनी-अपनी मुद्राओं की अदला-बदली करते हैं.
- करेंसी स्वैप का उदाहरण: मान लीजिए भारत और जापान के बीच $75 बिलियन का करेंसी स्वैप समझौता है. जब भारत को अचानक बहुत सारे डॉलर की जरूरत पड़ती है, तो RBI खुले बाजार से डॉलर खरीदने के बजाय, जापान के केंद्रीय बैंक (Bank of Japan) को रुपये (या बांड) देता है और उसके बदले डॉलर ले लेता है.
- दोनों के बीच यह तय होता है कि कुछ महीनों या सालों बाद, RBI जापान को डॉलर वापस कर देगा और अपने रुपये वापस ले लेगा.
- वापसी के समय ‘एक्सचेंज रेट’ वही राहत है जो समझौते के दिन था (भले ही भविष्य में डॉलर कितना भी महंगा क्यों न हो जाए).
करेंसी स्वैप के फायदे
- जब दो देश अपनी ही मुद्राओं में व्यापार करने का स्वैप एग्रीमेंट करते हैं, तो उन्हें बीच में डॉलर की जरूरत ही नहीं पड़ती.
- आपात स्थिति में RBI को अपना जमा डॉलर खर्च नहीं करना पड़ता, बल्कि वह दूसरे देश से ‘स्वैप’ करके डॉलर की कमी पूरी कर लेता है.
- इससे खुले बाजार में दहशत नहीं फैलती और सट्टेबाज रुपये को गिराने का फायदा नहीं उठा पाते.
